Skip to main content
Donate Now

भारत: सात रोहिंग्याओं की म्यांमार वापसी

जबरन वापसी से जीवन और आज़ादी को खतरा; अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन

4 अक्टूबर, 2018 को भारत के मणिपुर के मोरह में सात रोहिंग्याओं को म्यांमार के अधिकारियों को सौंपती भारतीय पुलिस. © 2018 मणिपुर पुलिस

ह्यूमन राइट्स वॉच ने आज कहा कि भारत सरकार ने सात रोहिंग्या मुसलमानों को वापस म्यांमार भेज दिया है, हालांकि वहां उनके उत्पीड़न का गंभीर खतरा मौजूद है. 4 अक्टूबर, 2018 को भारतीय विदेश मंत्रालय ने बताया कि भारत ने “स्वदेश वापसी की उनकी इच्छा की पुष्टि के बाद” मणिपुर राज्य के सीमावर्ती शहर मोरह में इन्हें म्यांमार अधिकारियों को सौंप दिया.

मानवता के खिलाफ सैन्य अपराधों, जिसे संयुक्त राष्ट्र फैक्ट-फाइंडिंग मिशन ने संभावित नरसंहार माना है, से बचने के लिए दस लाख से अधिक रोहिंग्याओं ने म्यांमार से पलायन किया. इनमें से ज्यादातर ने अगस्त 2017 के बाद म्यांमार छोड़ा है. ये सात रोहिंग्या अवैध प्रवेश के आरोप में 2012 से असम के सिलचर केंद्रीय जेल में बंद थे. म्यांमार में इन्हें मनमानी गिरफ्तारी और उत्पीड़न का सामना करना पड़ सकता है और साथ ही इनकी जान को भी खतरा है. ह्यूमन राइट्स वॉच ने कहा है कि भारत सरकार द्वारा रोहिंग्याओं की जबरन वापसी अंतरराष्ट्रीय कानूनी इक़रारनामों का उल्लंघन है.

ह्यूमन राइट्स वॉच की दक्षिण एशिया निदेशक मीनाक्षी गांगुली ने कहा, “किसी भी रोहिंग्या को जबरन म्यांमार वापस भेजना उन्हें दमन और दुर्व्यवहार के खतरे में डाल देना है. भारत सरकार ने अपनी सीमाओं के भीतर शरण लेने वालों को सुरक्षा प्रदान करने की अपनी पुरानी परंपरा को नजरअंदाज कर दिया है.”

अगस्त 2017 में, भारत सरकार ने अनुमानित 40,000 रोहिंग्याओं सहित “अवैध विदेशी नागरिकों” को निर्वासित करने की घोषणा की. इनमें से कम-से-कम 16,500 संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी (यूएनएचसीआर) में पंजीकृत हैं. सरकार ने दृढ़तापूर्वक कहा कि पंजीकरण की स्थिति या अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा मानकों पर ध्यान दिए बिना सभी रोहिंग्या वापस भेजे जा सकते हैं. गृह राज्य मंत्री किरेन रिजजू ने इस योजना के बारे में कहा, “जहां तक ​​हमारा मानना है, वे सभी अवैध आप्रवासी हैं. उनके यहां रहने का कोई आधार नहीं है. जो कोई भी अवैध प्रवासी है उसे वापस भेज दिया जाएगा.”

भारत में रोहिंग्या मुख्य रूप से जम्मू-कश्मीर, तेलंगाना, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और राजस्थान में रह रहे हैं. 2016 से, कट्टरपंथी हिंदू समूह जम्मू में रोहिंग्या शरणार्थियों को निशाना बना रहे हैं और उन्हें राज्य से बाहर निकालने की मांग कर रहे हैं. कुछ समूहों ने सरकार द्वारा उनकी मांग नजरअंदाज करने पर हमलों की धमकी दी है. रोहिंग्या विरोधी एक सार्वजनिक अभियान में उन्हें “आतंकवादी” बताया गया जिससे निगरानी समूहों जैसी हिंसा भड़क उठी. अप्रैल 2017 में अज्ञात हमलावरों द्वारा पांच रोहिंग्या घरों में आगज़नी की गई.

भारत सरकार ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा बताया. हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने अक्टूबर 2017 में निर्वासन के आधार के रूप में इस दावे को खारिज कर दिया. अदालत ने कहा कि सरकार को “मानवाधिकारों और राष्ट्रीय सुरक्षा हितों के बीच संतुलन बनाना होगा.”

फिर भी, 1 अक्टूबर, 2018 को भारत के गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने घोषणा की कि केंद्र सरकार ने राज्यों को रोहिंग्या के बॉयोमीट्रिक डेटा एकत्र करने का आदेश दिया है, इसके बाद सरकार “म्यांमार के साथ राजनयिक स्तर पर कार्रवाई शुरू करेगी और फिर हम इसे हल कर लेंगे.” सिंह ने कहा है कि भारत में सभी रोहिंग्या “अवैध आप्रवासी” हैं जिन्हें निर्वासित किया जाएगा.

असम के एक पुलिस अधिकारी ने सात रोहिंग्याओं के निर्वासन को “नियमित प्रक्रिया” बताते हुआ कहा कि “हम सभी अवैध विदेशियों को निर्वासित करते हैं.” निर्वासन रोकने के लिए मानवाधिकार वकीलों द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में किए गए हस्तक्षेप पर भारत सरकार ने जवाब दिया कि ये सात रोहिंग्या वापस लौटना चाहते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने तथ्यों की पुष्टि और शरणार्थियों के रूप में अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा की इनकी जरूरत के निर्धारण के लिए रोहिंग्याओं से यूएनएचसीआर को मिलने देने की अपील ख़ारिज कर दी.

भारतीय अधिकारियों ने बताया कि म्यांमार ने इन रोहिंग्याओं की पहचान की पुष्टि करते हुए उनकी वापसी को हरी झंडी दे दी है. सरकारी वकील ने अदालत में बताया कि म्यांमार ने इन रोहिंग्याओं को पहचान पत्र दिया है जो कि केवल एक महीने के लिए वैध अस्थायी यात्रा दस्तावेज है. ये दस्तावेज इसकी पुष्टि नहीं करते हैं कि म्यांमार सरकार ने उन्हें “राष्ट्रीय नागरिक” के रूप में स्वीकार कर लिया है, जैसा कि भारत सरकार ने दावा किया है. रोहिंग्याओं को म्यांमार में नागरिकता नहीं दी गई है, वहां वे केवल नेशनल वेरिफिकेशन कार्ड के हकदार हैं. यह कार्ड पहचान संबंधी दस्तावेज है जो गतिविधि को प्रतिबंधित करते हैं और आमतौर पर दबाव में जारी किए जाते हैं.

सरकार ने अदालत को बताया कि इन सात रोहिंग्याओं के अलावा, उसे असम सरकार से 2016 में अन्य बारह लोगों की जानकारी भी मिली थी, लेकिन सरकार ने उनकी हिरासत की स्थिति के बारे में और जानकारी नहीं दी.

ह्यूमन राइट्स वॉच ने कहा कि भारत का यह दावा गलत है कि ये निर्वासन “किसी भी अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन नहीं कर रहे हैं.” हालांकि भारत 1951 के शरणार्थी समझौते का हिस्सा नहीं है, मगर मान्य अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत किसी भी शरणार्थी को ऐसी जगह जबरन वापसी पर प्रतिबंध है जहां उसके जीवन या आज़ादी को जोख़िम हो. भारत ने यातना के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं लेकिन अभी तक इसकी पुष्टि नहीं की है. इस समझौते का अनुच्छेद 3, किसी व्यक्ति के ऐसे राज्य में “निष्कासन, वापसी या निर्वासन को प्रतिबंधित करता है जहां इस बात के पर्याप्त आधार हों कि उसे यातना का शिकार बनाया जाएगा.”

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, अभी भारत में कम-से-कम 200 रोहिंग्या शरणार्थी अवैध प्रवेश के जुर्म में हिरासत में हैं. ह्यूमन राइट्स वॉच ने कहा है कि शरणार्थी स्थिति निर्धारित करने के लिए भारत सरकार को यूएनएचसीआर को हिरासत में रह रहे सभी प्रवासियों से मिलने की इज़ाज़त देनी चाहिए. निर्वासित किए सात रोहिंग्याओं को 2012 में तीन महीने की सजा सुनाई गई लेकिन उन्हें छह साल जेल में बिताना पड़ा.

म्यांमार में, रोहिंग्याओं को सरकार के सुनियोजित उत्पीड़न और हिंसा का सामना करना पड़ रहा है. बताया गया है कि वापस भेजे गए सातों रोहिंग्या मध्य रखाइन राज्य के क्यौक्टो शहर से हैं जहां अक्टूबर 2012 में सुरक्षा बलों ने हिंसा की थी.

दशकों से, म्यांमार में रोहिंग्या राष्ट्रीयता से एकदम वंचित कर दिए गए हैं जिससे पैदा हुई राज्यविहीनता के कारण सुरक्षा बलों को उनकी गतिविधि और बुनियादी सेवाओं तक पहुंच पर दीर्घकालिक तथा सख़्त प्रतिबंध लगाने का मौका मिलता है. अगस्त 2017 से अब तक, 728,000 रोहिंग्या सीमा पार कर बांग्लादेश में शरण ले चुके हैं. म्यांमार का दावा है कि वह स्वदेश लौटने वाले शरणार्थियों को स्वीकार करने के लिए तैयार है, लेकिन उसने सुरक्षित और सम्मानित वापसी के हालात बनाने या संकट के मूल कारण - सैन्य हिंसा और उत्पीड़न की समस्या से निपटने की कोई इच्छा नहीं दिखायी है.

अगस्त में, ह्यूमन राइट्स वॉच ने तीन लड़कों सहित छह रोहिंग्या शरणार्थियों का साक्षात्कार किया. उन्होंने बताया कि बांग्लादेश से रखाइन लौटने के बाद उन सभी को म्यांमार के अधिकारियों ने गंभीर यातना दी.

सितंबर में, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद ने 2011 से म्यांमार में हुए “सबसे गंभीर अंतर्राष्ट्रीय अपराध” के मामलों के दस्तावेज तैयार करने में मदद के लिए एक अंतरराष्ट्रीय निकाय बनाने का प्रस्ताव पारित किया जिससे कि आपराधिक अभियोजन में मदद मिले और इसमें तेज़ी आए.

ह्यूमन राइट्स वॉच ने कहा है कि भारत सरकार को तब तक किसी भी रोहिंग्या को म्यांमार निर्वासित नहीं करना चाहिए जब तक सरकार समुचित रूप से निर्धारित नहीं कर ले कि क्या रोहिंग्या यहां शरण मांग कर रहे हैं. अगर ऐसा है, तो उन्हें अपने दावे की निष्पक्ष और प्रभावी समीक्षा का अधिकार है. उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल और रोजगार तक पहुंच होनी चाहिए.

भारत में रहने वाले रोहिंग्या को निष्पक्ष प्रक्रियाओं तक पहुंच होनी चाहिए जिससे कि यह तय हो सके कि किसी भी वापसी प्रक्रिया से म्यांमार में वापसी पर उन्हें कोई नुकसान तो नहीं होगा. भारत को यह मानना ​​चाहिए कि वहां गंभीर उत्पीड़न का खतरा है और म्यांमार में रोहिंग्याओं की सुरक्षित वापसी से पहले, वहां संयुक्त राष्ट्र निरीक्षकों समेत अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा बल की तैनाती जरूरी है.

गांगुली ने कहा, “भारत सरकार को तुरंत रोहिंग्या को निर्वासित करने की योजना रोक देनी चाहिए और इसके बजाय शरण माँगने के दावों का निष्पक्ष मूल्यांकन करना चाहिए. भारत को अन्य सरकारों के साथ मिलकर यह मांग करनी चाहिए कि म्यांमार यातना समाप्त करे और रोहिंग्या को न्याय दिलाने के लिए संयुक्त राष्ट्र के साथ सहयोग करे.”

Every piece on our website is resource intensive. If you donate whatever you can today, we will use it to continue investigating abuses and advocate for change in 100+ countries.

Region / Country