मानव ढाल के रूप में इस्तेमाल किए जाते हुए 26 वर्षीय फारूक अहमद डार की तस्वीर.

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(न्यू यॉर्क, 1 जून, 2017) - ह्यूमन राइट्स वॉच ने आज कहा कि, "मानवाधिकारों के गंभीर उल्लंघन जैसे कार्यों में शामिल एक अधिकारी को भारतीय सेना द्वारा पुरस्कार सेना की जवाबदेही और कद को कम कर देता है. 22 मई, 2017 को जम्मू और कश्मीर में भीड़ से घिरे सुरक्षाकर्मियों और चुनाव कर्मचारियों को निकालने के लिए मेजर नितिन लेतुल गोगोई की सराहना की गई, जिसमें उन्होंने भीड़   में खड़े एक  तमाशबीन का "मानव ढाल" के रूप में गैरकानूनी इस्तेमाल किया.

अटॉर्नी जनरल, सेना प्रमुख और रक्षा मंत्री सहित कई वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों ने मेजर गोगोई के कृत्य का सार्वजनिक रूप से समर्थन किया है.

ह्यूमन राइट्स वॉच की दक्षिण एशिया निदेशक मीनाक्षी गांगुली ने कहा कि, "सैनिक कश्मीर में एक मुश्किल काम पर हैं और उन्हें जीवन बचाने के लिए पुरस्कृत किया जाना चाहिए, न कि जानबूझकर दूसरों को खतरे में डालने और उनके अधिकारों का उल्लंघन करने के लिए. सेना और सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा  ऐसी नियम-विरुद्ध कार्रवाई  के समर्थन से  भविष्य में सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों  की नियम-विरुद्ध कार्रवाई  और  भड़केगी  .

जुलाई 2016  से, राज्य सुरक्षा बलों   तथा अलगाव  और सुरक्षा बलों के  अत्याचार के खात्मे की मांग करने वाले  हिंसक प्रदर्शनकारियों के बीच संघर्ष में 100 से ज्यादा लोग मारे गए हैं और हजारों घायल हुए हैं॰    इनमें प्रदर्शनकारी, तमाशाई और सुरक्षा बलों के सदस्य शामिल हैं.

गोगोई ने मीडिया को बताया कि 9 अप्रैल को विधानसभा उप-चुनाव के दौरान, बडगाम जिले में सरकार-विरोधी भीड़ ने एक मतदान स्थल को घेर लिया, पत्थर फेंके और इमारत को जलाने की धमकी दी. गोगोई और उनकी टीम ने 26 वर्षीय फारूक अहमद डार को हिरासत में लिया, उन्हें अपने मिलिट्री वाहन के हुड (सामने वाले हिस्से) में बांधा, और घिरे हुए सुरक्षा कर्मियों और चुनाव कर्मचारियों को निकालने के लिए मतदान स्थान पर पहुंची.खबरों के मुताबिक इसके बाद गोगोई ने जीप से बंधे डार के साथ पांच घंटे तक गाड़ी चलाई, डार के सीने पर "पत्थरबाजों" के लिए चेतावनी वाला एक कागज भी चिपका हुआ था. इस दौरान उन्होंने 17 गांवों से गुजरते हुए 28 किलोमीटर तक सफ़र किया. डार ने   उस सुबह अपना वोट डालने  के लिए उग्रवादियों के बहिष्कार को खारिज कर दिया था,   उन्होनें बताया  कि वह अभी भी   दहशत में  हैं. गोगोई ने यह दावा करते हुए अपना   बचाव किया कि उन्होंने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए गोला बारूद का इस्तेमाल नहीं किया और इसप्रकार  लोगों की जान बचाई.

डार के साथ भारतीय सेना का दुर्व्यवहार उनकी स्वतंत्रता और सुरक्षा के अधिकार एवं जैसा कि नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय समझौते में उल्लिखित किया गया है, "यातना या क्रूर, अमानवीय या अपमानजनक व्यवहार या सजा" के विरुद्ध निषेध का उल्लंघन है। . जम्मू-कश्मीर में व्यवस्था बहाल करने के लिए तैनात सैनिकों को कानून प्रवर्तन अधिकारियों द्वारा बल और आग्नेयास्त्रों के उपयोग पर संयुक्त राष्ट्र के बुनियादी सिद्धांतों का पालन करना चाहिए.

डार के साथ सेना के व्यवहार पर उपजे a आम आक्रोश  के कारण सेना को घटना की जांच की घोषणा करनी पड़ी.  हालांकि, ह्यूमन राइट्स वॉच ने कहा है कि जांच जारी रहते गोगोई को अपने कार्यों के लिए पुरस्कृत किया जाना इंगित करता है कि असली जवाबदेही सुनिश्चित किये जाने की संभावना नहीं है. "सूझ-बूझ दिखाने और रक्तपात रोकने के लिए पहल करने" के लिए गोगोई की सराहना की गई है.

ह्यूमन राइट्स वॉच ने कहा कि  विभिन्न वरिष्ठ अधिकारियों ने गोगोई की प्रशंसा करते हुए उनके कृत्य के नियम-विरुद्ध पहलुओं की अनदेखी  या उपेक्षा की। भारत के सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत ने गोगोई को " अभिनव/मौलिक" कहा है.

मीडिया में जनरल रावत का  बयान आया , "लोग हम पर पत्थर  और पेट्रोल बम फेंक रहे हैं. यदि मेरे लोग मुझसे पूछते हैं कि हम क्या करें, तो क्या मैं कहूं कि बस इंतज़ार करें और मर जाएं? मैं राष्ट्रीय ध्वज में लिपटे एक सुन्दर ताबूत के साथ आऊंगा और मैं आपका शरीर सम्मान के साथ घर भेज दूँगा॰ . क्या मुझे सेना प्रमुख के नाते उनसे ऐसा कहना चाहिए? मुझे मोर्चे पर तैनात अपने सैनिकों का मनोबल बनाए रखना है॰”

रक्षा मंत्री अरुण जेटली ने कहा, "जब आप किसी युद्ध जैसे हालात  में हैं, तो इससे  किस तरह से निपटा जाए... हमें अपने सेना के अधिकारियों पर छोड देना चाहिए. इन हालात में उन्हें क्या करना चाहिए, इसके लिए उन्हें सांसदों से परामर्श करने की जरुरत नहीं ."

सूचना एवं प्रसारण मंत्री एम. वेंकैया नायडू ने कहा है कि गोगोई ने "असाधारण परिस्थितियों" में काम किया॰ उन्होंने यह भी कहा कि "वह लोगों की जान बचाना चाहते थे."

 

ह्यूमन राइट्स वॉच ने कहा कि, "गोगोई के कृत्य को भारत के अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी का समर्थन विशेष रूप से कानून के शासन और मानवाधिकारों के उल्लंघन के लिए सुरक्षा बलों का अभियोजन सुनिश्चित करने की संभावना को  धूमिल करता है॰  न्याय सुनिश्चित करने में रोहतगी  की महत्वपूर्ण भूमिका है क्योंकि जम्मू और कश्मीर में तैनात सैनिक सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (एएफएसपीए  के प्रभावी सुरक्षा कवच के तहत कार्य करते हैं॰  यह एक कठोर कानून है  जिसकी व्यापक रूप से आलोचना की गई है.

रोहतगी ने मई में भारत की तीसरी व्यापक सामयिक समीक्षा के दौरान संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में,  इस बात से इनकार किया कि भारतीय सुरक्षा बलों ने दुर्व्यवहार किया है. अफ्स्पा (एएफएसपीए) पर हो रही चिंताओं को दूर करने के लिए, रोहतगी ने जुलाई 2016 के सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश का हवाला दिया, जिसमें कहा गया है कि कानून ने सुरक्षा कर्मियों को हत्या या अपराध के लिए पूरी तरह से सुरक्षा कवच प्रदान नहीं किया है. हालांकि, एक महीने पहले उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय में उसके अपने पहले के एक आदेश की समीक्षा के लिए याचिका दायर की थी जिसमें कहा गया है कि [सैन्य] कार्यवाही के दौरान की गई कार्रवाई को न्यायिक जांच के तहत नहीं रखा जा सकता है. सर्वोच्च न्यायालय ने यह याचिका खारिज कर दी.

1980 के दशक के   उतरार्द्ध से जम्मू और कश्मीर हिंसाग्रस्त है, जब सशस्त्र समूहों, जिनमें से कई पाकिस्तान से संचालित और उसके द्वारा समर्थित थे,  ने हिंदुओं, राजनीतिक नेताओं, अन्य नागरिकों और सुरक्षा कर्मियों को निशाना बनाना शुरू किया था. अगले दो दशकों में, सशस्त्र उग्रवादी समूह और सुरक्षा अधिकारी, दोनों ही , कई गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन के लिए जिम्मेदार रहे हैं. यह हिंसा सितंबर 2001 में संयुक्त राज्य अमेरिका पर हुए हमलों के बाद कम हुई,  जिसके कारण अमेरिका ने  जम्मू और कश्मीर में सक्रिय उग्रवादी  समूहों के प्रति समर्थन खत्म करने के लिए पाकिस्तान पर  दबाव डाला॰

गांगुली ने कहा, "एक के बाद एक आने वाली भारतीय सरकारों ने कश्मीर की स्थिति की अंतरराष्ट्रीय जांच का विरोध संबंधित सरकारों को यह आश्वस्त कराते हुए किया है कि मानवाधिकारों के उल्लंघन को रोकने के लिए कदम उठाए गए हैं. वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा  क्रूर  कृत्य की सार्वजनिक प्रशंसा ऐसे किसी भी यकीन को ख़त्म कर देगी कि सरकार संगीन जुर्म  के लिए सुरक्षा कर्मियों को जवाबदेह बनाने के प्रति गंभीर है."