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भारत का ट्रांसजेंडर अधिकार कानून प्रशंसा के लायक नहीं

Published in: The Advocate
एक विरोध प्रदर्शन के दौरान तख्तियां लेकर ट्रांसजेंडर समुदाय के खिलाफ कथित भेदभाव और हिंसा ख़त्म करने की मांग करते लोग, बेंगलुरु, 21 अक्टूबर, 2016. © 2016 रायटर्स

भारत की संसद ने पिछले सप्ताह ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा संबंधी एक विधेयक पारित किया, लेकिन यह नया कानून कई मोर्चों पर अपर्याप्त है. 2016 में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों संबंधी विधेयक पहली बार पेश किए जाने के बाद से ही ट्रांस एक्टिविस्ट्स और संबद्ध मानवाधिकार समूहों ने ऐसे विभिन्न विधेयकों की आलोचना की है. आखिरकार, सांसद इस मामले में कार्यकर्ताओं द्वारा उठायी गई चिंताओं पर विचार करने में विफल रहे. भारत का यह नया कानून लंबे समय से दमित समुदायों के सम्मान और उत्थान के बजाय ट्रांस व्यक्तियों के अधिकारों का उल्लंघन करेगा.

नए कानून में शायद सबसे गंभीर त्रुटि कानूनी रूप से लिंग मान्यता के लिए अनिवार्य की गई प्रक्रिया है – ऐसी प्रक्रिया जिसके द्वारा ट्रांस व्यक्ति अपनी पहचान दर्शाने के लिए अपने दस्तावेज बदल सकते हैं.

भारत के नए कानून में दो स्तरीय प्रक्रिया तय की गई है. सबसे पहले, एक व्यक्ति को अपने निवास क्षेत्र के जिला मजिस्ट्रेट के पास “ट्रांसजेंडर प्रमाणपत्र” के लिए आवेदन देना होगा. ऐसा किसी व्यक्ति की स्व-घोषित पहचान के आधार पर किया जा सकता है. फिर, एक प्रमाणपत्र धारक “लिंग प्रमाणपत्र में परिवर्तन” के लिए आवेदन कर सकता है, यह उनके कानूनी लिंग को पुरुष या महिला में बदलने के लिए अधिकारियों को संकेत करता है. लेकिन इस दूसरे चरण में व्यक्ति के लिए यह आवश्यक है कि दूसरी बार लिंग निर्धारण के लिए जिला मजिस्ट्रेट को चिकित्सा पदाधिकारी द्वारा जारी सर्जरी प्रमाण उपलब्ध कराए और अधिकारी “ऐसे प्रमाण पत्र की सत्यता से संतुष्ट हों.”

यह प्रक्रिया सरकारी कार्यालय को असाधारण शक्ति प्रदान करती है कि वह इस “अर्हता” के बारे में तय करे कि कौन ट्रांस व्यक्ति क्या है. यह लोगों को ऐसी चिकित्सा प्रक्रियाओं में शामिल होने के लिए बाध्य भी करती है जो शायद वो नहीं चाहते - यह मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का ऐसा कृत्य है जिसकी भारतीय और अंतरराष्ट्रीय न्यायशास्त्र निंदा करते हैं.

भारतीय अदालतें लंबे समय से यह मानती रही हैं कि ट्रांस व्यक्ति जबरन हस्तक्षेप या भेदभाव के बिना, अपनी शर्तों पर सरकारी मान्यता के हकदार हैं.

2014 में, नालसा बनाम भारत मामले में भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया था कि ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को तीसरे लिंग के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए और उन्हें सभी मौलिक अधिकार प्राप्त होने चाहिए, जबकि शिक्षा और रोजगार में वे विशिष्ट सुविधाओं के भी हकदार हैं. न्यायमूर्ति के.एस. राधाकृष्णन ने इस न्याय पीठ के निर्णय में लिखा था कि राज्य और संघीय सरकारों को चाहिए कि वे “ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के स्व-घोषित लिंग निर्धारण के अधिकार” को मान्यता प्रदान करें. अदालत ने स्पष्ट किया था कि “किसी व्यक्ति की यौन उन्मुखता के पुनर्संयोजन [सेक्स रिअसाइनमेंट सर्जरी] के लिए कोई भी आग्रह अनैतिक और अवैध है.”

अक्टूबर 2015 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक फैसले में कानूनी लिंग मान्यता के अधिकार तथा अन्य अधिकारों के बीच अंतर्भूत संबंध को स्थापित किया. अपने माता-पिता और पुलिस के  अत्याचार के खिलाफ राहत पाने के 19-वर्षीय ट्रांसजेंडर व्यक्ति के अधिकार की पुष्टि करते हुए न्यायमूर्ति सिद्धार्थ मृदुल ने लिखा: “ट्रांसजेंडर [व्यक्ति] के लिंग की समझ या अनुभव उसके मूल व्यक्तित्व और अस्तित्व का अभिन्न अंग है. जहाँ तक कि मैं कानून समझता हूं, सभी को अपने चुने हुए लिंग में मान्यता प्राप्त करने का मौलिक अधिकार है.”

अदालती फैसलों के उल्लंघन के अलावा, नए कानून के प्रावधान कानूनी लिंग मान्यता संबंधी अंतरराष्ट्रीय मानकों के भी विपरीत हैं. अंतर्राष्ट्रीय मानक और सर्वश्रेष्ठ परिपाटियां - जिनमें कई संयुक्त राष्ट्र एजेंसियांवर्ल्ड मेडिकल एसोसिएशन और वर्ल्ड प्रोफेशनल एसोसिएशन फॉर ट्रांसजेंडर हेल्थ के मानक और परिपाटी शामिल हैं, सभी कानूनी और चिकित्सा प्रक्रियाओं को पृथक करना आवश्यक मानती हैं.

2015 में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय ने सिफारिश की थी कि देशों को चाहिए कि “नसबंदी, जबरन उपचार और तलाक जैसे अपमानजनक पूर्व शर्तों को समाप्त करते हुए मांगे जाने पर तुरंत चयनित लिंग को दर्शाने वाले कानूनी पहचान दस्तावेज जारी करें.” विश्व स्वास्थ्य संगठन और एशिया-पैसिफिक ट्रांसजेंडर नेटवर्क की 2015 की रिपोर्ट की सिफारिश है कि सरकारें “किसी चिकित्सीय आवश्यकता या कोई भेदभाव के बगैर, प्रत्येक व्यक्ति की स्व-परिभाषित लिंग पहचान को पूरी तरह मान्यता देने के लिए, सभी आवश्यक विधायी, प्रशासनिक और अन्य उपाय करें.”

कानून से समक्ष एक व्यक्ति के रूप में मान्यता के अधिकार की गारंटी कई अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार सम्मेलनों में की गई है और प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा और महत्व को स्वीकार करने का यह एक बुनियादी पहलू है. कानूनी लिंग पहचान अन्य मौलिक अधिकारों का भी एक अनिवार्य तत्व है - जिसमें निजता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, मनमानी गिरफ्तारी से मुक्ति,  और रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, न्याय तक पहुंच एवं स्वतंत्र गतिविधि से संबंधित अधिकार शामिल हैं.

भारत के एक्टिविस्ट इस आधार पर और कई अन्य मोर्चों पर नए कानून को चुनौती देने की तैयारी कर रहे हैं.

हालांकि यह कानून स्पष्ट रूप से शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य देखभाल और कई अन्य क्षेत्रों में ट्रांस व्यक्तियों के खिलाफ भेदभाव का निषेध करता है, मगर अन्य कई ऐसे क्षेत्र हैं जहां कानून के भेदभावपूर्ण प्रावधानों को चुनौती देने के लिए यह उपजाऊ जमीन भी प्रदान करता है. नया कानून इंटरसेक्स लोगों को भी मान्यता देता है लेकिन उन्हें कोई विशिष्ट सुरक्षा प्रदान नहीं करता है. चिकित्सकीय रूप से अनावश्यक “सामान्यीकरण” सर्जरी से इंटरसेक्स बच्चों को सुरक्षा देने की मांग के ज़ोर पकड़ने, जैसे कि 2019 में तमिलनाडु में शल्य चिकित्सा पर प्रतिबंध लगाया गया, से इस मोर्चे पर भी सुधारों को मार्गदर्शन मिलना चाहिए.

सरल शब्दों में कहे तो कानून के समक्ष मान्यता की प्रक्रिया और किसी व्यक्ति के शरीर पर  नियंत्रण किसी भी चिकित्सीय हस्तक्षेप से अलग होना चाहिए. लेकिन अगर किसी की व्यक्तिगत पहचान या अवस्थांतरण प्रक्रिया के लिए चिकित्सीय सहायता की ज़रूरत है, तो ये सेवाएं उपलब्ध और सुलभ होनी चाहिए.

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