(न्यूयॉर्क) - ह्यूमन राइट्स वॉच की आज जारी हुई वर्ल्ड रिपोर्ट 2015 (World Report 2015) में कहा गया है कि भारत के प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी की नई सरकार को गंभीर रूप से अधिकारों का हनन करने वाले सरकारी अधिकारियों, पुलिस, और सैन्य कर्मियों को अदालत के सामने पेश करना चाहिए। मई 2014 में निर्वाचित इस सरकार को महिलाओं के अधिकारों को बढ़ावा देकर क़ानून को लागू करने, स्वास्थ्य एवं स्वच्छता की उपलब्धता में सुधार करने, भेदभाव समाप्त करने, और गरीबों तथा दलितों के लिए विकास के फायदों को सुनिश्चित करने हेतु चुनाव अभियान के दौरान किए गए अपने वादों को पूरा करने की दिशा में काम करना चाहिए।

ह्यूमन राइट्स वॉच ने कहा कि 2014 में हनन की जवाबदेही में कुछ उत्साहजनक प्रगति हुई थी।

नवंबर में हुई एक सैन्य घोषणा के अनुसार एक सैन्य अदालत ने 2010 में जम्मू कश्मीर राज्य में तीन ग्रामीणों की न्यायेतर हत्या के लिए तीन सैनिकों और दो अधिकारियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। लेकिन इस दुर्लभ सफलता पर सरकार की क्रूर सशस्त्र सेना विशेषाधिकार अधिनियम को निरस्त या उसमें संशोधन करने की विफलता हावी रही जिसके अंतर्गत सैन्य कर्मचारियों को गंभीर मानवाधिकार हनन के मामलों में अभियोग दायर करने से प्रभावी मुक्ति मिल जाती है। मणिपुर राज्य में मनोरमा देवी की हत्या की 2004 की न्यायिक जांच को रिलीज करने का आदेश देने वाली अदालत ने खुलासा किया कि उस पर अत्याचार करने वाले और बाद में उसकी हत्या करने वाले सैनिक एएफएसपीए द्वारा अभियोग से संरक्षित थे।

ह्यूमन राइट्स वॉच की दक्षिण एशिया की निदेशक ,मीनाक्षी गांगुली (Meenakshi Ganguly), का कहना है, “बहुत गंभीर हनन के लिए भी अभियोग किए जाने से सैनिकों की रक्षा करने वाले भारतीय क़ानून के लिए लोकतंत्र में कोई जगह नहीं है,”। उनका कहना है, “मोदी सरकार को सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम को निरस्त करने की मांग करनी चाहिए और गंभीर उल्लंघन करने वाले सुरक्षा बल के सदस्यों के लिए न्याय को सुनिश्चित करना चाहिए।”

वर्ल्ड रिपोर्ट के 25वें संस्करण में 656 पृष्ठ में, ह्यूमन राइट्स वॉच 90 से अधिक देशों में मानवाधिकार व्यवहारों की समीक्षा करता है। अपने परिचयात्मक निबंध में एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर केनेथ रोथ (Kenneth Roth) सरकारों से इस बात की जांच करने का आग्रह करते हैं कि मानवाधिकार अशांत समय में एक प्रभावी नैतिक मार्गदर्शन प्रदान करता है, और यह भी कि अधिकारों का उल्लंघन करने से गंभीर सुरक्षा चुनौतियाँ भड़क या बढ़ सकती हैं। आजादी और गैर भेदभाव के महत्वपूर्ण मूल्यों की अनदेखी करने से होने वाले अल्पकालिक लाभ शायद ही दीर्घकालिक लाभ के लायक होते हैं।

2014 में, अधिकारियों ने गैर सरकारी संगठनों पर लगे प्रतिबंधों को और सख्त कर दिया जो बड़ी विकास परियोजनाओं के लिए महत्वपूर्ण थे जिसके बारे में कार्यकर्ताओं का कहना था कि उससे प्रभावित लोगों के स्वास्थ्य और आजीविका के साथ-साथ पर्यावरण को भी नुकसान होगा।

भारतीय बाल अधिकार कार्यकर्ता कैलाश सत्यार्थी को 2014 के नोबल शांति पुरस्कार से सम्मानित किए जाने से यह बात उजागर हुई कि भारत में लाखों बच्चे अभी भी ख़राब से ख़राब किस्म की मजदूरों में लगे हुए हैं। जातिगत भेदभाव और आदिवासी समुदायों की उपेक्षा अभी भी एक समस्या बनी हुई है। महिलाओं और बच्चों के खिलाफ होने वाली हिंसा को बेहतर ढंग से दूर करने के लिए किए गए कानूनी सुधारों के बावजूद, उचित क्रियान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए अभी भी निगरानी की कोई व्यवस्था नहीं है। नवम्बर 2014 में, मध्य भारतीय राज्य छत्तीसगढ़ में नसबंदी प्रक्रिया से गुजरने के बाद कम से कम 16 महिलाओं की मौत हो गई और कई अन्य गंभीर रूप से बीमार पड़ गईं जिससे विकल्प चुनने की आजादी और देखभाल की गुणवत्ता की अनदेखी करने वाले, परिवार नियोजन कार्यक्रमों के लक्ष्य चालित दृष्टिकोणों के खिलाफ काफी होहल्ला हुआ।

मोदी सरकार ने व्यापार और निवेश को बढ़ावा देने और भारतीय अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने के लिए विश्व नेताओं के साथ जुड़ने में तेजी दिखाई लेकिन मानवाधिकार हननों पर कुछ भी कहने में विफल रही, और नवम्बर में उत्तरी कोरिया की तरह संयुक्त राष्ट्र के प्रमुख प्रस्तावों के आधार पर बचने की कोशिश करती रही।

मीनाक्षी गांगुली ने कहा,“मोदी वैश्विक चुनौतियों का समाधान ढूँढने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं लेकिन फिर भी उनकी सरकार ने विदेशों में मानवाधिकार चिंताओं पर भारत की निराशानक विरासत को तोड़ने का कोई संकेत नहीं दिया गया है,” उन्होंने कहा, “एक उभरती शक्ति के रूप में भारत को दमनकारी हुकूमत से पीड़ित लोगों के अधिकारों को बढ़ावा देना चाहिए, न कि उनकी अनदेखी करनी चाहिए।”