राजस्थान के रामगढ़ की सड़कों पर गश्त करते और व्यापारियों द्वारा ले जाए जा रहे मवेशियों को जब्त करते गौरक्षक समूह के सदस्य, नवंबर 2015.

© 2015 एलीसन जॉइस/गेटी इमेजेज़

(न्यू यॉर्क) - ह्यूमन राइट्स वॉच ने आज जारी एक रिपोर्ट में कहा है कि भारत सरकार को तथाकथित गौरक्षा के नाम पर अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने वाले रक्षक समूहों की हिंसा को रोकना चाहिए और उन पर कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए.

“भारत में हिंसात्मक गौ संरक्षण: गौरक्षकों के निशाने पर अल्पसंख्यक,” 104 - पन्नों की रिपोर्ट, गोमांस का उपभोग करने और पशु व्यापार से जुड़े लोगों के खिलाफ हिंसक अभियान छेड़ने के लिए सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के सदस्यों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली सांप्रदायिक बयानबाज़ी के बारे में बताती है. मई 2015 से दिसंबर 2018 के बीच कम-से-कम 44 लोग मारे गए जिनमें 36 मुस्लिम थे. पुलिस ने अक्सर हमलावरों के खिलाफ कार्रवाई को बाधित किया, जबकि कई भाजपा नेताओं ने सार्वजनिक रूप से हमलों को सही ठहराया.

ह्यूमन राइट्स वॉच की दक्षिण एशिया निदेशक मीनाक्षी गांगुली ने कहा, “हो सकता है कि गौरक्षा का आह्वान हिंदू वोटों को आकर्षित करने के लिए शुरू हुआ हो, लेकिन यह भीड़ के लिए अल्पसंख्यक समूह पर हिंसक हमले और उनकी हत्या करने की खुली छूट में बदल गया है. भारत सरकार को इन हमलों को उकसाने या सही ठहराने, पीड़ितों को दोषी ठहराने या असल दोषियों की रक्षा करने पर रोक लगानी चाहिए.”

रिपोर्ट में 11 मामलों, जिसमें 14 लोगों की मौत हुई, और चार भारतीय राज्यों - हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और झारखंड में सरकार द्वारा की गई कार्रवाइयों का विवरण है. इन राज्यों का चयन इसलिए किया गया क्योंकि यहां बड़ी संख्या में भीड़ के हमलों के मामले सामने आए थे.

2016 में, गौरक्षक समूह ने एक मुस्लिम पशु व्यापारी और एक बारह साल के लड़के की पीट-पीटकर हत्या कर दी. ये झारखण्ड राज्य के एक पशु मेले में जा रहे थे. उनके बुरी तरह क्षत-विक्षत शव, जिनके हाथ पीछे बंधे थे, पेड़ से लटके पाए गए. लड़के के पिता झाड़ी में छिपकर यह हमला देखते रहे: “अगर मैं बाहर निकलता, तो वे मुझे भी मार डालते. मेरा बेटा मदद के लिए चिल्ला रहा था, लेकिन मैं इतना डर गया था कि छिप गया.”

अनेक हिंदू गाय को पवित्र मानते हैं और अधिकांश भारतीय राज्यों में गौहत्या पर प्रतिबंध है. लेकिन हाल के वर्षों में, कई भाजपा शासित राज्यों ने ऐसे सख्त कानूनों और नीतियों को अपनाया है जो अल्पसंख्यक समुदायों को बहुत नुकसान पहुंचाते हैं. फरवरी 2019 में, सरकार ने गौरक्षा के लिए एक राष्ट्रीय आयोग की घोषणा की.

ह्यूमन राइट्स वॉच ने कहा कि इन नीतियों और गौरक्षक समूहों के हमलों ने भारत के पशु व्यापार और ग्रामीण कृषि अर्थव्यवस्था को अस्त-व्यस्त कर दिया है. साथ ही, खेती और डेयरी सेक्टर से जुड़े चर्म और मांस निर्यात उद्योग पर भी इसका असर पड़ा है. ये हमले अक्सर ऐसे समूहों द्वारा किए जाते हैं जो भाजपा से सम्बद्ध उग्र हिंदू संगठनों से जुड़े होने का दावा करते हैं. उनके हमलों के शिकार ज्यादातर मुस्लिम या दलित और आदिवासी समुदाय हैं. ह्यूमन राइट्स वॉच ने कहा है कि इन हमलों पर सरकार की अपर्याप्त कार्रवाई हिंदुओं सहित उन समुदायों को नुकसान पहुंचा रही है जिनकी जीविका पशुधन से जुड़ी हुई है, इनमें किसान, चरवाहे, पशु ट्रांसपोर्टर, मांस व्यापारी और चर्म उद्योग मजदूर शामिल हैं.

रिपोर्ट में दर्ज लगभग सभी मामलों में, पुलिस ने शुरू में जांच को बाधित किया, प्रक्रियाओं को नजरअंदाज कर दिया या यहां तक कि वह हत्याओं और मामलों पर पर्दा डालने में भी शामिल रही. राजस्थान के एक सेवानिवृत्त वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने कहा, “पुलिस को गौरक्षकों के प्रति सहानुभूति रखने, कमजोर जांच करने और उन्हें खुली छूट देने के लिए राजनीतिक दबाव का सामना करना पड़ता है. इन गौरक्षकों को राजनीतिक आश्रय और मदद मिलती है.”

कई मामलों में, हिंदू राष्ट्रवादी समूहों के राजनीतिक नेताओं और भाजपा के जनप्रतिनिधियों ने इन हमलों का बचाव किया. दिसंबर में, उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में गुस्साई भीड़ ने एक पुलिस थाना में आग लगा दी और कई वाहनों को जला दिया. यह हिंसा ग्रामीणों को कुछ जानवरों के कंकाल, जिन्हें मारी गई गायों का बताया गया, मिलने के बाद भड़की. भीड़ का मुकाबला करने वाले एक पुलिस अधिकारी सहित दो लोग मारे गए. हिंसा की निंदा करने के बजाय मुख्यमंत्री ने इन हत्याओं को “दुर्घटना” बताया और फिर चेतावनी जारी की: “पूरे राज्य में न सिर्फ गोहत्या बल्कि गैरकानूनी पशुबध प्रतिबंधित है.” एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने कहा कि जांचकर्ता गायों की हत्या करने वालों पर कानूनी करवाई करने के लिए दृढ़प्रतिज्ञ हैं. उन्होंने कहा, “गौ-हत्यारों को सजा दिलाना हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है. हत्या और दंगा का मामला फिलहाल हमारी प्राथमिकता नहीं.”

कई मामलों में, पुलिस ने पीड़ितों के परिजनों और सहयोगियों के खिलाफ गोहत्या पर प्रतिबंध लगाने वाले कानूनों के तहत शिकायतें दर्ज की हैं, इससे गवाह और परिवार न्याय की मांग करने से डर जाते हैं. कुछ मामलों में, अधिकारियों और अभियुक्तों, दोनों की धमकी के कारण गवाह अपने बयान से पलट गए. यहां तक कि अधिकारियों ने अवैध रूप से गायों की हत्या के संदिग्धों के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए) — एक दमनकारी कानून जिसमें बिना किसी आरोप के एक साल तक हिरासत में रखने का प्रावधान है — के तहत भी मामला दर्ज किया.

जुलाई 2018 में, भारत के सुप्रीम कोर्ट ने “लिंचिंग” — भारत में भीड़ द्वारा की जाने वाली हत्या के लिए प्रयुक्त शब्द — को रोकने के उपायों के बतौर कई “निवारक, उपचारात्मक और दंडात्मक” निर्देश जारी किए. अदालत ने सभी राज्य सरकारों को आदेश दिया कि भीड़-हिंसा की घटनाओं को रोकने के लिए हर जिले में एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी नियुक्त किया जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि पुलिस अपराधियों के खिलाफ त्वरित कार्रवाई करे और पीड़ितों और गवाहों को सुरक्षा प्रदान करे.

अदालत ने पीड़ित मुआवजा योजना की सिफारिश की और कहा कि ऐसे सभी मामलों की सुनवाई फास्ट ट्रैक अदालतों में की जाए. अदालत ने कहा कि इन निर्देशों का पालन करने में विफल रहने वाले पुलिस या सरकारी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए. अब तक, कई राज्यों ने अधिकारियों को नामित कर दिया है और भीड़-हिंसा रोकने के लिए पुलिस अधिकारियों को सर्कुलर जारी किए हैं. हालांकि, अदालत के अधिकांश निर्देशों का अभी तक अनुपालन नहीं किया गया है.

भारत महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानूनों पर हुई संधियों का हिस्सा है जो नस्ल, नृ-जातीयता या धर्म पर आधारित भेदभाव पर रोक लगाते हैं, और इनके तहत सरकारों की जिम्मेवारी बनती है कि अपने-अपने निवासियों को समान कानूनी सुरक्षा प्रदान करें. भारत सरकार धार्मिक और अन्य अल्पसंख्यक आबादी को सुरक्षा प्रदान करने और उनके खिलाफ भेदभाव और हिंसा के लिए जिम्मेदार लोगों पर पूर्ण और निष्पक्ष कानूनी कार्रवाई करने के लिए बाध्य हैं.

ह्यूमन राइट्स वॉच ने कहा कि भारत की राष्ट्रीय और राज्य सरकारों को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को लागू करना चाहिए. सरकारों को राजनीतिक संपर्कों की परवाह किए बगैर अपराधियों की पहचान और उन पर मुकदमा चलाने के लिए समुचित जांच सुनिश्चित करनी चाहिए और मुसलमानों, दलितों और अन्य अल्पसंख्यकों पर सांप्रदायिक हमलों को रोकने के लिए एक अभियान शुरू करना चाहिए. सरकारों को पशुधन से जुड़ी जीविका, विशेष तौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में इससे जुड़ी जीविका को प्रभावित कर रहीं नीतियों को भी वापस लेना चाहिए और जाति या धार्मिक पूर्वाग्रहों के कारण अधिकारों की रक्षा करने में विफल रहने वाले पुलिसकर्मियों और अन्य संस्थाओं की जिम्मेदारी तय करनी चाहिए.

मीनाक्षी गांगुली ने कहा, “भारतीय पुलिस द्वारा भीड़ के हमलों की जांच में अपराध पीड़ित अल्पसंख्यकों पर ही आरोप लगाए जाने की लगभग पूरी आशंका रहती है क्योंकि पुलिस को सरकारी संपर्कों वाले गौरक्षकों पर कार्रवाई करनी होती है. केंद्र और राज्य के अधिकारियों को अपने मानवाधिकारों के दायित्वों की अवहेलना करने के बजाय भीड़ द्वारा की जाने वाली हत्याओं के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन करना चाहिए.”

कुछ मामले

मोहम्मद कासिम, उत्तर प्रदेश

18 जून, 2018 को हापुड़ जिले के पिलखुवा गांव के पास भीड़ ने गौहत्या की कोशिश करने के आरोप में 45-वर्षीय मोहम्मद कासिम को पीट-पीटकर मार डाला. कासिम मवेशी व्यापारी था जिसमें ज्यादातर बैल और बकरियों की खरीद-बिक्री हुआ करती थी. पास मौजूद 64-वर्षीय समयदीन ने जब हस्तक्षेप करने की कोशिश तो उन्हें भी बेरहमी से पीटा गया.

पुलिस द्वारा दर्ज कथित फर्जी रिपोर्ट के अनुसार मौत मोटरसाइकिल दुर्घटना के कारण हुई. समयदीन के भाई यासीन ने ह्यूमन राइट्स वॉच को बताया कि पुलिस की धमकी के कारण उसने मोटरसाइकिल दुर्घटना के झूठे ब्योरे वाली एफआईआर पर हस्ताक्षर किया:

पुलिस ने हमें उस अस्पताल के बारे में नहीं बताया जहां वे कासिम और समयदीन को लेकर गए थे. उन्होंने हमें मवेशी संरक्षण कानूनों के तहत गिरफ्तारी की धमकी दी कि तुम्हारे पूरे परिवार को जेल में डाल देंगे. पुलिस ने कहा, “क्या तुम नहीं जानते कि यह किसकी सरकार है? क्या हो सकता है? तुम सब के लिए बेहतर यही है कि कुछ मत बोलो.”

व्यापक विरोध के बाद, पुलिस ने अंत में हत्या, हत्या के प्रयास और दंगे के आरोप में नौ लोगों को गिरफ्तार किया.

 

अकबर खान, राजस्थान

21 जुलाई, 2018 को अलवर जिले में भीड़ ने 28-वर्षीय अकबर खान की हत्या कर दी. हरियाणा के नूहं जिले के निवासी अकबर खान और उसके सहयोगी असलम खान पर उस समय हमला हुआ जब वे दो गाएं खरीदकर राजस्थान की सीमा से लौट रहे थे. असलम भागने में सफल रहा, लेकिन उसने लोगों को अकबर खान को बेरहमी से पीटते हुए देखा.

गंभीर रूप से घायल शख्स को केवल बीस मिनट की दूरी पर स्थित अस्पताल ले जाने में पुलिस को तीन घंटे लग गए. अस्पताल पहुंचते ही उसे मृत घोषित कर दिया गया. व्यापक भर्त्सना के बाद, एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने देरी किए जाने की पुष्टि हुई है और बताया कि एक पुलिस अधिकारी को निलंबित और चार अन्य का तबादला कर दिया गया है.

हमले के लिए तीन लोगों की गिरफ्तारी के बाद स्थानीय भाजपा विधायक ज्ञान देव आहूजा ने उनकी रिहाई और मामले के गवाह असलम को गिरफ्तार करने की मांग की.

 

मुस्तैन अब्बास, हरियाणा

मार्च 2016 में उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के 27-वर्षीय मुस्तैन अब्बास हरियाणा के कुरुक्षेत्र में मारा गया, वहां वह गाय खरीदने गया था. पुलिस ने गौ-तस्करी का मामला दर्ज कर हत्या पर पर्दा डालने की कोशिश की. अब्बास के पिता ताहिर हसन द्वारा 16 मार्च को पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर किए जाने के बाद पुलिस ने अदालत को बताया कि पुलिस और स्थानीय गौरक्षा समिति के सदस्यों पर मवेशी ले जा रहे एक वाहन से लोगों ने गोली चलाई और पीछा करने पर वे वाहन छोड़ कर भाग गए. पुलिस ने कहा कि भागने वाले व्यक्तियों में एक अब्बास हो सकता है.

18 मार्च को, एक अंतरिम आदेश में, उच्च न्यायालय ने कहा कि पुलिस और जिला प्रशासन अपने कर्तव्य का निर्वाह करते हुए नहीं दिख रहा है और महज जानवरों की ढुलाई कर रहे लोगों के खिलाफ पशु क्रूरता संबंधी उनकी पूर्वधारणा वैध व्यवसाय करने के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन करती है. अदालत ने कहा कि हरियाणा पुलिस ने राज्य में गौरक्षकों को अपनी गतिविधियां संचालित करने और “आतंक बरपा करने” की छूट दे रखी है.

पुलिस ने चार लोगों पर हत्या का मामला दर्ज किया, लेकिन मई 2016 के अपने अंतिम आदेश में अदालत ने फिर कहा कि स्थानीय प्रशासन गौरक्षक समूहों का समर्थन करता हुआ दिखाई दे रहा है और “यह बहुत मुमकिन है कि स्थानीय पुलिस अपने अधिकारियों को बचाने के लिए और राजनीतिक कारणों से इस जघन्य घटना की समग्रता से जांच न करे.” अदालत ने केंद्रीय जांच ब्यूरो द्वारा जांच का आदेश दिया, इसने घटना पर एक नई रिपोर्ट उसी माह दायर की. हालांकि, ढाई साल से अधिक समय बाद भी जांच लंबित है और आरोपपत्र दायर नहीं किया गया है.