कश्मीर के श्रीनगर में प्रतिबंधों के दौरान तैनात अर्द्ध सैनिक बल का जवान. 

© 2019 साकिब मजीद/सोपा इमेजेज/ सिपा यूएसए

(न्यूयॉर्क) - भारत सरकार को चाहिए कि बिना कोई संज्ञेय अपराध के आरोप में नज़रबंद कश्मीरियों को तुरंत रिहा करे. 5 अगस्त, 2019 को भारत की संसद द्वारा जम्मू और कश्मीर की स्वायत्त संवैधानिक स्थिति ख़त्म करने और इसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांटने के साथ राजनीतिक नेताओं और विपक्षी कार्यकर्ताओं सहित हजारों कश्मीरियों को सुरक्षात्मक नज़रबंदी में ले लिया गया है.

नज़रबंद लोगों में करीब 400 निर्वाचित प्रतिनिधि और राजनीतिक नेताओं के अलावा नेशनल कांफ्रेंस और जम्मू एंड कश्मीर पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री शामिल हैं. खबरों के अनुसार सरकार ने राजनीतिक दलों के समर्थकों, अलगाववादी नेताओं, वकीलों, पत्रकारों सहित कथित रूप से हिंसक प्रदर्शनों में शरीक होने की पृष्ठभूमि वाले करीब 4 हजार लोगों को नज़रबंद कर रखा है. यातना और मार-पीट के गंभीर आरोप सामने आए हैं. बहुत से नज़रबंद  लोगों को अपने परिजनों और वकीलों से मिलने नहीं दिया जा रहा है. रायटर्स द्वारा देखे गए एक दस्तावेज के मुताबिक़ 6 सितंबर तक सरकार ने 3800 से अधिक लोगों को गिरफ़्तार किया और उनमें से 2600 लोगों को रिहा कर दिया. ह्यूमन राइट्स वॉच ने कहा है कि सरकार को नज़रबंद लोगों की सूची जारी करनी चाहिए और उनके अता-पता के बारे में बताना चाहिए.

ह्यूमन राइट्स वॉच की दक्षिण एशिया निदेशक मीनाक्षी गांगुली ने कहा, “कश्मीर में अपराध के सबूत के बगैर नज़रबंद तमाम लोगों को तुरंत बिना शर्त रिहा किया जाना चाहिए. साथ ही सरकार के लिए यह ज़रूरी है कि वह हर नज़रबंद व्यक्ति को अपने वकीलों और परिवार के सदस्यों से मिलने की इजाज़त दे.”

मनमाने ढंग से नज़रबंदी के अलावा सरकार ने बेरोकटोक आवाजाही पर भी कठोर पाबंदियां लगाई हैं और सार्वजनिक जलसों को प्रतिबंधित कर दिया है. इसने इंटरनेट और मोबाइल फ़ोन सेवाओं पर प्रतिबंध जारी रखा है.

सरकार ने कई मामलों में बिना कोई वैध आधार बताए लोगों को हिरासत में लिया है या उन्हें घरों में नज़रबंद कर दिया है. जम्मू एंड कश्मीर पीपल्स मूवमेंट के शाह फैसल को सरकार की कार्रवाई की आलोचना करने पर भारत से बाहर जाने से रोका गया और हिरासत में ले लिया गया. एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने ट्वीट किया कि फैसल “नई वास्तविकताओं” को स्वीकार करने के बजाए “निराशा” फैला रहे थे. सरकार ने एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के ज़वाब में अदालत को बताया कि उन्हें देश के ख़िलाफ़ लोगों को “भड़काने” के कारण हिरासत में रखा गया है. ह्यूमन राइट्स वॉच ने कहा कि इनमें से कोई भी आरोप हिरासत का पर्याप्त आधार नहीं है. वह अब भी हिरासत में हैं. 13 सितंबर को फैसल ने हिरासत में रखे गए अन्य लोगों, जिनकी “किसी वकील या अन्य कानूनी उपायों तक पहुंच नहीं है,” के प्रति एकजुटता दिखाते हुए अपनी याचिका वापस ले ली.

वकीलों का दावा है कि मामलों को अदालत में लंबा खींचने के लिए सरकार जवाब देने में देरी कर रही है. एक वकील ने ह्यूमन राइट्स वॉच को बताया, “बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर त्वरित फैसला लिया जाना चाहिए लेकिन हिरासतों का कानूनी आधार बताने के लिए राज्य से कोई ठोस ज़वाब नहीं मिला है. इसी तरह, प्रतिबंधों को चुनौती देने वाली याचिकाओं के मामले में सरकार ने अब तक अदालत को वे आदेश भी उपलब्ध नहीं कराए हैं जिनके आधार पर व्यापक प्रतिबंध लगाए गए हैं.”

सुप्रीम कोर्ट ने 5 सितंबर को सरकार को आदेश दिया कि वह श्रीनगर में घर में नज़रबंद भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के बीमार नेता मोहम्मद यूसुफ़ तारिगामी को दिल्ली के किसी अस्पताल में स्थानांतरित करे. पार्टी महासचिव ने याचिका दायर की थी कि परिवार पर प्रतिबंधों के कारण तारिगामी को समुचित इलाज़ नहीं मिल पा रहा है और “किसी को भी उनके घर आने-जाने की अनुमति नहीं है.” अदालत ने सरकार को यह आदेश भी दिया कि वह नज़रबंद पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती की बेटी सहित अन्य लोगों को भी अपने रिश्तेदारों से मिलने की इजाज़त दे.

अनेक राजनीतिक नेताओं को घरों में नज़रबंद रखा जा रहा है. इनमें कश्मीरी राजनीतिक दलों के ऐसे समर्थक शामिल हैं जो कश्मीरी लड़ाको के चुनाव बहिष्कार आह्वान को नजरअंदाज करने के कारण उनकी हिंसा, धमकी और उत्पीड़न का शिकार हो चुके हैं.

जम्मू एंड कश्मीर पीपल्स कांफ्रेंस के नेता और श्रीनगर के मेयर जुनैद अज़ीम मट्टू को नज़रबंदी से रिहा कर कैंसर के इलाज़ के लिए दिल्ली जाने की इजाज़त दी गई. नज़रबंदी से बाहर आने पर उन्होंने मीडिया को दिए साक्षात्कार में कश्मीर में भारत सरकार की कार्रवाई की आलोचना की. इलाज से वापस लौटने पर 3 सितंबर को उन्हें फिर से घर में नज़रबंद कर दिया गया. मट्टू ने पत्रकारों से कहा, “मुख्यधारा में शामिल कार्यकर्ताओं पर हो रहे उत्पीड़न पर यक़ीन नहीं होता. मेरे कई पार्टी कार्यकर्ता नज़रबंद हैं.”

अज्ञात संख्या में ऐसे लोगों को जन सुरक्षा कानून के तहत हिरासत में लिया गया है जिनका नाम पुलिस रिकॉर्ड में पहले हुए हिंसक प्रदर्शनों में भाग लेने वालों या “पत्थरबाज” के रूप में दर्ज है. यह जन सुरक्षा क़ानून एक विवादित कानून है जो बिना आरोप या सुनवाई के दो साल तक हिरासत की अनुमति देता है. अन्य लोगों को इस्तगासा पर रिहा कर दिया गया, यह कश्मीरियों द्वारा ऐसे लोगों के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द है जो पुलिस द्वारा संदेह के आधार पर हिरासत में तो लिए जाते हैं लेकिन फिर जिन्हें स्थानीय ग्रामीण प्राधिकारों के प्रमाणपत्र के बाद रिहा कर दिया जाता है. हालांकि कोई मामला दर्ज नहीं किया जाता, लेकिन उन पर नज़र रखी जाती है और जब-तब उन्हें स्थानीय थाने में नियमित हाज़िरी लगाने के लिए कहा जाता है.

कुछ कश्मीरियों ने ह्यूमन राइट्स वॉच को बताया कि भारतीय सुरक्षा बल ने संदिग्धों को खोजने में नाकाम रहने पर उनके परिजनों को भी हिरासत में लिया है. यह सामूहिक सज़ा की तरह है जो कि अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून का उल्लंघन है.

7 सितंबर को, भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने एनडीटीवी को बताया कि सरकार के पास हिरासत में लिए गए लोगों की रिहाई के लिए कोई निश्चित योजना नहीं हैं. उन्होंने कहा, “हम पूरे हालात को लेकर बहुत सतर्क हैं. कोई मानवाधिकार उल्लघंन नहीं हुआ है.”

बिना आरोप के लंबे समय तक हिरासत अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानूनों के तहत भारत के दायित्वों का उल्लघंन है. नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय समझौता, भारत जिसका हिस्सा है, मनमाने ढंग से गिरफ्तारी और नज़रबंदी का निषेध करता है. हिरासत में लिए गए किसी भी व्यक्ति को फ़ौरन जज के समक्ष पेश किया किया जाना चाहिए और गिरफ्तारी और नज़रबंदी की वजह और उस पर लगे आरोपों के बारे में बताया जाना चाहिए. उन्हें अपने वकील और परिवार के सदस्यों तक तुरंत पहुंच होनी चाहिए.

जन सुरक्षा कानून के तहत हिरासत में लिए गए और जम्मू और कश्मीर से बाहर स्थानांतरित किए गए लोगों के पास अपने बचाव की तैयारी और अपनी पसंद के वकील के साथ संवाद करने के लिए पर्याप्त समय और सुविधाएं होनी चाहिए. संयुक्त राष्ट्र संधि निकायों और विशेष प्रक्रियाओं ने भारत से जन सुरक्षा अधिनियम में संशोधन की अपील की है जिससे कि यह सुनिश्चित किया जा सके कि यह अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार दायित्वों के अनुरूप हो.

ह्यूमन राइट्स वॉच ने कहा है कि जेनेवा के अपने मौजूदा सत्र में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद को भारत से आग्रह करना चाहिए कि वह संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त की रिपोर्ट की सिफारिशों पर अमल करे. न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा की आगामी बैठक में, भारत के अंतर्राष्ट्रीय साझेदारों को भारतीय अधिकारियों के साथ अपने संवाद में मानवाधिकार संबंधी चिंताओं पर जोर देना चाहिए और अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों को बनाए रखने के लिए सरकार पर दबाव डालना चाहिए.

गांगुली ने कहा, “भारत अपने भविष्य के बारे में कश्मीरियों की आवाज दबाकर, राजनीतिक नेताओं को जेल में डालकर और बुनियादी स्वतंत्रता को निलंबित कर मानवाधिकारों के प्रति अपनी प्रतिबद्धताओं का मजाक उड़ा रहा है. सरकार के कड़े कदम खराब स्थिति को और बदतर बना रहे हैं.”