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भारत-सैन्य अदालत कश्मीर में हत्या के शिकार लोगों को न्याय दिलाने में असफल

सशस्त्र बल विशेष अधिकार कानून सेना के बचाव का सबसे बड़ा हथियार

(न्यूयॉर्क) - ह्यूमन राइट वॉच के मुताबिक जम्मू एवं कश्मीर राज्य में नागरिकों की हत्या के मामले में एक भारतीय सैन्य अदालत का पांच अधिकारियों के खिलाफ अपराधों के मामलों को निरस्त किया जाना सेना की गंभीर अपराधओं के लिए दंड से बचने की निरंतर छूट का परिचायक है। भारतीय सरकार को तुरंत विभिन्न आयोगों की सिफारिशों पर गौर करते हुए सशस्त्र बल विशेष अधिकार कानून की पुर्नसमीक्षा करनी चाहिए जो सेना को मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों में संरक्षण प्रदान करता है।

जनवरी 24, 2014 को पारित एक आदेश में सेना ने कहा है कि वह साक्ष्यों के अभाव में मार्च 2000 में कश्मीर के के पथरीबल में पांच नागरिकों की हत्या के मामले में सैन्य अधिकारियों के खिलाफ दर्ज केस को बंद कर रही है। इन नागरिकों को आतंकवादी बताते हुए 36 सिख गांव वालों की हत्या का दोषी करार दिया गया था। इस मामले में एएफएसपीए का उपयोग करते हुए केस को नागरिक जांच एजेंसी केंद्रीय जाँच ब्यूरो से हटाते हुए सेना ने सैन्य अदालत में दर्ज किया था। उक्त केस ब्रिगेडियर अजय सक्सेना, लेफ्टिनेंट कर्नल ब्रहमेंद्र प्रताप सिंह, मेजर सौरभ शर्मा, मेजर अमित सक्सेना और सूबेदार इदरीस खान पर दर्ज किया गया था।

ह्यूमन राइट वॉच की दक्षिण एशिया निदेशक मीनाक्षी गांगुली ने कहा, “पांच गांव वालों को अपहरण कर हत्या कर दी गयी थी और सेना इससे इंकार कर रही थी”। उनका कहना था, “सशस्त्र बल विशेष अधिकार कानून को वापस लेते हुए नागरिकों के खिलाफ गंभीर अपराध करने वाले सैन्य बलों के जवानों को अभियोजन के दायरे में लाने के लिए नागरिक अदालतों में मुकदमा चलाया जाना चाहिए”।

एएफएसपीए बिना सरकार की अनुमति के सैन्य कर्मियों पर नागरिक अदालतों में मुकदमा चलाए जाने से प्रतिबंधित करती है जिससे गंभीर अपराध के मामलों में इनको सरकार और इसकी जांच एजेंसियों की कार्रवाई के दायरे में आने से बचने का रास्ता मिल जाता है। इस कानून से आतंकवाद निरोधक कार्रवाई के दौरान सेना को किसी को हिरासत में लेने, जान से मार देने, संपत्ति को जब्त करने अथवा नष्ट करने जैसे अपार अधिकार मिल जाते हैं। भारतीय अधिकारियों का दावा है कि सैन्य बलों को हथियार बंद आतंकवादी समूहों की ओर से देश की सुरक्षा को गंभीर खतरे को देखते हुए इस तरह के कानूनों की आवश्यकता है। दशकों से भारत के उत्तर पूर्व के सात राज्यों और जम्मू व कश्मीर में लागू इस
एएफएसपीए कानून से सैन्य बलों को हत्या व मानवाधिकार उल्लंघन के गंभीर मामलों में संरक्षण मिलता रहा है। ह्यूमन राइट वॉच ने 2006 में पथरीबल नरसंहार पर तैयार रिपोर्ट ‘एवरीवन लिव्स इन फियर ‘में सेना की भूमिका को उजागर किया है।

मार्च 20, 2000 को अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की भारत यात्रा की पूर्व संध्या पर बंदूकधारियों ने रात में अनंतनाग जिले के छ्त्तीसिंहपोरा गांव में घुस कर पुरुष सदस्यों को कतार में खड़ा कर गोली चला कर 36 लोगों की हत्या व कई अन्य को घायल कर दिया था। इसके बाद मार्च 25, 2000 को सुरक्षा बलों ने नरसंहार के दोषी पांच आतंकवादियों को पथरीबल में मुठभेड़ में मार गिराने का दावा किया था। सेना ने मारे गए लोगों के शवों को पुलिस को सौंपने के साथ ही केस भी दर्ज करा दिया था। उक्त सभी शव बुरी तरह से क्षत-विक्षत थे जिनमें तीन बुरी तरह से जले व एक पूरी तरह से नष्ट कर दिया गया था।

इस दौरान जिले से पांच गांववालों के अपहरण की सूचना देते हुए गुमशुदगी की रिपोर्ट स्थानीय पुलिस थाने में मार्च 24, 2000 को दर्ज करायी गयी थी। कथित आतंकियों से हुयी मुठभेड के घटनास्थल पर पहुंचे ग्रामीणों को गायब हुए पांच लोगों में से दो के कपड़ों के कुछ हिस्से मिले थे। ग्रामीणों ने जोर देकर कहा कि मारे गए लोग आतंकवादी न होकर गायब हुए लोग थे जिन्हें फर्जी मुठभेड़ में मारा गया है। सैन्य प्रवक्ता ने इन आरोपों को खारिज करते हुए दावा किया कि मारे गए लोग वास्तव में आतंकवादी थे। उन्होंने कहा कि फर्जी मुठभेड़ के दावों में दम नही है और लोग तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश कर रहे हैं।

ग्रामीणों के कई विरोध प्रदर्शनों के बाद न्यायिक जांच के आदेश दिए गए थे। शवों को निकाल कर उनका डीएनए परीक्षण कराए जाने पर उनकी पहचान गायब हुए पांच लोगों के रुप में हुयी। इस कांड की जांच फरवरी 2003 में सीबीआी ने अपने हाथों में ली और मार्च 2006 में पांच सैन्य अधिकारियों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कराया। हालांकि सेना ने इस कांड की नागरिक जांच और अभियोजन का विरोध किया। सेना ने इस मामले में एक बाद उच्चतम न्यायालय में दायर किया किया जिसने सेना को सैन्य अदालत अथवा नागरिक अदालत में किसी एक में अभियोजन चलाए जाने को चुनने के लिए कहा। इस आदेश के बाद जून 2012 में सेना कोर्ट मार्शल के लिए सहमत हुयी।

मीनाक्षी गांगुली के मुताबिक उच्चतम न्यायालय ने सेना को एक परीक्षा से गुजरने का मौका दिया कि क्या वह अपने कर्मियों की जवाबदेही तय कर सकती है। उनका कहना है कि सेना इस परीक्षा में सफल साबित हुयी जो उसके कर्मियों को गंभीर अपराधों के मामले में निष्पक्ष अभियोजन से बचाने की मंशा को सामने लाता है।

लंबे समय से पूर्वोत्तर राज्यों तथा जम्मू व कश्मीर के पीड़ित, कार्यकर्ता और नागरिक एएफपीएसए को वापस लेने को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। मणिपुर की सामाजिक कार्यकर्ता इरोम शर्मिला एक दशक से भी लंबे समय से वहां सैन्य बलों के नागरिों के नरसंहार के खिलाफ अनशन करते हुए इस कानून को वापस लेने की मांग कर रही हैं। इस के जवाब में सरकार इरोम शर्मिला को न्यायिक हिरासत में लेते हुए उसे आत्महत्या से बचाने के नाम पर नाक से नली के जरिए जबरन भोजन सामाग्री दे रही है।

मणिपुर में मनोरमा देवी की हत्या के बाद 2004 में लंबे विरोध के बाद भारत सरकार ने एएफएसपीए की समीक्षा के समीक्षा के पांच सदस्यों की एक कमेटी बनायी थी। इस समिति ने समीक्षा के बाद 6,जून , 2005 को सौंपी अपनी रिपोर्ट में इस कानून को वापस लेने की सिफारिश की थी। अप्रैल 2007 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की ओर से जम्मू व कश्मीर पर बनायी गयी एक समिति ने भी इस कानून को वापस लेने की सिफारिश की थी।

हालांकि इसके बाद भी सेना के कड़े विरोध के चलते केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इन सिफारिशों पर कोई भी फैसला नही लिया है। तत्कालीन गृह मंत्री पी चिदंबरम के मुताबिक सरकार एएफएसपीए को एक अधिक ‘मानवीय’ कानून बनाने के लिए संशोधन करना चाहती है पर सेना इसके लिए तैयार नही है। वर्ष 2012 में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के सदस्य देशों ने ‘यूनिवर्सल पीरीयॉडिक रिव्यू ऑफ इंडिया’ के दौरान इस कानून को वापस लेने की सिफारिश की थी।

मीनाक्षी गांगुली के मुताबिक नागरिक जवाबदेही के उपर सेना के विरोध को वरीयता देते हुए भारत सरकार कई सरकारी आयोगों, संयुक्त राष्ट्र व जिम्मेदार नागरिकों की मांग की उपेक्षा कर रही है। भारत सरकार को इस खतरनाक कानून को वापस लेकर न्याय और जवाबदेही के लिए अपनी प्रतिबद्धता को दर्शाना होगा।

 

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