हिंदू राष्ट्रवादी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाली सरकार के तहत भारत का सत्तावाद की ओर फिसलना जारी रहा. इस दौरान मुसलमानों और सरकार के आलोचकों को खूब बदनाम किया गया. सरकारी तंत्र ने सैकड़ों बंगालीभाषी मुसलमानों और रोहिंग्या शरणार्थियों, जिनमें कुछ भारतीय नागरिक भी शामिल थे, को यह दावा करते हुए कि वे “अवैध अप्रवासी” हैं, गैर-कानूनी तरीके से बांग्लादेश भेज दिया.
भारत और पाकिस्तान खतरनाक तौर पर पूर्ण युद्ध के कगार पर पहुंच गए जब बंदूकधारियों ने हिंदू पर्यटकों को निशाना बनाते हुए जानलेवा हमले किए. इस हमले में 26 लोग मारे गए. भारत ने इस हमले के लिए पाकिस्तान में मौजूद समूहों को ज़िम्मेदार ठहराया और कथित उग्रवादियों को लक्ष्य बनाते हुए हवाई हमले किए. पाकिस्तान ने ड्रोन और एयरस्ट्राइक से जवाबी कार्रवाई की, फिर भारत की तरफ से हमले बढ़े. दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर नागरिकों को निशाना बनाने का आरोप लगाया.
भारत के दमनकारी आतंकवाद-निरोधी कानून के तहत छात्रों समेत कई एक्टिविस्ट बिना मुकदमे के जेलों में बंद हैं. सरकार ने शांतिपूर्ण आवाजों को दबाने और साथ ही पत्रकारों, एक्टिविस्टों एवं सोशल मीडिया इन्फ्लुएंर्स को निशाना बनाने के लिए संशोधित आपराधिक कानून का इस्तेमाल किया. सरकारी तंत्र ने भाजपा के राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाने के लिए वित्तीय अनियमितताओं के आरोप भी लगाए.
संयुक्त राष्ट्र से जुड़े ग्लोबल अलायंस ऑफ नेशनल ह्यूमन राइट्स इंस्टीट्यूशंस ने राजनीतिक दखलअंदाजी के कारण भारत के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की ग्रेडिंग कम करने की सिफारिश की. विपक्ष के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने चुनाव आयोग की स्वतंत्रता में कमी पर गहरी चिंता व्यक्त की.
मोदी प्रशासन के मानवाधिकार रिकॉर्ड में लगातार गिरावट के बावजूद, कई देशों ने भारत के साथ सुरक्षा, आर्थिक और व्यापारिक संबंधों को मजबूत किया.
जम्मू और कश्मीर
अप्रैल में, पहलगाम शहर में बंदूकधारियों ने 26 लोगों को मार डाला, मरनेवालों में ज़्यादातर हिंदू पर्यटक थे. इस घटना के कारण दोनों देशों के बीच चार दिनों तक सशस्त्र संघर्ष हुआ. रिपोर्ट के अनुसार, कम-से-कम 16 भारतीय मारे गए, जबकि पाकिस्तान ने दावा किया कि भारतीय हवाई हमलों में उसके 40 आम नागरिक और 11 सैनिक हताहत हुए.
सरकारी तंत्र ने विरोध के स्वर को दबाते हुए कुछ स्वतंत्र मीडिया संस्थानों और समीक्षकों पर थोड़े समय के लिए प्रतिबंध लगा दिए और कुछ शिक्षाविदों एवं व्यंग्यकारों के खिलाफ मामले दर्ज किए. उन्होंने कथित उग्रवादियों के घर भी ध्वस्त कर दिए जबकि सुप्रीम कोर्ट ने दूसरी जगहों पर की गई ऐसी तोड़फोड़ के बाद इस तरह की कार्रवाइयों पर पहले ही रोक लगा रखी थी.
समाचार नेटवर्क और सोशल मीडिया यूजर्स द्वारा गुस्से से भरी बयानबाजी से विभिन्न राज्यों में मुसलमानों, खास तौर से कश्मीरी छात्रों, वेंडर्स और मज़दूरों के खिलाफ हिंदू भीड़ के हमले बढ़े. पीड़ितों को डराया-धमकाया गया और उन्हें हमलों का सामना करना पड़ा.
अगस्त में, भारतीय सरकारी तंत्र ने जम्मू और कश्मीर पर लिखी 25 किताबों को “अलगाववाद को बढ़ावा देने वाला” करार देते हुए प्रतिबंधित कर दिया और इस क्षेत्र की किताब दुकानों पर छापे मारे. पूरे साल सुरक्षा बलों पर मनमाने ढंग से हिरासत में लेने, यातनाएं देने और गैर-न्यायिक हत्याओं के आरोप लगे.
सितंबर में लद्दाख को राज्य का दर्जा देने की मांग को लेकर राजधानी लेह में विरोध प्रदर्शन हिंसक हो गए और प्रदर्शनकारियों ने पुलिस वाहन एवं भाजपा पार्टी कार्यालयों में आग लगा दी. इस दौरान पुलिस कार्रवाई में चार लोगों की मौत हो गई. अधिकारियों ने मोबाइल इंटरनेट बंद कर दिया और शिक्षाविद एवं जलवायु एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक को हिंसा भड़काने के आरोप में राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत गिरफ्तार कर लिया. वांगचुक शांतिपूर्ण मार्च और भूख हड़ताल के जरिए इस क्षेत्र को राज्य का दर्जा देने के मुद्दे पर आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे. गौरतलब है कि यह क्षेत्र पहले जम्मू और कश्मीर का हिस्सा था लेकिन अगस्त 2019 में यह केंद्र शासित प्रदेश के रूप में एक अलग प्रशासनिक इकाई बन गया.
सुरक्षा बलों को अभयदान
इस दौर में, यातना और गैर-न्यायिक हत्याओं के आरोप लगते रहे. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने 2025 के पहले आठ माह में पुलिस हिरासत में 113 मौतें, न्यायिक हिरासत में 1,535 मौतें एवं 132 कथित गैर-न्यायिक हत्याएं दर्ज कीं.
जम्मू और कश्मीर एवं कई उत्तर-पूर्वी राज्यों में सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) अधिनियम लागू रहा. यह अधिनियम मानवाधिकार उल्लंघन के गंभीर मामलों में भी सुरक्षा बलों को अभियोजन से प्रभावी सुरक्षा प्रदान करता है. फरवरी में, जम्मू और कश्मीर में 25 साल के एक व्यक्ति ने आत्महत्या कर ली. उसने वीडियो पर रिकॉर्ड किए गए अपने आखिरी संदेश में आरोप लगाया कि पुलिस ने उसे उग्रवादी समूहों से संबंध होने का झूठा दावा कर प्रताड़ित किया. उसी माह एक और व्यक्ति को सुरक्षा बलों ने कथित तौर पर उस समय गोली मारी, जब वह एक जांच-चौकी से डरकर भाग रहा था.
रिपोर्ट्स के अनुसार, भारतीय सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) ने 2025 के पहले चार माह में भारत-बांग्लादेश सीमा पर कम-से-कम 10 बांग्लादेशियों की कथित तौर पर हत्या कर दी. बीएसएफ ने बांग्लादेशी सीमा पर अक्सर बेख़ौफ़ होकर अत्यधिक बल प्रयोग किया है, जिसमें भारतीयों के साथ-साथ बांग्लादेश के अनियमित अप्रवासी और मवेशी व्यापारी निशाना बने हैं।
धार्मिक और नृजातीय अल्पसंख्यकों, दलितों और आदिवासी समूहों पर हमले
जम्मू और कश्मीर में हुए घातक हमले के बाद मुसलमानों के खिलाफ नफरती भाषण बढ़े और हमले के 10 दिनों के भीतर कम-से-कम ऐसी 64 घटनाएं दर्ज की गईं. कई राज्यों में मुसलमानों पर हमले हुए. उत्तर प्रदेश में एक हिंदू ने स्वीकार किया कि उसने कश्मीर हमले का बदला लेने के लिए एक मुस्लिम मज़दूर को गोली मार दी. कर्नाटक में, क्रिकेट मैच के दौरान कथित तौर पर पाकिस्तान के समर्थन में नारे लगाने के कारण एक मुस्लिम की हत्या कर दी गई. मुंबई में पुलिस ने मुस्लिम फेरीवालों पर हमला करने के आरोप में नौ बीजेपी कार्यकर्ताओं के खिलाफ मामला दर्ज किया.
अप्रैल से शुरू अभियान में, सरकारी तंत्र ने भाजपा-शासित राज्यों से सैकड़ों बंगालीभाषी मुसलमानों को “अवैध अप्रवासी” घोषित करते हुए बगैर किसी कानूनी प्रक्रिया के बांग्लादेश भेज दिया. कई लोगों ने बताया कि उन्हें भारतीय सीमा सुरक्षा बलों ने धमकाया और उनके साथ मारपीट की. बांग्लादेश के अधिकारियों ने बताया कि भारत ने मई और जून माह में 1,500 से ज़्यादा पुरुषों, महिलाओं और बच्चों को निष्कासित किया. हालांकि, उनमें कई भारतीय नागरिक निकले, जिनमें ज़्यादातर बांग्लादेश की सीमा से लगे राज्यों के गरीब प्रवासी मज़दूर थे. ऐसी ही एक कार्रवाई के दौरान, गुजरात के अधिकारियों ने 10 हजार से ज़्यादा ढांचों को यह दावा करते हुए गिरा दिया कि उन पर “अवैध बांग्लादेशी अप्रवासियों” का कब्ज़ा है. सरकारी तंत्र ने ऐसा सुप्रीम कोर्ट के नवंबर 2024 के उस फैसले के खिलाफ जाते हुए किया जिसमें इस तरह के मनमाने और दंडात्मक विध्वंस को गैरकानूनी घोषित किया गया था.
ज़बरन बांग्लादेश भेजे गए लोगों में कम-से-कम 300 को असम से निकाला गया. भाजपाई मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की सरकार ने जुलाई और अगस्त में कम-से-कम सात ऐसे अभियान चलाये जिनमें ढांचों को ध्वस्त किया गया. इससे 5,000 से ज़्यादा परिवार बेघर हो गए, जिनमें ज़्यादातर बंगालीभाषी मुसलमान थे. जुलाई में, गोलपारा ज़िले में ऐसे ही एक बेदखली अभियान में प्रदर्शनकारियों के साथ हुई हिंसक झड़प के दौरान प्रशासन द्वारा गोलीबारी में 19 साल के एक युवक की मौत हो गई.
फरवरी में, मणिपुर के भाजपाई मुख्यमंत्री, जो एक विभाजनकारी नेता थे, के इस्तीफे के बावज़ूद नृजातीय समूहों के बीच हुए नई झड़पों के बाद केंद्र सरकार ने राष्ट्रपति शासन लगा दिया. अभी तक, राज्य सरकार नृजातीय हिंसा खत्म नहीं कर पाई, जिसमें मई 2023 से कम-से-कम 260 लोगों की जानें गईं और 60,000 से ज़्यादा लोग विस्थापित हुए. जून में, सरकार ने पांच लोगों को गिरफ्तार किया, जिनमें प्रभावशाली मैतेई समुदाय के सशस्त्र विजलैंटी समूह का प्रमुख शामिल था. इस करवाई के बाद वहां कर्फ्यू लगा दिया गया और इंटरनेट सेवा बंद कर दी गई.
सुरक्षा बलों ने माओवादी विद्रोहियों के खिलाफ़ जनवरी 2024 में शुरू हुए उग्रवाद विरोधी अभियानों में तेजी लाई. इससे पूरे मध्य और पूर्वी भारत में सुरक्षा बलों की मौजूदगी बढ़ गई. खासकर छत्तीसगढ़ के बस्तर ज़िले में ऐसा हुआ जहां कई आदिवासी समुदाय रहते हैं. जुलाई में, सुरक्षा बलों ने दावा किया कि ऑपरेशन शुरू होने के बाद उन्होंने 460 कथित माओवादियों को मार गिराया है. नागरिक समाज समूहों ने ग्रामीण आदिवासियों का बड़े पैमाने पर उत्पीड़न किए जाने का आरोप लगाया, जिसमें गैर-न्यायिक हत्याएं शामिल हैं. सरकारी तंत्र ने मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया, उन पर माओवादी या माओवादी समर्थक होने का आरोप लगाते हुए राजनीति से प्रेरित मामले दर्ज किए. हिंदू अतिवादी समूहों ने राज्य में दलित और आदिवासी ईसाइयों को निशाना बनाया. लिहाजा, इस समुदाय को हिंसक हमलों, सामाजिक बहिष्कार और आर्थिक अलगाव का सामना करना पड़ा.
नागरिक समाज और संगठन निर्माण की स्वतंत्रता
भारतीय सरकारी तंत्र ने कार्यकर्ताओं और नागरिक समाज समूहों को हैरान-परेशान करने और उन पर मुकदमा चलाने के लिए विदेशी योगदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) जैसे विदेशी सहायता संबंधी कानूनों, आतंकवाद-निरोधी कानूनों, फ़र्जी वित्तीय जांच और अन्य तौर-तरीकों का इस्तेमाल किया. मार्च में, प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारियों ने विदेशी दान-दाताओं से जुड़े कई संगठनों के परिसरों पर छापा मारा. मई में, भारत सरकार ने कहा कि विदेशी धन प्राप्त करने वाली गैर-लाभकारी संस्थाओं को कोई समाचार सामग्री प्रकाशित या प्रसारित करने की इजाज़त नहीं दी जाएगी.
दिल्ली हाई कोर्ट ने छात्र एक्टिविस्ट - उमर खालिद, शरजील इमाम, गुलफिशा फातिमा और छह अन्य लोगों को जमानत देने से इनकार कर दिया. ये छह लोग यह रपट लिखे जाने तक पांच साल से ज़्यादा समय से जेल में बंद हैं और इनके मामलों की सुनवाई भी शुरू नहीं हुई है. उन्हें भेदभावकारी नागरिकता (संशोधन) कानून के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों के बाद फरवरी 2020 में दिल्ली में हुई हिंसा के सिलसिले में आतंकवाद-निरोधी कानून, गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम के तहत गिरफ्तार किया गया था.
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
सरकार ने आपराधिक मुकदमों और कंटेंट हटाने या सोशल मीडिया अकाउंट निलंबित करने के मनमाने और असंगत आदेशों के ज़रिए मीडिया की आज़ादी और शांतिपूर्ण ऑनलाइन अभिव्यक्ति को सेंसर किया. छोटे शहरों और कस्बों में क्षेत्रीय प्रकाशनों के लिए काम करने वाले रिपोर्टरों की गिरफ्तारी के मामले ज़्यादा सामने आए. सितंबर में, सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने कई समाचार संगठनों, पत्रकारों और कंटेंट क्रिएटर्स को कथित तौर पर अडानी एंटरप्राइजेज को बदनाम करने वाले 138 यूट्यूब वीडियो और 83 इंस्टाग्राम पोस्ट हटाने का आदेश दिया. अडानी एंटरप्राइजेज एक भारतीय अरबपति की कंपनी है जिसके प्रधानमंत्री मोदी के साथ करीबी संबंध होने की बात कही जाती है.
अप्रैल में, जम्मू और कश्मीर में हुए जानलेवा हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के दरमयान बढ़ते तनाव के बीच, भारतीय सरकारी तंत्र ने कई समाचार संगठनों के सोशल मीडिया एकाउंट्स और वेबसाइट्स पर प्रतिबंध लगा दिया. एक्स ने बताया कि उसे सरकार ने 8,000 से ज़्यादा एक्स अकाउंट को प्रतिबंधित करने का आदेश दिया, ऐसे ज़्यादातर मामलों में कार्रवाई हेतु कोई “सबूत या कारण” उपलब्ध नहीं कराया गया. असम के भाजपाई मुख्यमंत्री ने सोशल मीडिया कमेंट्स के लिए 97 लोगों, जिनमें ज़्यादातर मुस्लिम थे, की गिरफ्तारी को “राष्ट्र-विरोधी और हिंदू-विरोधी अपराधियों” के खिलाफ कार्रवाई बताया.
अगस्त में, सुप्रीम कोर्ट ने ऑनलाइन न्यूज़ वेबसाइट ‘द वायर’ के संपादकों और पत्रकारों को गिरफ्तारी से सुरक्षा प्रदान की. इन लोगों पर असम सरकार ने दो मामलों में राजद्रोह के मुकदमे दर्ज किए थे. अनेक मीडिया संगठनों ने इसकी निंदा की. अदालत ने मई में जाने-माने मुस्लिम शिक्षाविद अली खान महमूदाबाद को भी ज़मानत दे दी. इन्हें कश्मीर हमले के सिलसिले में अपने एक सोशल मीडिया पोस्ट के लिए इसी माह के शुरू में गिरफ्तार किया गया था.
महिला और बालिका अधिकार
महिलाओं और लड़कियों को यौन हिंसा का शिकार होना पड़ा और न्याय एवं सहायता सेवाएं प्राप्त करने में उनकी राह में बाधाएं खड़ी रहीं. जुलाई में, राजधानी दिल्ली के पास गुरुग्राम में एक 25 वर्षीय टेनिस खिलाड़ी की उसके पिता ने गोली मारकर हत्या कर दी. कर्नाटक में, राज्य सरकार ने मंदिरों के शहर धर्मस्थला में महिलाओं और लड़कियों की बड़ी तादाद में हत्या और बलात्कार के आरोपों की विशेष जांच टीम का गठन किया. यह कार्रवाई एक सफाई कर्मचारी की शिकायत पर की गई. सफाई कर्मी ने यह दावा किया था कि उसने कथित तौर पर मंदिर प्रबंधकों और कर्मचारियों के कहने पर 1995 और 2014 के बीच इस क्षेत्र में कई शवों को दफनाया.
सितंबर में, सुप्रीम कोर्ट ने कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 के तहत राजनीतिक दलों को नियोक्ता के रूप में शामिल करने की याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया इससे नई मुसीबतों का पिटारा खुल जाएगा.
यौन उन्मुखता और लैंगिक पहचान
मई में, मद्रास हाई कोर्ट ने समलैंगिक जोड़ों को परिवार बनाने की अनुमति प्रदान की. अपने इस फैसले में अदालत ने यह भी कहा कि ऐसा करने के लिए “शादी एकमात्र तरीका नहीं है,” हालांकि भारत के सुप्रीम कोर्ट ने 2023 में समलैंगिक शादी को कानूनी मान्यता देने से इनकार कर दिया था. जून में, आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने ट्रांसजेंडर महिलाओं को महिला के रूप में मान्यता दी और उन्हें कानून के तहत समान सुरक्षा का हकदार माना.
शरणार्थी अधिकार
भारतीय सरकारी तंत्र ने गैर-कानूनी तरीके से बड़े पैमाने पर रोहिंग्या शरणार्थियों को देश से निकाल दिया, जिनमें से कम-से-कम 192 को बांग्लादेश भेजा गया. यह कार्रवाई संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी (यूएनएचसीआर) में उनके रजिस्टर्ड शरणार्थी होने के बावज़ूद की गई. कई लोगों ने आरोप लगाया कि भारतीय सीमा अधिकारियों ने उनके साथ दुर्व्यवहार किया. अन्य सैकड़ों लोगों को मनमाने ढंग से हिरासत में लिया गया और निर्वासित करने की धमकी दी गई. इसी बीच, ऐसी कार्रवाई से बचने के लिए अनेक लोग दिल्ली, आंध्र प्रदेश और जम्मू-कश्मीर से दूसरी जगहों में भाग गए.
मई में, भारतीय अधिकारियों ने 40 रोहिंग्या शरणार्थियों को नौसेना के एक जहाज पर बिठाया. चालक दल ने कथित तौर पर शरणार्थियों को पीटा और उनसे पूछताछ की, उन्हें लाइफ जैकेट दीं, और फिर उन्हें म्यांमार तट के पास धक्का देकर समुद्र में गिरा दिया. उन्हें तैर कर किनारे पर जाने के लिए मजबूर किया गया, और वे म्यांमार के तनिंथरी क्षेत्र के लाउंगलॉन शहर पहुंचे. म्यांमार में मानवाधिकारों की स्थिति पर संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूत ने कहा कि इस घटना ने “उन लोगों की जीवन और सुरक्षा के प्रति घोर उपेक्षा को प्रदर्शित किया है जिन्हें अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा की बेहद जरुरत है.”
अंतर्राष्ट्रीय किरदार और विदेश नीति
ट्रम्प प्रशासन द्वारा बहुत ज्यादा टैरिफ की घोषणा के बाद भारत-अमेरिका संबंधों में तेज़ी से गिरावट आई. यह कार्रवाई इस आधार पर की गई कि नई दिल्ली रूस से तेल आयात के ज़रिए यूक्रेन के खिलाफ रूस के युद्ध में मदद पहुंचा रहा है. हालांकि, अमेरिका और अन्य देशों ने मोदी प्रशासन से मानवाधिकार संबंधी उसके बिगड़ते रिकॉर्ड को ठीक करने को नहीं कहा.
मोदी सरकार ने रूस और इज़राइल सहित अन्य सरकारों द्वारा मानवाधिकार उल्लंघनों की सार्वजनिक आलोचना नहीं की, लेकिन संयुक्त राष्ट्र महासभा में फिलिस्तीन मुद्दे के शांतिपूर्ण निपटारे और दो राष्ट्र सिद्धांत को लागू करने संबंधी प्रस्ताव के समर्थन में मतदान किया.
सितंबर में, यूरोपियन यूनियन (ईयू) ने अपना “नया रणनीतिक ईयू-भारत एजेंडा” पेश किया, जिसे बाद में ईयू के विदेश मंत्रियों ने सर्वसम्मति से मंज़ूरी दी. इस दस्तावेज़ में करीबी द्विपक्षीय सहयोग के कई क्षेत्रों को शामिल करते हुए भारत को “दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र” और “समान सोच वाला और भरोसेमंद साथी” बताकर उसकी तारीफ की गई है. लेकिन इसमें भारत में गहराते मानवाधिकार संकट को जानबूझकर नज़रअंदाज़ किया गया है. रिपोर्ट लिखे जाने तक, दोनों के बीच मुक्त व्यापार वार्ता जारी थी और यह साफ़ नहीं था कि समझौते में जरुरी मानवाधिकार दायित्व शामिल होंगे या नहीं.
अगस्त में प्रधानमंत्री मोदी चीन गए, जहां उन्होंने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात की और शंघाई सहयोग संगठन शिखर सम्मेलन में हिस्सा लिया. यह उनकी सात साल में पहली चीन यात्रा थी. इस यात्रा को भारत और चीन के बीच बढ़ते मेल-मिलाप के कदम के तौर पर देखा गया. दोनों देशों ने सीमा पर तनाव कम करने पर वार्ता की.