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भारत: सुप्रीम कोर्ट द्वारा समलैंगिकता को अपराध बताने वाला कानून निरस्त

एलजीबीटी समूह की निजता और बराबरी के अधिकारों की हिमायत

 

(लंदन) - भारत के सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला दिया कि आपसी सहमति से बने समलैंगिक संबंध को अपराध करार देना असंवैधानिक है. दुनिया के दूसरी सबसे अधिक आबादी वाले देश में मानवाधिकारों और एलजीबीटी समूह की निजता और बराबरी के अधिकारों के लिए यह एक बड़ी जीत है.

भारत के सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर कोलकाता में 6 सितंबर को जश्न मनाते लोग. कोर्ट ने कहा कि आपसी सहमति से बने समलैंगिक संबंध अब अपराध नहीं हैं. © 2018 दिव्यांशु सरकार/एएफ़पी/गेट्टी इमेजेज

6 सितंबर, 2018 का फैसला ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के अवशेष, भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को निरस्त करता है, जिसके तहत “अप्राकृतिक शारीरिक संसर्ग” के लिए 10 साल की सज़ा से लेकर उम्र कैद तक का प्रावधान था.

ह्यूमन राइट्स वॉच की दक्षिण एशिया निदेशक मीनाक्षी गांगुली ने कहा, “सुप्रीम कोर्ट के फैसले का मतलब है कि लंबे समय से अपराध रहे समलैंगिक संबंध अब भारत में जुर्म नहीं हैं. अदालत ने जोर देकर कहा है कि किसी के खिलाफ इस आधार पर भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए कि वे किसे प्यार करते हैं या अपने शयनकक्ष के भीतर क्या करते हैं.”

न्यायाधीशों ने अपने सर्वसम्मत फैसले में कहा कि आपसी सहमति से बने समलैंगिक संबंध अब अपराध नहीं है. उन्होंने धारा 377 को “अतार्किक, मनमाना और समझ से परे” बताया.

अदालत ने दृढ़तापूर्वक कहा है कि भारत में लेस्बियन, गे, बाइसेक्सुअल और ट्रांसजेंडर (एलजीबीटी) समूह भारत के संविधान और अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार कानून दोनों के तहत पूर्ण सुरक्षा के हकदार हैं और आधुनिक भारत में ऐसे कानूनों के लिए कोई जगह नहीं है जो लोगों को उनके स्वभाविक या कथित यौन उन्मुखीकरण के आधार पर दोयम दर्जे का नागरिक मानते हैं.

यह फैसला भारत में समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से हटाने के लिए चले एक लंबे संघर्ष के बाद आया है. 2001 में, एचआइवी/एड्स और यौन स्वास्थ्य पर काम करने वाले संगठन नाज़ फाउंडेशन (इंडिया) ट्रस्ट ने दिल्ली उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की थी. इसमें दावा किया गया था कि धारा 377 भारतीय संविधान और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून दोनों का उल्लंघन करती है और इसने संगठन के सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रम की पहुँच में बाधाएं पैदा की हैं. 2009 में अदालत ने याचिकाकर्ताओं के पक्ष में फैसला सुनाया था.

लेकिन 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को पलटते हुए कहा कि कानून में संशोधन विधायिका की ज़िम्मेदारी है. भारत के एलजीबीटी समूहों के उन लोगों के लिए यह बदलाव बहुत खौफ़नाक रहा जिन्होंने 2009 के फैसले के बाद खुद की पहचान जाहिर कर दी थी. हालांकि, इस वजह से गिनी-चुनी गिरफ्तारियां ही हुईं, मगर भारत में एलजीबीटी समुदाय पक्षपाती कानून के कारण व्यापक भेदभाव का सामना करता रहा. उन पर हिंसा और ज़बरन वसूली और साथ ही पुलिस का खतरा बना रहा.

भारत में कार्यकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से अपने फैसले की समीक्षा की मांग करते हुए नई याचिकाएं दायर की. शुरुआत में समीक्षा याचिकाओं को सुनने से इंकार करने के बाद अदालत ने 2016 में उपचारात्मक याचिकाओं को स्वीकार कर लिया जिससे इस कानून को निरस्त करने की कानूनी लड़ाई फिर से शुरू हुई. विस्तृत सुनवाई के लिए याचिकाओं को पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ के पास भेज दिया गया. जनवरी 2018 में, कोर्ट ने निजता और ट्रांसजेंडर समानता के अधिकारों को सुनिश्चित करने वाले महत्वपूर्ण फैसले देने के बाद यह घोषणा की कि वह इस मामले की समीक्षा करेगा. जुलाई में, पांच न्यायाधीशों की खंडपीठ ने एलजीबीटी समुदाय द्वारा दायर नई याचिकाओं को शामिल करते हुए सुनवाई शुरू की.

ह्यूमन राइट्स वॉच ने कहा है कि यह फैसला अंतरराष्ट्रीय महत्व का भी है. 1860 में लागू की गई भारतीय दंड संहिता की धारा 377 पूर्ववर्ती ब्रिटिश साम्राज्य के ज्यादातर हिस्सों में इसी तरह के कानूनों का आधार बनी. एशिया और अफ्रीका के दूसरे हिस्सों में औपनिवेशिक गवर्नरों ने तथाकथित “अप्राकृतिक अपराध,” आम तौर से जिसका मतलब गुदा मैथुन से था, को जुर्म बताने के लिए धारा 377 की तर्ज पर दर्जनों कानून बनाए. हालाँकि कैरेबियाई क्षेत्र में, अंग्रेजों ने “अप्राकृतिक मैथुन” के खिलाफ़ कानूनों को लागू करते समय अलग भाषा का इस्तेमाल किया.

अनेक राष्ट्रमंडल देशों सहित 70 से अधिक देशों में अभी भी आपसी सहमति से बने समलैंगिक संबंध अपराध हैं. केन्या और बोत्सवाना, दोनों देशों में औपनिवेशिक काल के दौरान बने भारतीय दंड संहिता की तर्ज पर बने कानून लागू हैं. वर्तमान में इन देशों की अदालतों में ऐसे मामले लंबित हैं जो आपसी सहमति से बने समलैंगिक संबंध को अपराध बताने वाले कानूनों को निरस्त कर सकते हैं. हाल के वर्षों में समलैंगिकता को अपराध मानने वाला कानूनों को जिन अन्य देशों की अदालतों ने निरस्त किया है उनमें त्रिनिदाद और टोबैगो (2018) तथा बेलीज (2015) शामिल हैं.

ह्यूमन राइट्स वॉच ने कहा है कि आपसी सहमति से बने समलैंगिक संबंध को अपराध की श्रेणी से बाहर करने भर से भारत में एलजीबीटी समुदाय को तत्काल पूरी तरह से समानता नहीं मिल जाएगी. विशेष रूप से हिजड़ा सहित ट्रांसजेंडर समुदायों को रोजगार, आवास और स्वास्थ्य देखभाल में भेदभाव का सामना करना पड़ता है. 2016 में पेश ट्रांसजेंडर व्यक्तियों पर मसौदा कानून अपनी लैंगिक पहचान के अनुसार कानूनी मान्यता पाने के ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा के लिए पर्याप्त नहीं है.

मीनाक्षी गांगुली ने कहा, “धारा 377 को निरस्त करना एक महत्वपूर्ण कदम है जिसकी गूँज दुनिया भर में समानता के लिए संघर्ष कर रहे समुदायों के बीच सुनाई देगी. लेकिन अन्य देशों की तरह, भारत को यह सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाना बाकी है कि अपने यौन उन्मुखीकरण या लैंगिक पहचान के कारण लंबे समय से हाशिए पर रहने वाले लोगों के अधिकार पूरी तरह से संरक्षित हों.”

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