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भारत: छात्रों की सुरक्षा करने में पुलिस विफल

दिल्ली के एक विश्वविद्यालय में सरकार समर्थकों द्वारा तीन घंटों तक हिंसक उपद्रव

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय कैंपस में हिंसा के बाद तैनात पुलिस, नई दिल्ली, भारत, 5 जनवरी, 2020.  © 2020 रायटर्स/अदनान आबिदी

(न्यूयॉर्क) - ह्यूमन राइट्स वॉच ने आज कहा कि भारत में पुलिस ने 5 जनवरी, 2020 को दिल्ली में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के कथित समर्थकों द्वारा विश्वविद्यालय छात्रों पर हमला के दौरान हस्तक्षेप नहीं किया. प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि लाठी, हथौड़े और ईंटों से लैस दर्जनों नकाबपोश पुरुष और कई महिलाएं सरकार समर्थक हिंदू राष्ट्रवादी नारे लगाते हुए जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में दाख़िल हुए और उन्होंने लगभग तीन घंटे तक कैंपस में हिंसक उपद्रव मचाया. इस घटना में 30 से अधिक छात्र और शिक्षक घायल हो गए.

दिल्ली पुलिस ने अज्ञात लोगों के खिलाफ दंगे और हमले करने की शिकायत दर्ज की है. हालांकि, एक वीडियो में यह दृश्य सामने आया है कि पुलिस हमलावरों, जिनमें से कई लोहे की रॉड और लाठियों से लैस थे, को हिरासत में लेने या पूछताछ करने की कोशिश किए बिना कैंपस से बाहर निकल जाने दे रही है. पुलिस तब भी तमाशा देखती रही और उसने कोई कार्रवाई नहीं की जब राष्ट्रवादी नारे लगा रही भीड़ कैंपस के गेट के पास जमा हुई और इसने पत्रकारों और एक राजनीतिक कार्यकर्ता के साथ मारपीट की. भीड़ ने घायल छात्रों की मदद के लिए कैंपस में दाख़िल होने की कोशिश कर रही एक एम्बुलेंस पर भी हमला किया.

दक्षिण एशिया निदेशक मीनाक्षी गांगुली ने कहा, “जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में हुए हमले के दौरान छात्रों और शिक्षकों ने पुलिस से हस्तक्षेप करने की गुहार लगाई, लेकिन पुलिस मूक दर्शक बनी रही और हमलावरों को निकल जाने दिया. भारत में पुलिस अक्सर अत्यधिक बल प्रयोग करती है और शांतिपूर्ण तरीके से सरकार की आलोचना करने वालों को मनमाने ढंग से गिरफ्तार करती है, लेकिन कानून और व्यवस्था बनाए रखने के अपने कर्तव्य का निर्वहन उस समय नहीं कर पाती जब उसका सामना सत्तारूढ़ पार्टी के हिंसक समर्थकों से होता है.”

कई छात्रों ने ह्यूमन राइट्स वॉच को बताया कि हमलावर भाजपा से संबद्ध छात्र समूह अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के सदस्य थे.

हमलावरों द्वारा छात्रों पर फेंके पत्थर से घायल विश्वविद्यालय के एक पोस्टग्रेजुएट रिसर्च स्कॉलर ने बताया कि कुछ हमलावर एबीवीपी के सदस्य थे जिनके साथ बाहरी लोग भी थे. उन्होंने कहा, “कैंपस में हिंसा भड़कने के वक़्त पुलिस मौजूद थी. हमने उनसे मदद मांगी और फिर हम हमलावरों से बचने के लिए भागे, लेकिन पुलिस ने हमारी बिल्कुल भी मदद नहीं की.”

एक अन्य घायल स्नातक छात्र ने कहा: “उन्होंने हमारे ऊपर लोहे से बनी कोई चीज़ फेंकी और यह मेरी आँख के पास लगी और इससे खून बहता रहा. मुझे अस्पताल पहुंचने में दो घंटे लग गए क्योंकि भीड़ ने कैंपस के अंदर एम्बुलेंस नहीं आने दिया. मैंने कुछ हमलावरों की पहचान की है, ये एबीवीपी से जुड़े जेएनयू के छात्र थे. पुलिस उनका साथ दे रही थी. कैंपस परिसर के सुरक्षा गार्डों ने भी कुछ नहीं किया.”

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक कैंपस के बाहर लाठी-डंडे के साथ इकट्ठा हुए कई लोगों ने बताया कि वे एबीवीपी से जुड़े हुए हैं. कई समाचार संगठनों ने व्हाट्सएप पर एबीवीपी के सदस्यों या भाजपा समर्थकों के उन संदेशों को खोज़ निकाला है जिनमें हिंसा की योजना बनाने की बात सामने आई है.

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, जिसका प्रगतिशील शिक्षा का अपना इतिहास है, देश में उदारवाद का गढ़ माना जाता है. भाजपा के हिंदू राष्ट्रवादी समर्थक लंबे समय से यहां के छात्रों की आलोचना करते रहे हैं, उन्हें परेशान किया है और यहां तक कि उन पर राजद्रोह का आरोप लगाया है. छात्र संघ चुनाव में एबीवीपी और वामपंथी राजनीतिक दलों से जुड़े छात्र समूहों के बीच काफी तीखा संघर्ष होता है.

5 जनवरी के हमले के दौरान, हमलावरों ने छात्र संघ के अध्यक्ष और वामपंथी संगठन स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया के नेता आइशी घोष पर हमला किया. घोष ने पुलिस पर कार्रवाई नहीं  करने का आरोप लगाया, जबकि उन्होंने हिंसा भड़कने से घंटों पहले “कैंपस में अज्ञात लोगों को इकट्ठा होने” के बारे में उन्हें सूचित किया था. विश्वविद्यालय के शिक्षक संघ ने एक बयान में हिंसा की निंदा करते हुए कहा है कि यह सब जब घटित हो रहा था, “पुलिस मूकदर्शक बनी हुई थी.”

जेएनयू में हुई हिंसा के खिलाफ देश के कई हिस्सों में छात्रों ने प्रदर्शन किए. इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने भी जेएनयू में “घायलों के इलाज के लिए जा रहे डॉक्टरों और नर्सों पर हुई बेतुकी हिंसा” की निंदा की.

छात्रों ने कहा कि उनका मानना है कि सरकार द्वारा घोषित शुल्क वृद्धि का विरोध करने के कारण उन पर हमला किया गया. इस मुद्दे पर असहमति के कारण शुल्क वृद्धि का विरोध कर रहे छात्र समूहों और सरकार के फैसले का समर्थन कर रहे एबीवीपी के बीच तनाव पहले से ही बढ़ा हुआ था.

एबीवीपी ने हिंसा में किसी भी भूमिका से इनकार किया है और कहा कि उसके 25 सदस्य हमले में घायल हुए हैं. उसने वामपंथी संगठनों से जुड़े छात्र समूहों पर हमले का आरोप लगाया है. भाजपा ने विपक्षी राजनीतिक दलों को दोषी ठहराते हुए हिंसा की निंदा की है.

जेएनयू में पुलिस की निष्क्रियता हाल के हफ्तों में नागरिकता संशोधन अधिनियम का विरोध कर रहे अनेक छात्रों समेत प्रदर्शनकारियों के खिलाफ़ पुलिस द्वारा अत्यधिक बल प्रयोग से बिलकुल अलग है. 15 दिसंबर, 2019 को दिल्ली में पुलिस ने सरकार विरोधी प्रदर्शनों के बाद जामिया मिलिया इस्लामिया कैंपस में प्रवेश किया और लाठी से छात्रों की पिटाई की जिनमें अनेक छात्र घायल हुए.

कानून प्रवर्तन अधिकारियों के लिए संयुक्त राष्ट्र की आचार संहिता के अनुच्छेद-1 में कहा गया है कि, “कानून प्रवर्तन अधिकारी हमेशा कानून द्वारा उनके लिए तय कर्तव्य को पूरा करेंगे. वे समुदाय की सेवा और गैरकानूनी कृत्यों के खिलाफ सभी व्यक्तियों की रक्षा करते हुए ऐसा करेंगे जो कि उनके पेशे के लिए आवश्यक महती जिम्मेदारी के अनुरूप हो.”

ह्यूमन राइट्स वॉच ने कहा कि भारत सरकार को जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में भीड़ के हमले के दौरान पुलिस निष्क्रियता सहित पुलिस उत्पीड़न के सभी आरोपों की तुरंत और निष्पक्ष जांच करनी चाहिए.

गांगुली ने कहा, “यह सुनिश्चित करना भारत सरकार का दायित्व है कि पुलिस कानून के अनुसार निष्पक्ष तरीके से काम करे. पुलिस का अनियंत्रित पक्षपातपूर्ण व्यवहार पुलिस बल को केवल और अधिक राजनीतिक, सांप्रदायिक और गैर-जिम्मेदार बनाएगा.”

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