बस्तर, छत्तीसगढ़ के पत्रकार संतोष यादव का परिवार. यादव को सितंबर, 2015 में गिरफ्तार किया गया था.

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(न्यू यॉर्क)- ह्यूमन राइट्स वॉच ने आज कहा कि भारत सरकार को इन आरोपों की जांच करनी चाहिए कि मध्य भारत स्थित राज्य छत्तीसगढ़ में संघर्ष की रिपोर्टिंग के लिए पत्रकारों पर मुकदमा चलाया जा रहा है. मार्च 2016 के अंत में, एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में कहा गया कि छत्तीसगढ़ में मीडिया सरकार, माओवादी विद्रोहियों और निगरानी समूहों के "भारी दबाव में काम कर रहा है."

सरकार को पत्रकारों पर दर्ज झूठे मुकदमे वापस लेने चाहिए और माओवाद प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा बलों द्वारा पत्रकारों, कार्यकर्ताओं और मानवाधिकार रक्षकों के उत्पीड़न पर रोक लगानी चाहिए.

दक्षिण एशिया निदेशक मीनाक्षी गांगुली ने कहा कि, "सरकार को आम लोगों की परेशानियों को दूर करना चाहिए और अधिकारों के हनन को उजागर करने वाले पत्रकारों को धमकी देना और उन पर मुकदमा चलाना बंद करना चाहिए. पत्रकारों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का मुंह बंद करने से माओवादियों और सरकारी सुरक्षा बलों दोनों के लिए निर्भय होकर दमन करना आसान हो जाता है."

ऐसा लगता है कि छत्तीसगढ़ में आपराधिक आरोपों का सामना करने वाले चार पत्रकारों को सरकार की आलोचना के कारण गिरफ्तार किया गया. स्थानीय दैनिक 'दैनंदिनी' के संवाददाता दीपक जायसवाल को 26 मार्च को गिरफ्तार किया गया. इसीतरह, हिंदी दैनिक 'पत्रिका' के  संवाददाता प्रभात सिंह को 21 मार्च को गिरफ्तार किया गया. हिंदी समाचार पत्रों के लिए लिखने वाले संतोष यादव सितंबर 2015 से हिरासत में हैं. आदिवासी समुदाय के पत्रकार सोमरू नाग को जुलाई 2015 में गिरफ्तार किया गया. इन सभी का कहना है कि सरकार ने उन्हें खामोश करने के लिए उनपर झूठे आपराधिक आरोप दायर किए क्योंकि उनकी रिपोर्टों में सुरक्षा बलों पर सवाल खड़े किये गए थे.

भारतीय मीडिया संगठनों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और विपक्षी नेताओं ने पत्रकारों की गिरफ्तारी की व्यापक निंदा की है. एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया, जो कि 200 सदस्यीय एक स्वतंत्र समूह है, ने मार्च में पत्रकारों, पुलिस और सरकारी अधिकारियों से मिलने के लिए एक जांच दल छत्तीसगढ़ भेजा था. उनकी रिपोर्ट में यह कहा गया है कि राज्य में पत्रकारों को "सुरक्षा बलों और माओवादियों के बीच काम करना पड़ता है और दोनों पक्ष पत्रकारों पर बिल्कुल भी भरोसा नहीं करते." रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि राज्य सरकार चाहती है कि मीडिया माओवादियों के खिलाफ लड़ाई का समर्थन करे और "इस पर कोई सवाल नहीं उठाए."

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने 31 मार्च को इन आरोपों पर कि सरकार प्रेस का मुँह बंद करने की कोशिश का रही है, कहा कि उनकी सरकार मीडिया की आजादी के लिए प्रतिबद्ध है. हालाँकि अब तक सरकार ने पत्रकारों के खिलाफ सुरक्षा बल के उत्पीड़न को रोकने के लिए कार्रवाई करने या इसके लिए लोगों की जिम्मेदारी तय करने की प्रतिबद्धता नहीं दिखाई है.

माओवादी समूहों, जिन्हें अक्सर नक्सलवादी कहा जाता है, का सशस्त्र आंदोलन मध्य और पूर्वी भारत के नौ राज्यों में एक गंभीर सुरक्षा चुनौती बन गया है. एक दशक लम्बे इस संघर्ष में हजारों नागरिक मारे गए और घायल हुए हैं और कई लोगों का आशियाना उजड़ गया है. माओवादियों ने कई गंभीर उत्पीड़न किए हैं, जैसे पुलिस, राजनीतिज्ञों और जमींदारों की लक्षित हत्याएं. वर्ष 2013 में, माओवादियों ने छत्तीसगढ़ में दो पत्रकारों-- नेमिचंद जैन और साईं रेड्डी की हत्या कर दी थी.

माओवादी खतरे के प्रति सरकार की जवाबी सुरक्षा कार्रवाई के कारण भी मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन हुआ है. राज्य सुरक्षा बलों- आम तौर पर पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने गांववालों को मनमाने ढंग से गिरफ्तार किया, उन्हें हिरासत में लिया और उनका उत्पीड़न किया. इनमें से ज्यादातर असंतुष्ट आदिवासी समुदायों के लोग थे. पुलिस ने अक्सर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को माओवादी या माओवादी समर्थक बता कर उन्हें बदनाम करने की कोशिश है.

जगदलपुर लीगल एड ग्रुप संघर्षग्रस्त क्षेत्र में मुख्य रूप से ग्रामीण आदिवासियों को मुफ्त कानूनी परामर्शदाता प्रदान करता है. इससे जुड़े वकीलों ने बताया कि सुरक्षा बलों की तरफदारी करने वाले निगरानी समूहों ने पत्रकारों और कार्यकर्ताओं के साथ-साथ उन लोगों को भी उनके  कामों के लिए परेशान किया है.

गांगुली ने कहा, "पुलिस और निगरानी समूहों की ज्यादतियों को छुपाने से अच्छा उन्हें खत्म करना माओवादियों को कहीं ज्यादा करारा जवाब होगा. अधिकारों का सम्मान करने वाले प्रशासन का उन समुदायों द्वारा स्वागत किया जाएगा, जो लंबे समय से हिंसा और प्रतिशोध के दुष्चक्र में फंस गए हैं."

गिरफ्तारियों और पत्रकारों, वकीलों और कार्यकर्ताओं के उत्पीड़न के अतिरिक्त विवरण के साथ पुलिस और निगरानी समूहों के उत्पीड़न के बारे में अधिक जानकारी के लिए नीचे देखें:

गिरफ्तारियां और पत्रकारों का उत्पीड़न

2015 में, प्रभात सिंह ने माओवादी संघर्ष में कथित गैर-न्यायिक हत्याओं सहित पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कई रिपोर्ट लिखी थी. मार्च में, सिंह और दीपक जायसवाल को एक स्कूल अधिकारी द्वारा अगस्त, 2015 में दायर एक शिकायत के आधार पर गिरफ्तार किया गया जिसमें उन पर यह आरोप लगाया गया कि उन्होंने परीक्षा के दौरान बिना अनुमति के स्कूल परिसर में प्रवेश किया, स्कूल कर्मचारियों पर हमला किया और पैसे की मांग की. थाने में शिकायत उनकी इस रिपोर्ट के बाद दर्ज कराई गई थी कि विद्यालय के शिक्षकों ने छात्रों को परीक्षा में नक़ल करने में मदद की है.

सिंह के वकील ने कहा कि जायसवाल और सिंह पर अनाधिकार प्रवेश करने, सरकारी कर्मचारियों  को अपने कर्तव्य निर्वहन से रोकने और उसे ऐसा करने से रोकने के लिए उनपर हमला करने या आपराधिक बल का इस्तेमाल करने सहित कई तरह के आपराधिक प्रावधानों के तहत आरोप लगाए गए हैं. सिंह पर धोखाधड़ी और अश्लील सामग्री जिसमें मनमानी पुलिस कार्रवाई के खिलाफ सुरक्षा के लिए कानूनी समर्थन माँगना शामिल था, के प्रचार-प्रसार का आरोप भी लगाया गया था. पुलिस का तर्क है कि जायसवाल पत्रकार नहीं हैं, जबकि स्थानीय पत्रकार संघ के विचार इससे विपरीत हैं. दक्षिण बस्तर रिपोर्टर एसोसिएशन के अध्यक्ष बापी रॉय ने एक अख़बार को बताया कि पिछले दो सालों से जायसवाल पूर्णकालिक पत्रकार हैं. सिंह और जायसवाल ने खुद पर लगे आरोपों से इंकार किया है. उनके मुताबिक उन्हें माओवादी संघर्ष पर रिपोर्टिंग के लिए पुलिस द्वारा निशाना बनाया जा रहा है.

सिंह के वकील का आरोप है कि पुलिस ने हिरासत में सिंह की पिटाई की और सिंह को छाती और हाथों में चोट लगी. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने छत्तीसगढ़ सरकार को सिंह की "अवैध गिरफ्तारी, हिरासत और यातना पर" नोटिस जारी किया. भारतीय प्रेस काउंसिल ने कहा कि ऐसा लगता है कि सिंह की गिरफ्तारी प्रेस की आज़ादी का उल्लंघन है और उसने पुलिस और राज्य सरकार से रिपोर्ट मांगी.

एक क्रशर संयंत्र को जलाने वाले युवाओं की कथित सहायता करने के लिए सोमरू नाग को जुलाई में गिरफ्तार किया गया था. उन पर डकैती, आग या विस्फोटक पदार्थ से नुकसान पहुँचाने, अन्य आपराधिक कार्यों के साथ-साथ आपराधिक साजिश रचने का आरोप लगाया गया है. नाग के परिवार का आरोप है कि उन्हें अवैध रूप से तीन दिनों तक पुलिस हिरासत में रखा गया और इस दौरान उनकी पिटाई की गई. उनके भाई ने संवाददाताओं से कहा, "हमने देखा है कि उन्हें बहुत बुरी तरह से पीटा गया है. उन्होंने हमसे कहा कि अन्य पत्रकारों से बात करें और उन्हें मेरी रिहाई में मदद करने के लिए कहें."

संतोष यादव को पुलिस गश्ती पर हुए एक माओवादी हमले, जिसमें एक अधिकारी की मौत हो गयी थी, में कथित रूप से शामिल होने के लिए सितंबर में गिरफ्तार किया गया था, यादव पर दंगे, आपराधिक साजिश, हत्या, हत्या का प्रयास करने के आरोप लगाया गए हैं. साथ ही उन पर छत्तीसगढ़ विशेष लोक सुरक्षा अधिनियम और अवैध गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम जैसे आतंकवाद विरोधी क्रूर कानूनों के तहत गैरकानूनी संगठन की सहायता करने और उससे जुड़ने के आरोप भी लगाया गए हैं. ह्यूमन राइट्स वॉच और अन्य अधिकार समूहों ने अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों का पालन करने में विफल रहने और राजनीतिक विरोधियों, आदिवासी समूहों, धार्मिक और जातीय अल्पसंख्यकों और दलितों को निशाना बनाने के लिए इनका व्यापक दुरुपयोग करने के लिए इन आतंकवाद-विरोधी कानूनों की आलोचना की है.

यादव के पिता ने मीडिया से कहा कि यादव को हमले की जगह पर सबसे पहले पहुंचने के कारण निशाना बनाया गया. बस्तर जिले से प्रकाशित एक समाचार पत्र के संपादक कमल शुक्ला का भी यह मानना है कि घटनास्थल पर यादव की तेज पहुँच ने उन्हें संदिग्ध बना दिया. शुक्ला ने एक संवाददाता से कहा, "संपादक का कहना होता है कि मौके पर तुरंत पहुंचें और एक स्ट्रिंगर को यह करना पड़ता है. बस अपना काम करना हमें पुलिस और माओवादियों की नज़रों में संदिग्ध बना देता है."

गिरफ्तारी से पहले यादव को पुलिस ने बार-बार उनके काम के लिए परेशान किया था. पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़ (पीयूसीएल) ने बताया कि पुलिस की ओर से यादव पर माओवादियों की मुखबरी करने का दबाव था और कम-से-कम दो बार उन्हें 'गिरफ्तार' किया गया और धमकी दी गई थी. पीयूसीएल के मुताबिक उन्हें गिरफ्तार करने से तीन महीने पहले, पुलिस ने मनमाने ढंग से यादव को हिरासत में लिया, उन्हें नंगा किया और पुलिस उनके साथ मार-पीट करने की तैयारी में थी. पीयूसीएल ने कहा, "पुलिस तब जाकर रुकी जब यादव ने कहा कि पुलिस की कारगुजारी के बारे में वे लिखेंगे और सभी को बताएंगे."

बस्तर के पुलिस अधीक्षक अजय यादव ने उत्पीड़न के आरोपों का खंडन किया और यादव की गिरफ्तारी का बचाव किया: "हम लगातार उनकी गतिविधियों को देख रहे थे. वे उस क्षेत्र में बहुत सक्रिय थे और स्थानीय [माओवादी] कमांडरों के साथ उनके संबंध थे. वह उन्हें साज-सामानों  की आपूर्ति करते थे."

एडिटर्स गिल्ड के जाँच-दल की रिपोर्ट के मुताबिक यादव ने कहा कि उन्होंने बतौर पत्रकार अपने काम के दौरान माओवादी नेताओं से फोन पर बात-चीत की थी, लेकिन उन्हें कोई सूचना नहीं दी. जाँच-दल को उन्होंने यह भी बताया कि वे कभी-कभी माओवादियों के लिए पैकेट पहुँचाया करते थे जिसमें अखबार या पत्रिकायें होती थीं और कभी-कभी इनमें अज्ञात अंतर्वस्तु वाले कागजात शामिल होते थे. हालांकि, यादव ने कहा कि इस दूरदराज के संघर्ष क्षेत्र में रहने वाला कोई भी व्यक्ति अपने लिए गंभीर खतरा मोल लिए बगैर माओवादियों के लिए कागजात ले जाने से इंकार नहीं कर सकता है.

देशबंधु अखबार समूह के प्रधान संपादक ललित सुरजन ने जाँच-दल को बताया कि "बस्तर के सुदूर इलाकों में काम करने वाले संतोष यादव और कई अन्य पत्रकारों को संदेह का लाभ देना चाहिए क्योंकि वे अपने पेशे के सिलसिले में माओवादियों से बात करते रहे हैं. उनके पास कोई और विकल्प नहीं है."

यादव के मामले में, पुलिस का दावा है कि वह पत्रकार नहीं है, हालांकि यादव ने जिन दोनों अखबारों के लिए काम करने की बात कही थी, उन्होंने यह स्वीकार किया कि यादव ने उनके लिए रिपोर्टिंग की है. मानवाधिकार वकील और पीयूसीएल की क्षेत्रीय महासचिव सुधा भारद्वाज  ने कहा कि, "यादव जैसे स्थानीय स्ट्रिंगर और पत्रकारों को ज्यादा खतरा है. उन्हें राष्ट्रीय मीडिया के पत्रकारों जैसी प्रतिरक्षा, संरक्षण या कामकाजी परिस्थितियां नहीं मिलती हैं. हालांकि, इन क्षेत्रों में सफ़र और स्थानीय आदिवासी (देशज) भाषा के अनुवाद में बिना किसी स्थानीय पत्रकार की मदद के वास्तव में कोई बाहरी पत्रकार रिपोर्टिंग नहीं कर सकता है."

यादव कथित पुलिस उत्पीड़न के खिलाफ मुखर रहे हैं, और अक्सर कानूनी मदद पाने में आदिवासी लोगों की उन्होंने सहायता की थी. यादव ने कानूनी सलाह के लिए नाग सहित कई आदिवासियों को जगदलपुर लीगल एड ग्रुप से मिलाया था. यह ग्रुप अब यादव और नाग के मामलों की पैरवी कर रहा है.

सुरक्षा बलों द्वारा अधिकारों के कथित उल्लंघन के बारे में बार-बार रिपोर्ट लिखने के बाद न्यूज़ वेबसाइट 'स्क्रोल.इन' के लिए लिखने वाली मालिनी सुब्रह्मण्यम के घर पर बस्तर में पुलिस ने कथित रूप से देर रात जाकर उनके काम के बारे में पूछताछ करना शुरू किया. फरवरी में अज्ञात हमलावरों ने सुब्रमण्यम के घर पर हमला किया था, तब पुलिस ने पूरे दिन शिकायत दर्ज करने के उनके बार-बार के प्रयासों का विरोध किया. सुब्रह्मण्यम ने कहा कि पुलिस ने उनके मकान मालिक और घरेलू कर्मी को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया था. उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस ने उनके मकान मालिक पर यह दबाव डाला कि वे उन्हें मकान खाली करने का नोटिस भेजें. सुब्रह्मण्यम ने फरवरी में राज्य छोड़ दिया. पुलिस ने दबाव बनाने के किसी भी आरोप से यह कहते हुए इनकार किया कि स्थानीय अधिकारियों ने सभी मकान मालिकों को अपने किरायेदारों और घरेलू कर्मियों के दस्तावेजों को प्रस्तुत करने का आदेश जारी कर दिया था और यह सामान्य पूछ-ताछ का हिस्सा था.

2011 में, भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि "आश्चर्य की बात" है कि छत्तीसगढ़ सरकार ने यह महसूस किया कि "राज्य के कई हिस्सों में बड़े पैमाने पर व्याप्त अमानवीय स्थिति पर अगर कोई सवाल खड़े करता हो, तो उसे अनिवार्य रूप से माओवादी या उनका समर्थक माना जाना चाहिए."

मानवाधिकार वकीलों, कार्यकर्त्ताओं का उत्पीड़न और धमकी

जगदलपुर लीगल एड ग्रुप की शालिनी गेरा और अन्य वकीलों ने ह्यूमन राइट्स वॉच को बताया कि पुलिस और स्थानीय निगरानी समूहों ने मानवाधिकारों के लिए काम के कारण उन्हें परेशान किया और धमकी दी. वर्ष 2013 से, जगदलपुर लीगल एड ग्रुप (जगल) ने राज्य में पुलिस और अन्य सुरक्षा बलों द्वारा कथित तौर पर मानवाधिकार उल्लंघन के अनेक मामलों के विरुद्ध  पैरवी की है. इस ग्रुप के वकीलों ने अक्तूबर और जनवरी के बीच सुकमा और बीजापुर जिले में माओवादी विरोधी अभियान के दौरान बलात्कार और यौन उत्पीड़न की तीन कथित घटनाओं में पुलिस और सुरक्षाकर्मियों के खिलाफ शिकायत दर्ज करने में आदिवासी महिलाओं की सहायता की.

पुलिस और उनके समर्थकों के उत्पीड़न ने जगदलपुर लीगल एड ग्रुप को बस्तर जिले का जगदलपुर शहर छोड़ने और लगभग 400 किलोमीटर दूर बिलासपुर जिले में स्थानांतरित होने को मजबूर कर दिया. अक्टूबर और फरवरी में, बस्तर जिला बार एसोसिएशन ने 'बाहरी वकीलों'. ऐसे वकील जो राज्य में स्थानीय रूप से पंजीकृत नहीं हैं, को जगदलपुर की अदालतों में वकालत करने पर प्रभावी ढंग से प्रतिबंध लगाने के प्रस्तावों को पारित कर दिया. जगदलपुर लीगल एड ग्रुप के वकीलों ने प्रस्ताव को चुनौती दी और छत्तीसगढ़ राज्य बार कौंसिल से अंतरिम अस्थाई स्थगन प्राप्त कर लिया. हालांकि गेरा के अनुसार जिला बार एसोसिएशन ने उन लोगों और इस एड ग्रुप की सहायता करनेवाले स्थानीय वकीलों को धमकाना जारी रखा. गेरा ने कहा कि पुलिस एड ग्रुप के खिलाफ तिरस्कार अभियान चला रही है. मार्च 2015 में, न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक पुलिस के बस्तर प्रमुख इंस्पेक्टर जनरल एसआरपी कल्लूरी ने उन्हें "नक्सली समर्थक" कहा.

फरवरी में, मोटरसाइकिल पर सवार तीन अज्ञात लोगों ने आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता सोनी सोरी पर रासायनिक पदार्थों से हमला किया. सोरी बीजापुर और सुकमा जिलों में आदिवासी महिलाओं को सुरक्षा बलों के खिलाफ यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज करने में मदद कर रही थीं.

खबरों के अनुसार, हाल के महीनों में, छत्तीसगढ़ राज्य के बस्तर क्षेत्र में निगरानी समूहों का बढ़ना असहमति के स्वरों के लिए गंभीर खतरा बन गया है. ये समूह सरकार के आलोचकों के उत्पीड़न और उन्हें धमकी देने से जुड़े हुए हैं. इंडिया टुडे के अनुसार, पुलिस ने सामाजिक एकता मंच का समर्थन करने की बात मानी है. यह मंच स्थानीय व्यापारियों और राजनीतिक नेताओं द्वारा ‘‘बस्तर में नक्सलवाद का विरोध और पुलिस के कार्यों का समर्थन करने’’ के लिए बनाया गया एक अनौपचारिक संगठन है. खबरों के मुताबिक बस्तर में एक पुलिस अधिकारी ने सामाजिक एकता मंच को माओवादियों के खिलाफ राज्य के ‘‘गुरिल्ला युद्ध का संस्करण’’ बताया है.

फरवरी में, सामाजिक एकता मंच ने जगदलपुर लीगल एड ग्रुप के वकीलों के खिलाफ  सार्वजनिक बैठक की और प्रदर्शन किया, जिसमें उनपर माओवादियों के संरक्षक होने का आरोप  लगाया गया. ह्यूमन राइट्स वॉच ने कहा है कि,‘‘इस तरह के बयान वकीलों और उनके मुवक्क्लिों को गंभीर जोखिम में डाल सकते हैं.’’

छत्तीसगढ़ स्थित स्वतंत्र शोधकर्ता और लेखक बेला भाटिया,जो आदिवासी महिलाओं की शिकायत दर्ज करने में भी मदद कर रही थीं, ने कहा है कि उन पर बस्तर छोड़ने का दबाव बढ़ गया है. भाटिया ने आरोप लगाया कि फरवरी में पुलिस उनके घर पर आ धमकी और मकान मालिक से पूछताछ की. मार्च में, महिला एकता मंच (सामाजिक एकता मंच से सम्बद्ध एक समूह) की महिलाओं सहित लगभग 100 लोगों का दल उनकी गैरहाजिरी में उनके घर पर पहुंचा, उन्हें माओवादी बताने वाले पर्चे बांटे और मकान मालिक से उन्हें निकालने को कहा.

15 अप्रैल को, सामाजिक एकता मंच के नेताओं ने घोषणा की कि वे इस समूह को भंग कर रहे हैं क्योंकि ‘‘कुछ लोगों ने स्थानीय पुलिस और राज्य प्रशासन की भर्त्सना करने के लिए समूह की गतिविधियों का इस्तेमाल किया है.’’

छत्तीसगढ़ राज्य के अधिकारियों का माओवादियों से लड़ने के लिए निगरानी समूहों का इस्तेमाल करने का एक लंबा इतिहास रहा है. साल 2005 के मध्य से 2011 तक, सरकार ने माओवादी विरोधी निगरानी समूह सलवा जुडुम का समर्थन किया और उन्हें हथियारों से लैस किया. सरकारी सुरक्षा बलों और सलवा जुडुम, जिन्हें अधिकारियों ने गलत ढंग से स्वतःस्फूर्त नागरिक आंदोलन बताया था, के सदस्यों ने मानवाधिकारों का गंभीर हनन किया, गांवों पर हमला, ग्रामीणों की हत्या और बलात्कार करके और लोगों की झोपड़ी जलाकर उन्हें सरकारी शिविरों में रहने के लिए मजबूर किया. 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने इस समूह को गैरकानूनी घोषित कर दिया था. सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को सलवा जुडुम सहित ऐसे किसी भी समूह के संचालन को रोकने के लिए सभी उचित उपाय करने को कहा था, जो कि ‘‘निजी हाथों में कानून लेने, असंवैधानिक रूप से कार्य करने, या अन्य तरीके से किसी भी व्यक्ति के मानवाधिकारों का उल्लंघन’’ करने की कोशिश करते हैं.

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन करते हुए निगरानी समूहों के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सरकारी समर्थन जारी है.