(बैंकॉक) – ह्यूमन राइट्स वॉच ने आज अपनी विश्व रिपोर्ट 2026 में कहा कि भारत की हिंदू राष्ट्रवादी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाली सरकार ने 2025 में धार्मिक अल्पसंख्यकों को बदनाम किया और सैकड़ों बंगालीभाषी मुसलमानों और रोहिंग्या शरणार्थियों को “अवैध अप्रवासी” बताकर देश से निकाल दिया. सरकारी तंत्र ने सरकार के आलोचकों पर कार्रवाई की और मीडिया को खुद पर सेंसर लागू करने का दबाव डाला. इससे सरकारी अधिकारियों और भाजपा समर्थकों द्वारा लोगों को हैरान-परेशान करने की घटनाओं को बढ़ावा मिला.
ह्यूमन राइट्स वॉच की एशिया डायरेक्टर एलेन पियर्सन ने कहा, “भारत सरकार ने भेदभावपूर्ण नीतियों, नफरत भरे भाषणों और राजनीतिक रूप से प्रेरित मुकदमों के ज़रिए धार्मिक अल्पसंख्यकों, हाशिए के समूहों और आलोचकों के खिलाफ हिंसा को सामान्य घटना बना दिया है. भारत को मानवाधिकारों के लिए वैश्विक स्तर पर आवाज़ बुलंद करने वाले देश के रूप में आगे बढ़ाने की खातिर अपनी दमनात्मक नीतियां बदलने के बजाय, भाजपा सरकार ने पूरी दुनिया में भारत की स्थिति कमजोर की है.”
ह्यूमन राइट्स वॉच ने 529 - पृष्ठों की विश्व रिपोर्ट, जो कि इसका 36वां संस्करण है, में 100 से अधिक देशों में मानवाधिकार स्थितियों की समीक्षा की है. अपने परिचयात्मक आलेख में कार्यकारी निदेशक फिलिप बोलोपियन ने कहा कि दुनिया भर में फैल रहे सत्तावाद की लहर को रोकना वर्तमान समय की सबसे बड़ी चुनौती है. ट्रंप प्रशासन और दूसरी वैश्विक ताकतों के कारण मानवाधिकारों पर अभूतपूर्व खतरा मंडरा रहा है. बोलोपियन ने आह्वान किया कि बुनियादी आज़ादी की रक्षा के लिए अधिकारों का सम्मान करने वाले लोकतंत्र और नागरिक समाज एक रणनीतिक गठबंधन का निर्माण करें.
• अप्रैल में, जम्मू और कश्मीर में बंदूकधारियों द्वारा हिंदू पर्यटकों को निशाना बनाकर किए गए जानलेवा हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच चार दिनों तक सशस्त्र संघर्ष चला. इसके बाद, भारतीय सरकारी तंत्र ने विरोध के स्वर को कुचलने के लिए कुछ स्वतंत्र मीडिया संस्थानों और समीक्षकों को थोड़े समय के लिए प्रतिबंधित कर दिया, सोशल मीडिया पर टिप्पणियों के लिए लोगों को गिरफ्तार किया और शिक्षाविदों एवं व्यंग्यकारों के खिलाफ मामले दर्ज किए.
• इस दौर में, हिंदू राष्ट्रवादी समूहों के नफ़रत भरे भाषण और मुसलमानों के खिलाफ़ हमले बढ़े. सरकारी तंत्र ने मुसलमानों के घरों और संपत्तियों को गैर-कानूनी तरीके से ध्वस्त करना जारी रखा. ये कार्रवाइयां, जो कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लंघन थीं, इन दावों के आधार पर की गईं कि वे अवैध निर्माण थे, कथित उग्रवादियों से संबंधित थे या उन पर “अवैध प्रवासियों” का कब्ज़ा था.
• सितंबर में, लद्दाख में स्वायत्तता की मांग को लेकर जारी विरोध प्रदर्शन के हिंसक होने और प्रदर्शनकारियों द्वारा पुलिस वाहन और भाजपा के दफ्तरों में आग लगाने के बाद पुलिस कार्रवाई में चार लोग मारे गए. अधिकारियों ने मोबाइल इंटरनेट अस्थायी रूप से बंद कर दिया और शिक्षक एवं जलवायु एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत राजनीति से प्रेरित मामले में गिरफ्तार कर लिया.
• छात्रों सहित कई एक्टिविस्ट बिना किसी आरोप के दमनकारी आतंकवाद-निरोधी कानून के तहत जेल में बंद रहे. सरकारी तंत्र ने एक्टिविस्ट, नागरिक समाज समूहों और भाजपा के राजनीतिक विरोधियों को हैरान-परेशान करने और उन पर मुकदमा चलाने के लिए विदेशी सहायता संबंधी कानूनों, आतंकवाद-निरोधी कानूनों, फ़र्जी वित्तीय जांच और अन्य तौर-तरीकों का इस्तेमाल किया.
• चुनाव आयोग पर विपक्षी नेताओं और अधिकार कार्यकर्ताओं ने मतदान में हेरा-फेरी और मतदाता सूची में गड़बड़ी समेत पक्षपात करने के अनेकानेक आरोप लगाए.
ह्यूमन राइट्स वॉच ने कहा कि भारतीय सरकारी तंत्र को चाहिए कि मुसलमानों, ईसाइयों और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ भेदभावपूर्ण नीतियों, नफरत भरे भाषणों और उनके विरुद्ध गैर-कानूनी कार्रवाइयों पर रोक लगाए तथा पीड़ितों के लिए न्याय सुनिश्चित करे. उन्हें नागरिक समाज समूहों, भाजपा के राजनीतिक विरोधियों और शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को हैरान-परेशान करना और उन पर मुकदमा चलाना बंद करना चाहिए. साथ ही, उन्हें एक्टिविस्टों और अन्य आलोचकों के खिलाफ राजनीति से प्रेरित तमाम मामलों को तुरंत वापस कर लेना चाहिए.