बड़ी तादाद में भारतीय नए नागरिकता कानून के खिलाफ शांतिपूर्वक विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. इनका मानना है कि इससे भारत की धर्मनिरपेक्ष पहचान को खतरा है. बंगलुरु, भारत, 23 दिसंबर, 2019. 

© 2019 एपी फोटो/एजाज राह

(न्यूयॉर्क) - ह्यूमन राइट्स वॉच ने आज कहा कि भारत सरकार को मुसलमानों के खिलाफ भेदभावकारी कानून का विरोध कर रहे प्रदर्शनकारियों के खिलाफ अनावश्यक रूप से घातक बल का प्रयोग बंद करना चाहिए. नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में 12 दिसंबर, 2019 से शुरू  हुए विरोध प्रदर्शनों में कम-से-कम 25 लोग मारे गए हैं और सैकड़ों लोग गिरफ्तार किए गए हैं.

पुलिस ने सिर्फ कानून का विरोध कर रहे प्रदर्शनकारियों के खिलाफ अत्यधिक बल इस्तेमाल किया है जिनमे अनेक छात्र भी शामिल हैं. सभी मौतें सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) शासित राज्यों में हुई हैं: उत्तर प्रदेश में 18, असम में 5, और कर्नाटक में 2 लोग मारे गए हैं. मारे गए ज्यादातर लोग मुस्लिम हैं, जिनमें उत्तर प्रदेश में 8 साल का एक लड़का भी शामिल है. बहुत से पुलिस कर्मी घायल हुए हैं. सरकार ने नागरिकता कानून विरोधी शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को रोकने के लिए उपनिवेश कालीन कानून, इंटरनेट पर प्रतिबंध और सार्वजनिक परिवहन पर पाबंदियों का भी उपयोग किया है. हालांकि, पुलिस ने कानून का समर्थन कर रहे प्रदर्शनकारियों और हिंसा की वकालत करने वाले सत्तारूढ़ पार्टी के नेताओं के मामले में कोई दखल नहीं दिया है.

दक्षिण एशिया निदेशक मीनाक्षी गांगुली ने कहा, “भारतीय पुलिस कई इलाकों में नागरिकता कानून विरोधी प्रदर्शनों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई कर रही है और अनावश्यक तौर पर घातक बल का इस्तेमाल कर रही है. सरकार को हिंसक प्रदर्शनकारियों पर कानून सम्मत कार्रवाई करनी चाहिए, लेकिन उसे अत्यधिक बल का इस्तेमाल करने वाले पुलिस अधिकारियों की जिम्मेदारी भी तय करनी चाहिए.”

प्रदर्शनकारियों और पुलिस द्वारा की गई अधिकांश हिंसा उत्तर प्रदेश में हुई है. वहां मुख्यमंत्री ने प्रदर्शनकारियों से “बदला लेने” की कसम खाई और कहा, “सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वालों की सभी संपत्तियों को जब्त किया जाएगा और नुकसान की भरपाई के लिए उनकी नीलामी की जाएगी.” इसके तुरंत बाद, राज्य के अधिकारियों ने मुज़फ्फरनगर जिले में कार्रवाई की और किसी कानूनी आधार के बगैर लगभग 70 दुकानों को बंद करा दिया.

21 दिसंबर को, उत्तर प्रदेश पुलिस ने कहा कि उसने 700 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया और सुरक्षात्मक कारणों से 4,500 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया, जिन्हें चेतावनी के बाद रिहा कर दिया गया. उसके बाद कई अन्य लोगों को गिरफ्तार किया गया है. उन पर हत्या का प्रयास, घातक हथियार के साथ दंगा करने, गैरकानूनी तरीके से एकत्र होने, सरकारी कर्मचारियों से मारपीट और आपराधिक धमकी सहित गंभीर आरोप लगाए गए हैं.

आन्दोलन में शामिल एक कार्यकर्ता ने ह्यूमन राइट्स वॉच को बताया, “हम में से बहुत से  लोग छिप गए हैं क्योंकि पुलिस शांतिपूर्ण विरोध रैली आयोजित करने या इसमें शामिल होने के लिए प्रचार करने वाले हर किसी पर नज़र रख रही है. वे हमें चुप कराना चाहते हैं.”

उत्तर प्रदेश पुलिस ने लखनऊ के एक वकील मोहम्मद शोएब और सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी एस आर दारापुरी सहित कई कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया. मैग्सेसे पुरस्कार विजेता संदीप पांडे को घर में नजरबंद रखा गया. संदीप पांडे की पत्नी अरुंधति धुरु और कार्यकर्ता मीरा संघमित्रा एवं माधवी कुकरेजा को कई घंटे तक हिरासत में रखा गया जब वे शोएब के बारे में पूछताछ करने थाने गई थीं. 21 दिसंबर को, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने शोएब की रिहाई के लिए दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य पुलिस को गिरफ्तारी के  दस्तावेजों के साथ-साथ इस बात का भी प्रमाण प्रस्तुत करने का आदेश दिया कि कानूनी प्रक्रियाओं के अनुसार शोएब की चिकित्सकीय जांच की गई.

कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया कि उत्तर प्रदेश पुलिस ने मुस्लिम मोहल्ला के निवासियों और हिरासत में लिए गए कुछ लोगों के साथ मारपीट की. लखनऊ में पुलिस ने एक्टिविस्ट और कांग्रेस पार्टी की कार्यकर्ता सदफ जाफ़र को तब गिरफ्तार कर लिया, जब वह एक विरोध-प्रदर्शन के बाद अपने फोन पर पुलिस की वीडियोग्राफी कर रही थीं. उनके परिवार का आरोप है कि अधिकारियों ने सदफ के साथ मारपीट की.

विरोध-प्रदर्शन के बाद पुलिस द्वारा हिरासत में लिए गए अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कई छात्रों ने भी हिरासत में मारपीट का आरोप लगाया है. स्क्रोल.इन की एक रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर प्रदेश के नेहतौर शहर के मुस्लिम बहुल इलाका नाइज़ा सराय में पुलिस जबरन कई घरों में घुस गई, तोड़फोड़ किया और कम से कम चार लोगों को हिरासत में ले लिया.

उत्तर प्रदेश पुलिस का दावा है कि देसी हथियारों और प्रदर्शनकारियों के बीच आपसी गोलीबारी से लोगों की मौत हुई, और पुलिस ने केवल रबर की गोलियां और आंसूगैस के गोले दागे हैं. हालांकि, कानपुर का एक वीडियो इन दावों को झुठलाता है जिसमें एक पुलिसकर्मी अपनी रिवाल्वर से प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाता दिखाई दे रहा है.

इस बीच, सरकार ने नागरिकता कानून समर्थक उन नेताओं के खिलाफ कार्रवाई नहीं की जिनसे   हिंसा भड़क सकती थी. 20 दिसंबर को, भाजपा नेता कपिल मिश्रा ने दिल्ली में एक बड़े प्रदर्शन का नेतृत्व किया, जिसमें नागरिकता कानून का विरोध करने वालों का जिक्र करते हुए यह नारा लगाया गया कि पुलिस को “गद्दारों को गोली मार देनी चाहिए.” इसके दो दिन बाद, महाराष्ट्र में यह नारा भाजपा समर्थक प्रदर्शन में दोहराया गया.

विरोध प्रदर्शनों के देशव्यापी होते ही सरकार ने कई राज्यों में मोबाइल इंटरनेट सेवाओं को बार-बार बंद किया है. 20 दिसंबर को, सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने टेलीविजन समाचार प्रसारकों को दूसरी एडवाइजरी जारी की, जिसमें “राष्ट्र-विरोधी नज़रिए को बढ़ावा देने वाली कोई भी सामग्री दिखाने” से दूर रहने की चेतावनी दी गई.

संशोधित नया नागरिकता कानून केवल मुस्लिम-बहुल पड़ोसी देशों- अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के गैर-मुस्लिम अनियमित आप्रवासियों को नागरिकता प्रदान करता है. प्रदर्शनकारियों ने इस कानून को असंवैधानिक और विभाजनकारी बताते हुए इसे निरस्त करने की मांग की है.

यह कानून भाजपा सरकार द्वारा राष्ट्रव्यापी नागरिकता सत्यापन प्रक्रिया, राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) को आगे बढ़ाने की कोशिशों के बीच बनाया गया है. सरकार के बयान इशारा करते हैं कि एनआरसी प्रक्रिया का मकसद मुसलमानों को उनके नागरिकता अधिकारों से वंचित करना है जबकि हिंदुओं और अन्य गैर-मुस्लिमों की सुरक्षा करना है. अक्टूबर में गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था, “मैं सभी हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध और ईसाई शरणार्थियों को आश्वस्त करना चाहता हूं कि आपको केंद्र (सरकार) द्वारा भारत छोड़ने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा. अफवाहों पर विश्वास न करें. एनआरसी से पहले, हम नागरिकता संशोधन विधेयक लाएंगे, जो सुनिश्चित करेगा कि इन्हें भारतीय नागरिकता प्राप्त हो.”

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 22 दिसंबर को एक रैली में कहा कि उनकी सरकार ने राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर पर कभी चर्चा नहीं की है और इस बात से इनकार किया कि देश में अनियमित प्रवासियों के लिए कोई डिटेंशन सेंटर है. उनके बयान शाह के बयानों के विरोधाभासी हैं जिन्होंने बार-बार कहा है कि नागरिकता संशोधन कानून राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर का पूर्ववर्ती चरण है. सरकार असम और कर्नाटक में पहले से ही डिटेंशन सेंटर का निर्माण कर रही है.

भारत सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सुरक्षा बल कानून प्रवर्तन अधिकारियों द्वारा बल प्रयोग और आग्नेयास्त्रों के इस्तेमाल संबंधी संयुक्त राष्ट्र के बुनियादी सिद्धांतों का पालन करें. सरकार को नागरिकता संशोधन कानून वापस ले लेना चाहिए क्योंकि यह कानून नागरिक और राजनीतिक अधिकारों के अंतरराष्ट्रीय समझौतों (आईसीसीपीआर) तथा अन्य मानवाधिकार संधियों में निर्दिष्ट नस्ल, रंग, वंश या राष्ट्रीय या नृजातीय मूल के आधार पर नागरिकता हरण  को रोकने के भारत के अंतरराष्ट्रीय दायित्वों का उल्लंघन करता है. 

छात्रों के विरोध प्रदर्शनों के साथ एकजुटता दिखाते हुए दुनिया भर के कई शहरों में रैलियां निकाली गई हैं और विदेशों में सरकार की इन कार्रवाइयों की आलोचना में लगातार बढ़ोतरी हो रही है.

गांगुली ने कहा, “भारत सरकार को नागरिकता कानून और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर, जिनका इस्तेमाल हाशिए के समूहों को लक्षित करने के लिए किया जाएगा, के संबंध में न्यायसंगत चिंताओं को दूर करने पर ध्यान देना चाहिए. सरकार के आलोचकों का अक्सर हिंसक दमन ऐसे किसी भी दावे को कमजोर करता है कि सरकार निष्पक्ष तरीके से परिस्थिति का मुकाबला कर रही है.”