Policemen form a chain across a road to stop a protest march by workers of the People's Democratic Party (PDP), Kashmir's main opposition political party, in Srinagar on  November 21, 2011.
 

© 2011 Reuters

(न्यू यॉर्क, 23 जनवरी, 2012) - ह्यूमन राइट्स वॉच (Human Rights Watch) ने आज अपनी वर्ल्ड रिपोर्ट 2012 में कहा कि 2011 के दौरान भारत सरकार अधिकारों का उल्लंघन करने वालों की जवाबदेही निर्धारित करने या कमज़ोर समुदायों की रक्षा के लिए प्रभावी नीतियाँ लागू करने में विफल रही है।

 

ह्यूमन राइट्स वॉच ने कहा कि सरकार ने राजनीतिक नेताओं और सलाहकारों की सिफ़ारिशों की अनदेखी करते हुए, व्यापक रूप से बदनाम सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम निरस्त करने के लिए कोई कार्रवाई नहीं की। यातना और ग़ैरकानूनी हत्याओं की व्यापक शिकायतों और साथ ही पुलिस कर्मियों की काम की शोचनीय परिस्थितियों के बावजूद सरकार ने पुलिस सुधार की त्वरित ज़रूरत को भी नज़रंदाज़ कर दिया।

 

"भारत सरकार ने दुर्व्यवहार करने वाले सैनिकों पर मुक़दमा चलाने, ज़रूरी पुलिस सुधार करने, या यातना का अन्त करने के लिए बहुत ही कम काम किया," ह्यूमन राइट्स वॉच के एशिया निदेशक ब्रैड एडम्स (Brad Adams) ने कहा। "अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर, भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और मानवाधिकार परिषद (United Nations Security Council and Human Rights) में विदेशों में रह रहे कमज़ोर लोगों के अधिकारों की रक्षा संबंधी मामले की अगुआई के अवसर से चूक गया।"

 

अपनी वर्ल्ड रिपोर्ट 2012 में, ह्यूमन राइट्स वॉच ने पिछले वर्ष के दौरान 90 से भी ज़्यादा देशों में मानव अधिकारों पर प्रगति का मूल्यांकन किया, जिसमें अरब जगत में लोकप्रिय होती बग़ावत भी शामिल है जिसकी कुछ ही लोगों ने कल्पना की होगी। ह्यूमन राइट्स वॉच ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि हिंसक बलों द्वारा "अरब स्प्रिंग" के विरोध को देखते हुए अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को इस क्षेत्र में अधिकारों का सम्मान करने वाले लोकतंत्रों के जन्म में सहायता की महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी।

 

भारत में, 2011 के दौरान जम्मू और कश्मीर (Jammu & Kashmir) राज्य में हिंसा काफी कम हुई है। ह्यूमन राइट्स वॉच ने कहा कि राज्य मानवाधिकार आयोग द्वारा उत्तरी कश्मीर (Kashmir) में 38 स्थानों पर छानबीन और 2730 अचिह्नित क़ब्रों की खोज जाँच पीड़ितों को न्याय प्रदान करने की दिशा में पहला अच्छा कदम था। हालाँकि सरकार का कहना है कि ज़्यादातर शव अज्ञात पाकिस्तानी आतंकवादियों के हैं, लेकिन अनेक कश्मीरियों (Kashmiris) का मानना है कि फ़र्जी "मुठभेड़ की हत्याओं" या बलपूर्वक गायब होने के शिकार हुए लोग भी उन क़ब्रों में दफ़न किए गए हो सकते हैं। हालाँकि सरकार ने इसकी गहन जाँच का वादा किया है, लेकिन सेना और संघीय अर्द्धसैनिक बलों के सहयोग के बिना विश्वसनीय जाँच असंभव है, जो सशस्त्र बलों के विशेष अधिकार अधिनियम और अन्य क़ानूनों के दंड मुक्ति के प्रावधानों के पीछे छिप जाते हैं।

 

देर से ही सही, लेकिन सरकार ने भारत-बांग्लादेश सीमा पर सीमा सुरक्षा बल (BSF) द्वारा हुई हत्याओं की महामारी पर कार्रवाई की। हालाँकि सरकार ने संयम बरतने का आदेश दिया था और हताहतों की संख्या कम करने के लिए रबर की गोलियाँ भी प्रदान की थी, लेकिन BSF सैनिकों की यातना से होने वाली मौतों और अन्य दुर्व्यवहारों की रिपोर्ट लगातार आती रही। पिछले दशक में 900 से ज़्यादा भारतीयों और बांग्लादेशियों की ग़ैरकानूनी हत्याओं के लिए किसी भी BSF सैनिक पर मुक़दमा नहीं चलाया गया।

 

"सशस्त्र बलों द्वारा दुर्व्यवहारों के प्रति प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह (Manmohan Singh) के 'शून्य सहिष्णुता' आह्वान को दुर्व्यवहार करने वालों की ज़िम्मेदारी निर्धारित करने में शून्य प्रगति के कारण प्रभावहीन कर दिया गया, एडम्स (Adams) ने कहा। अब सरकार द्वारा सेना को दंड मुक्ति के बहाने के रुप में सेना की टुकड़ियों के मनोबल या परिचालन-संबंधी ज़रूरतों के दावों के पीछे छिपने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।"

 

माओवादी उग्रवाद का सामना कर रहे क्षेत्रों के निवासियों, जो 2011 में 11 भारतीय राज्यों में लगभग 80 ज़िलों में सक्रिय था, की शिकायत है कि वे राज्य सुरक्षा बलों और माओवादी विद्रोहियों के बीच पिसकर रह गए हैं। सुरक्षा एजेंसियों ने मनमाने ढंग से अनेक गिरफ़्तारियाँ की हैं और उन पर यातना की अनेक घटनाओं के आरोप हैं। माओवादी अक्सर गाँव के लोगों से आश्रय और जानकारी की मांग करते हैं, जिन्हे बाद में सुरक्षा बलों द्वारा विद्रोहियों के साथ सहयोग करने के लिए दंडित किया जाता है।

 

इन क्षेत्रों में काम कर रहे कार्यकर्ताओं को माओवादियों और सरकारी बलों दोनों की ओर से जोखिम रहता है। माओवादियों ने कार्यकर्ताओं और ऐसे दूसरे लोगों को यातना दी है और उनकी हत्या की है जिनके बारे में उन्हें संदेह था कि वे सरकार के मुखबिर हैं, और अनेक मामलों में पुलिस ने कार्यकर्ताओं पर माओवादी विचारधारा के समर्थन के लिए साज़िश और राजद्रोह का आरोप लगाया है। माओवादी अपने बलों में बच्चों को भर्ती करते हैं और अक्सर विद्यार्थियों को जोखिम में डालते हुए स्कूलों पर हमला करते हैं। सरकार ने माओवादियों के ख़तरे वाले क्षेत्रों के स्कूलों में सुरक्षा बलों की तैनाती समाप्त करने संबंधी अदालत के निर्देशों का पूरी तरह पालन नहीं किया है।

 

"जबकि सरकार इस बात से सहमत है कि माओवादी आंदोलन का कारण सरकार की असफल नीतियां है तथा वह दिल और दिमाग जीतने की बात करती है, लेकिन यह सुरक्षा बलों को दंड मुक्ति की सुविधा के साथ दुर्व्यवहार की अनुमति देती है," एडम्स (Adams) ने कहा। "इसी प्रकार, माओवादी हाशिए पर रह रहे लोगों के समर्थन में आवाज़ उठाने का दावा करते हैं, लेकिन वे उन सबको दंड देते हैं जो उनके हिंसक तरीक़ों से असहमत हो सकते हैं।"

 

ह्यूमन राइट्स वॉच ने कहा है कि सरकार ने बलात्कार पीड़ितों की क्षतिपूर्ति के लिए लंबे समय से अपेक्षित उपायों को अपनाया है और बलात्कार के मामलों की जाँच के लिए अपने चिकित्सा-क़ानूनी प्रोटोकॉल से अपमानजनक "उँगली" परीक्षण बाहर रखने के लिए उसका संशोधन किया है। फिर भी सरकार ने "सम्मान के नाम पर हुई हत्याओं", दहेज़ संबंधी मौतों और यौन हिंसा की व्यापक समस्याओं के समाधान के लिए बहुत कम काम किया है। लिंग चयन के आधार पर गर्भपात और लड़कियों तथा महिलाओं के खिलाफ अन्य बुराइयों के चलते भारत के लिंग अनुपात में आई गिरावट आर्थिक और सामाजिक असमानताओं की ओर संकेत करती है जिसके कारण परिवार बेटियों के बजाय बेटों को वरीयता देते हैं, और सरकार को महिलाओं के लिए शैक्षणिक और आर्थिक अवसरों के विस्तार की ज़रूरत है। 19 साल से कम उम्र वाली या दो से ज़्यादा जीवित संतान वाली सभी माताओं के लिए मातृ स्वास्थ्य देखभाल कार्यक्रमों के विस्तार में सरकार की विफलता भी महिलाओं की रक्षा के प्रति उसकी प्रतिबद्धता पर प्रश्नचिह्न लगाती है।

 

भारतीय चिकित्सा परिषद ने 2011 में प्रशामक देखभाल को चिकित्सा विशेषता के रूप में मान्यता प्रदान कर एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। परन्तु सरकार द्वारा सहायता प्राप्त आधे से ज़्यादा क्षेत्रीय कैंसर केंद्र अभी भी प्रशामक देखभाल या दर्द प्रबंधन नहीं उपलब्ध करा रहे हैं, जबकि उनके 70 प्रतिशत से भी ज़्यादा रोगियों को इसकी जरूरत होती है। इसके परिणामस्वरूप हज़ारों मरीजों को गंभीर, गैर जरुरी पीड़ा भुगतनी पड़ती है। हालाँकि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर, भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UN Security Council) और मानवाधिकार परिषद (Human Rights Council) दोनों में रहा है, लेकिन इसने श्रीलंका और बर्मा में संघर्ष से संबंधित दुर्व्यवहारों की स्वतंत्र, और अंतर्राष्ट्रीय जाँच का समर्थन करने के अवसर गँवा दिए। विदेशों में मानव अधिकारों की रक्षा के लिए अपना नेतृत्व दिखाने के लिए इन सदस्यताओं का इस्तेमाल करने की जगह भारत ने गंभीरतम दुर्व्यवहार पर भी चुप्पी साधे रखी। उदाहरण के लिए, सीरिया में बढ़ती हिंसा के बारे में चिंता व्यक्त करते समय, नई दिल्ली उन नीतियों का समर्थन करने में विफल रही जो सीरिया के लोगों की पीड़ा कम कर सकती थीं।

 

"ज़िम्मेदारीपूर्ण वैश्विक नेतृत्व के संकेतों के लिए अब भारत पर करीब से नज़र रखी जा रही है," एडम्स (Adams) ने कहा। "अन्य देशों के तथाकथित 'आंतरिक मामलों' में हस्तक्षेप की भारत की अनिच्छा के कारण दुर्व्यवहार-पूर्ण शासनों द्वारा मानव अधिकारों के उल्लंघन पर इसकी चुप्पी इसकी अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकारों संबंधी प्रतिबद्धताओं और अधिकारों का सम्मान करने वाले राष्ट्र के रूप में इसकी स्वयं की छवि से मेल नहीं खाती है।"