दलित संगठनों द्वारा बुलाये गए राष्ट्रव्यापी हड़ताल में विरोध प्रदर्शन करते दलित समुदाय के लोगों को रोकती पुलिस, 2 अप्रैल, 2018, चंडीगढ़, भारत. 

 
© 2018 रॉयटर्स/अजय वर्मा
(न्यू यॉर्क) –ह्यूमन राइट्स वॉच और एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया ने आज कहा कि इस साल जनवरी में कथित रूप से जातीय हिंसा भड़काने के लिए 28 अगस्त, 2018 को भारतीय अधिकारियों ने पांच कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया और कई अन्य लोगों के घरों पर छापेमारी की. सरकार को चाहिए कि शांतिपूर्ण असहमति को दबाने के मकसद से की गई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की राजनीतिक गिरफ्तारी और उत्पीड़न तथा अन्य कार्रवाइयों पर रोक लगाए.

महाराष्ट्र पुलिस ने सुधा भारद्वाज, गौतम नवलखा, वरनन गोंज़ाल्विस, अरुण फ़रेरा और वरवरा राव को भारत के प्रमुख आतंकनिरोधी कानून, गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) और भारतीय दंड संहिता की धाराओं के तहत गिरफ्तार किया. साथ ही, पुलिस ने देश भर में छापेमारी की. इनमें दलित विद्वान के. सत्यनारायण और आनंद तेलतुंबडे, नागरिक अधिकार कार्यकर्ता स्टेन स्वामी और पत्रकार क्रांति टेकुला और के. वी. कुरमनाथ के घरों पर छापेमारी शामिल है.

ह्यूमन राइट्स वॉच की दक्षिण एशिया निदेशक मीनाक्षी गांगुली ने कहा, "मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की हालिया गिरफ्तारी यह बताती है कि सरकार पूरे भारत में डर का माहौल बनाने के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमले तेज कर रही है. सरकार मानवाधिकार रक्षकों और गरीबों और हाशिए के समुदायों के साथ काम करने वाले लोगों को उनके काम के लिए फिर से निशाना बना रही है."

29 अगस्त को कई कार्यकर्ताओं और शिक्षाविदों ने गिरफ्तार लोगों की रिहाई और गिरफ्तारी की स्वतंत्र जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की. सुप्रीम कोर्ट ने यह टिपण्णी करते हुए कि "असहमति लोकतंत्र के लिए सेफ्टी वॉल्व है," आदेश दिया कि गिरफ्तार कार्यकर्ताओं को 6 सितंबर की अगली सुनवाई तक पुलिस हिरासत में नहीं बल्कि घरों में नज़रबंद रखा जाए. अदालत ने नोटिस जारी कर उससे पहले महाराष्ट्र सरकार से जवाब भी माँगा है.

पुलिस का आरोप है कि कार्यकर्ताओं ने 31 दिसंबर, 2017 को एक बड़ी सार्वजनिक रैली में दलितों को उकसाया था, जिससे अगले दिन हिंसक झड़प हुई. इसमें एक व्यक्ति की मौत हो गई और कई घायल हुए. सैंकड़ों दलित इस साल 1 जनवरी को महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव में दो सौ साल पुराने उस युद्ध का जश्न मनाने के लिए इकट्ठे हुए थे जिसमें ब्रिटिश सेना के दलित सैनिकों ने पेशवा शासक को शिकस्त दी थी. हिन्दू राष्ट्रवादी समूहों और सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के कथित समर्थकों, जिनमें कुछ भगवा झंडे लिए हुए थे, ने इस आयोजन का यह कह कर विरोध किया कि यह राष्ट्र विरोधी है क्योंकि यह औपनिवेशिक जीत का जश्न है. दलित मार्च के आयोजकों ने बताया कि उनका मकसद भारत में व्यापक रूप से मौज़ूद उस विचारधारा के खिलाफ अभियान शुरू करना है जिसके कारण दलितों और मुसलमानों पर हमले होते हैं.

ये कार्यकर्ता दलितों और आदिवासियों समेत भारत के सबसे गरीब और हाशिए वाले समुदायों के अधिकारों की रक्षा के लिए वर्षों से काम करते रहे हैं. ये कवि, पत्रकार और वकीलों के बतौर सरकारी नीतियों के मुखर आलोचक रहे हैं और इस कारण अक्सर सरकार के निशाने पर रहते हैं.

57-वर्षीय सुधा भारद्वाज ट्रेड यूनियन नेता, मानवाधिकार वकील और छत्तीसगढ़ में पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज की महासचिव हैं. उन्होंने लंबे समय से मजदूर अधिकारों, भूमि अधिग्रहण से प्रभावित हाशिए के समुदायों के लिए काम किया है और छत्तीसगढ़ में सुरक्षा बलों के उत्पीड़न के खिलाफ आवाज़ उठाई है.

मुंबई के 48-वर्षीय अरुण फ़रेरा एक सामाजिक कार्यकर्ता, कार्टूनिस्ट और वकील हैं जिन्हें 2007 में हत्या, आपराधिक षड्यंत्र, दंगा, हथियार रखने और यूएपीए के प्रावधानों के तहत गिरफ्तार किया गया था. साल 2011 तक, उन्हें कई मामलों में बरी और जमानत पर रिहा कर दिया गया था. लेकिन नए मामलों में आरोपित करते हुए जेल से बाहर कदम रखते ही उन्हें दोबारा गिरफ्तार कर लिया गया. आख़िरकार 2014 में उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया गया और उन्होंने जेल में बिताए वर्षों, कथित यातना और नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं को निशाना बनाने के लिए सरकार द्वारा आतंकवाद संबंधी अपराधों के इस्तेमाल के बारे में एक वृतांत लिखा.

मुंबई के ही एक दूसरे कार्यकर्ता वरनन गोंज़ाल्विस ने मजदूरों के अधिकारों के लिए काम किया है. 2013 में, उन्हें शस्त्र अधिनियम और यूएपीए के तहत दोषी पाया गया था. तब तक, वह सुनाई गई सज़ा की अवधि जितना समय कैद में बिता चुके थे, इसलिए उन्हें रिहा कर दिया गया.

दिल्ली में रहने वाले पत्रकार 65-वर्षीय गौतम नवलखा, पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स के सचिव रह चुके हैं और इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली पत्रिका के संपादकीय सलाहकार हैं. उन्होंने जम्मू-कश्मीर में मानवाधिकारों के उल्लंघन के बारे में लिखा है, और भारद्वाज, फ़रेरा और गोंज़ाल्विस की तरह ही यूएपीए के मुखर आलोचक हैं.

तेलंगाना के कवि और नागरिक अधिकार कार्यकर्ता 78-वर्षीय वरवरा राव ने रिवोल्यूशनरी राइटर्स एसोसिएशन की स्थापना की. आंध्र प्रदेश की राज्य सरकार को उखाड़ फेंकने की साजिश सहित अन्य आरोपों में उन्हें पहले भी कई बार गिरफ्तार किया गया लेकिन सभी आरोपों से उन्हें बरी कर दिया गया.

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने महाराष्ट्र के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक को नोटिस जारी किया है. इसमें उसने कहा है कि ऐसा लगता है कि पुलिस ने इन गिरफ्तारियों में मानक कार्य-संचालन प्रक्रिया का पालन नहीं किया है, "जिससे उनके मानवाधिकारों का उल्लंघन हो सकता है." आयोग ने उनसे चार सप्ताह के भीतर रिपोर्ट मांगी है.

ह्यूमन राइट्स वॉच और एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया ने कहा कि महाराष्ट्र पुलिस ने पहले भी इस मामले में कई अन्य कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया था जो कि राजनीति से प्रेरित प्रतीत होते हैं.

महाराष्ट्र पुलिस ने 6 जून, 2018 को सुरेंद्र गडलिंग, रोना विल्सन, सुधीर धवाले, शोमा सेन और महेश राउत को यूएपीए और भारतीय दंड संहिता के कई धाराओं के तहत गिरफ्तार किया. अधिकारियों ने इस मामले में नौ अन्य लोगों के नाम भी दर्ज कराए थे. उनमें से कई कबीर कला मंच के सदस्य हैं जो गायक, कवि और कलाकारों का पुणे स्थित एक सांस्कृतिक समूह है.

एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के कार्यकारी निदेशक आकार पटेल ने कहा, "भारत में पुलिस ने सरकार के आलोचकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के खिलाफ बार-बार आतंकनिरोधी कानूनों का इस्तेमाल किया है और अक्सर, ऐसे ही लोगों के खिलाफ कई मामले दर्ज करके उन्हें निशाना बनाया है. सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के इन निर्देशों को अनदेखी करना जारी रखा है कि माओवादी सरोकारों के प्रति सहानुभूति के साथ हिंसा में आपराधिक सांठगांठ का घालमेल नहीं किया जाए."

धवाले और कबीर कला मंच के सदस्यों सहित महाराष्ट्र में कई दलित और आदिवासी कार्यकर्ताओं को पहले भी इसी तरह के आरोपों में गिरफ्तार किया गया है. जनवरी 2013 में, मुंबई उच्च न्यायालय ने फैसला दिया कि किसी अवैध संगठन में सदस्यता की व्याख्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार जैसी मौलिक स्वतंत्रता के आलोक में की जानी चाहिए और कि “निष्क्रिय सदस्यता” अभियोजन के लिए पर्याप्त आधार नहीं है.

भारतीय अदालतों ने फैसला दिया है कि महज़ एक विशेष दर्शन का समर्थन करने वाला साहित्य रखना अपराध नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि “केवल किसी प्रतिबंधित संगठन की सदस्यता एक व्यक्ति को तब तक अपराधी नहीं बनाती जब तक कि वह हिंसा का सहारा नहीं लेता या लोगों को हिंसा के लिए प्रवृत नहीं करता या हिंसा करके या हिंसा भड़का कर अशांति नहीं पैदा करता है.”

एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया और ह्यूमन राइट्स वॉच ने भारत सरकार से बार-बार यह सुनिश्चित करने का आग्रह किया है कि संगठनों पर कोई भी प्रतिबंध अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, संगठन बनाने और शांतिपूर्ण एकत्र होने के अधिकारों का उल्लंघन न करे. उन्होंने यूएपीए रद्द करने का भी आग्रह किया है.

आकार पटेल ने कहा, "भारत सरकार लंबे समय से भारत के मुखर और विविधपूर्ण नागरिक समाज को अपने लोकतंत्र की कसौटी बताती रही है. इस कसौटी का तकाज़ा है सरकार को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और एकत्र होने के अधिकारों की रक्षा करनी चाहिए और कार्यकर्ताओं को बेख़ौफ़ होकर बोलने का मौक़ा मिलना चाहिए."