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भारत: कश्मीर में पैलेट-गन का इस्तेमाल बंद करे

धार्मिक जुलूस पर पैलेट-गन के इस्तेमाल से लोगों को गंभीर चोटें

श्रीनगर में पत्थर फेंक रहे कश्मीरी प्रदर्शनकारियों पर शॉटगन से निशाना साधता एक भारतीय पुलिस अधिकारी, भारत, 8 मई, 2018. © 2018 एपी फोटो/मुख्तार खान

 

(न्यूयॉर्क) - ह्यूमन राइट्स वॉच ने आज कहा कि भारत सरकार को जम्मू-कश्मीर में भीड़ को तितर-बितर करने के लिए सुरक्षा बलों द्वारा धातु के पैलेट फायरिंग करने वाले शॉटगन के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाना चाहिए. भारतीय पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने 29 अगस्त, 2020 को श्रीनगर में एक शिया मुस्लिम जुलूस पर इस तरह के शॉटगन और आंसू गैस का इस्तेमाल किया जिसमें दर्जनों लोग घायल हो गए.

मोहर्रम जुलूस में शामिल लोगों ने जब कोविड-19 प्रतिबंध के तहत हटने से इनकार कर दिया तो सेना ने धातु के पैलेट इस्तेमाल करने वाले शॉटगन से फायरिंग कर दी. इससे हिंसक विरोध प्रदर्शन भड़क उठे जिसमें कुछ प्रदर्शनकारियों ने पत्थर फेंके. पुलिस के अनुसार इस पत्थरबाजी में 15 सुरक्षाकर्मी घायल हुए.

ह्यूमन राइट्स वॉच की दक्षिण एशिया निदेशक मीनाक्षी गांगुली ने कहा, “बार बार ऐसा हुआ है  कि भारतीय कानून प्रवर्तन अधिकारियों द्वारा कश्मीर में धातु के पैलेट इस्तेमाल करने वाले शॉटगन से प्रदर्शनकारी और आस-पास खड़े लोग बुरी तरह और गंभीर रूप से घायल हुए हैं. भारत सरकार को यह समझना चाहिए कि भीड़, यहां तक कि हिंसक प्रदर्शनकारियों पर इस हथियार के इस्तेमाल से निरपवाद रूप से अंधाधुंध और बेहिसाब चोटें पहुंचेगी, जो कि अंतर्राष्ट्रीय मानकों का उल्लंघन है.”

दस साल पहले, भीड़ नियंत्रण के लिए सीधे गोला बारूद की जगह, भारत सरकार ने प्रकट रूप से “गैर-घातक” विकल्प के रूप में पहली बार इन शॉटगन के इस्तेमाल की शुरुआत की. इस एक दशक के दौरान शॉटगन द्वारा इस्तेमाल धातु के पैलेट से हजारों लोग घायल हुए हैं, जिनमें कई लोगों की आंखों की रोशनी चली गयी. 2010 में कश्मीर में हिंसक विरोध प्रदर्शन के दौरान कुछ हफ़्तों में लगभग 120 लोगों के मारे जाने के बाद इसका इस्तेमाल शुरू हुआ.

सुरक्षा बल आमतौर पर 12-गेज पंप एक्शन गन का उपयोग ऐसे कारतूस दागने के लिए करते हैं जो दर्जनों या सैकड़ों छोटे धातु के पैलेट से भरे होते हैं, जिन्हें कभी-कभी शिकार में उनकी भूमिका को प्रतिबिंबित करने के लिए “बर्डशॉट” या “डव शॉट” कहा जाता है. हालांकि शॉटगन से निकलते समय धातु के पैलेट तंग दायरे में होते हैं लेकिन फिर ये पुंज बनाते हुए बड़े दायरे में फ़ैल सकते हैं जिससे आस-पास खड़े लोगों समेत काफी लोगों को बेहिसाब चोटें पहुंच सकती हैं.

भारत सरकार ने दावा किया है कि सुरक्षा बल केवल आवश्यक होने और प्रदर्शनकारियों द्वारा हिंसा अख्तियार करने पर धातु के पैलेट का इस्तेमाल करने वाले शॉटगन का प्रयोग करते हैं. हालांकि, अंतर्राष्ट्रीय कानून हिंसक प्रदर्शनकारियों सहित किसी के भी खिलाफ ऐसे किसी बल के इस्तेमाल को रोकता है, जो अंधाधुंध या अनावश्यक नुकसान पहुंचाते हों.

सुरक्षा बलों द्वारा कश्मीर में धातु के पैलेट इस्तेमाल करने वाले शॉटगन से लोगों की मौतें हुई हैं और साथ ही लोग घायल हुए हैं. हालांकि इस तरह के शॉटगन से हताहत होने वालों का कोई सटीक आंकड़ा मौजूद नहीं है, गृह मंत्रालय ने फरवरी 2018 में संसद को बताया कि 2015 से 2017 के बीच पैलेट से 17 लोगों की मौत हुई. डेटा जर्नलिज्म वेबसाइट इंडियास्पेंड के अनुसार, इस तरह के शॉटगन से जुलाई 2016 से फरवरी 2019 के बीच 139 लोगों की आंखों की रोशनी चली गई. जनवरी 2018 में, जम्मू और कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने राज्य विधानसभा को बताया कि जुलाई 2016 से फरवरी 2017 के बीच 6,221 लोग पैलेट से घायल हुए थे और उनमें 782 लोगों की आंखों में चोटें आई.

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय (ओएचसीएचआर) ने कहा है कि धातु के पैलेट इस्तेमाल करने वाले शॉटगन “कश्मीर में इस्तेमाल किए जाने वाले सबसे खतरनाक हथियारों में से एक है,” और उसने भीड़ नियंत्रण के लिए इसके इस्तेमाल पर तुरंत रोक लगाने की मांग की है.

2017 में, संसद में इस तरह के शॉटगन के इस्तेमाल पर पूछे गए सवाल के जवाब में गृह मंत्रालय ने कहा था कि उसने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए अन्य गैर-घातक विकल्पों की तलाश की है, लेकिन “अगर ये उपाय दंगाइयों को तितर-बितर करने में अक्षम साबित होते हैं, तो धातु के पैलेट इस्तेमाल करने वाले शॉटगन का सहारा लिया जा सकता है.” दिसंबर 2016 में, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कश्मीर में इन हथियारों का “अंधाधुंध या अत्यधिक” इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए और सरकार को समुचित विचार-विमर्श के बाद ही इनका इस्तेमाल करना चाहिए.

अगस्त 2016 में, सुरक्षा बलों ने जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय को बताया कि वे ऐसे कारतूस का इस्तेमाल करते हैं जिसमें धातु से बने 450 पैलेट होते हैं. सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं का हवाला देते हुए इन कारतूसों में प्रयुक्त धातु के बारे में जानकारी देने से इनकार किया है, हालांकि श्रीनगर के एक डॉक्टर ने कहा कि पैलेट आमतौर पर “लेड बॉल,” यानी सीसे की गोली होते हैं. जबकि छोटे पैलेट से आमतौर पर दर्दनाक लेकिन कम-गंभीर चोटें लगती हैं, लेकिन शरीर के आंख जैसे नाज़ुक हिस्सों पर इसका प्रहार घातक भी हो सकता है. सरकारी बयानों से यह भी पता चलता है कि जम्मू-कश्मीर में अर्धसैनिक बलों को धातु के पैलेट इस्तेमाल करने वाले शॉटगन समेत कम-घातक हथियारों के इस्तेमाल पर केवल तीन दिनों का विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है.

बल प्रयोग और आग्नेयास्त्रों के इस्तेमाल संबंधी संयुक्त राष्ट्र के बुनियादी मूल सिद्धांत “ऐसे आग्नेयास्त्रों और गोला-बारूद के उपयोग को प्रतिबंधित करते हैं जो अनपेक्षित चोट पहुंचा सकते हैं या अनपेक्षित रूप से जोखिम में डाल सकते हैं.” संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार समिति, जो नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय समझौते के अनुपालन की निगरानी करती है, ने अपनी सामान्य टिप्पणी संख्या 37 में कहा है कि “आग्नेयास्त्र एकत्रित भीड़ को नियंत्रित करने के उपयुक्त उपकरण नहीं है, और इसका उपयोग सिर्फ एकत्रित भीड़ को तितर-बितर करने के लिए कत्तई नहीं किया जाना चाहिए....कानून प्रवर्तन अधिकारियों द्वारा एकत्रित भीड़ के संदर्भ में आग्नेयास्त्रों का कोई भी इस्तेमाल लक्षित व्यक्तियों पर केवल तभी किया जा सकता है जब जान पर या गंभीर चोट के आसन्न खतरे से बचने के लिए ऐसा किया जाना बहुत ज़रूरी हो.”

कानून प्रवर्तन के लिए “कम-घातक हथियारों” के इस्तेमाल पर संयुक्त राष्ट्र के 2020 के दिशा-निर्देश में कहा गया है कि “बहुत सारे प्रक्षेप्य कई वस्तुओं को एक साथ दागना गलत है और सामान्य तौर पर, उनके इस्तेमाल में आवश्यकता और आनुपातिकता के सिद्धांतों का अनुपालन नहीं किया जा सकता है. धातु के पैलेट, जैसे कि शॉटगन से दागे जाने वाले धातु के पैलेट का इस्तेमाल हरगिज नहीं किया जाना चाहिए.”

गांगुली ने कहा, “भारतीय नेता, जो यह दावा करते हैं कि उनकी नीतियों से कश्मीरियों की जिंदगी बेहतर हो रही है, इससे इंकार नहीं कर सकते कि सुरक्षा बल लोगों को अपंग बना रहे हैं, अंधा कर रहे हैं और उनकी हत्या कर रहे हैं. भारत सरकार को धातु के पैलेट दागने वाले शॉटगन का इस्तेमाल रोकना चाहिए और अंतरराष्ट्रीय मानकों को पूरा करने के लिए अपनी भीड़ नियंत्रण तकनीकों की समीक्षा करनी चाहिए.”

 

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