भारत: विकलांग महिलाओं के न्याय के रास्तों की बाधाएं दूर करें

भारत में यौन हिंसा उत्तरजीवी विकलांग महिलाओं और लड़कियों को न्याय व्यवस्था तक पहुंचने में बड़ी-बड़ी बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है, आज ह्यूमन राइट्स वॉच ने अपनी एक नई रिपोर्ट में यह कहा है.

(नई दिल्ली, 3 अप्रैल, 2018) - भारत में यौन हिंसा उत्तरजीवी विकलांग महिलाओं और लड़कियों को न्याय व्यवस्था तक पहुंचने में बड़ी-बड़ी बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है, आज ह्यूमन राइट्स वॉच ने अपनी एक नई रिपोर्ट में यह कहा है. पांच साल पहले, सरकार ने यौन हिंसा मामलों के लिए महत्वपूर्ण सुधार किए थे, लेकिन इसके कार्यान्वयन में गंभीर कमियां मौजूद हैं.

विकलांगता अधिकार कार्यकर्ता और रिपोर्ट की सह-लेखिका निधि गोयल ने कहा, "साल 2013 के बाद से भारत ने यौन हिंसा पर महत्वपूर्ण क़ानूनी सुधार किए हैं, लेकिन विकलांग महिलाओं और लड़कियों की अभी भी न्याय तक समान पहुँच नहीं बन पाई है. विकलांग भारतीय महिलाओं और लड़कियों को अब यौन हिंसा का अदृश्य शिकार बने नहीं रहना चाहिए."

61 पन्नों की रिपोर्ट, “यौन हिंसा के अदृश्य शिकार: भारत में विकलांग महिलाओं और लड़कियों की न्याय तक पहुँच,” विस्तार से उन चुनौतियों के बारे में बताती है जिनका बहुत सी विकलांग महिलाएं और लड़कियां न्यायिक प्रक्रिया के दौरान सामना कर रही हैं. इनमें पुलिस को दुर्व्यवहार की रिपोर्टिंग, उचित चिकित्सा देखभाल प्राप्त करने, शिकायतों की जांच करवाने, अदालती प्रक्रिया से गुजरने और पर्याप्त क्षतिपूर्ति प्राप्त करने संबंधी चुनौतियां शामिल हैं.

रज़िया (बदला हुआ नाम) बौद्धिक तौर पर विकलांग है और उसे बोलने में कठिनाई होती है.  वह 13 वर्ष की थी जब 2014 में उसके भाई के ट्यूटर ने उसका बलात्कार किया. रजिया अभी भी जनवरी 2016 में जिला कानूनी सेवा प्राधिकरण द्वारा स्वीकृत मुआवजा का इंतजार कर रही है (उत्तराखंड).

© 2017 ह्यूमन राइट्स वॉच के लिए अभिषेक कुमार मेहन
दिल्ली में, दिसंबर 2012 में ज्योति सिंह पांडे के जानलेवा सामूहिक बलात्कार के बाद, भारत सरकार ने यौन हिंसा सम्बन्धी कानूनों को मजबूत किया. आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2013 (2013 संशोधन) में विकलांग महिलाओं और लड़कियों के अधिकारों की रक्षा के लिए कई प्रावधान शामिल किए गए हैं और ये जांच-पड़ताल और न्यायिक प्रक्रियाओं में उनकी भागीदारी की सुनिश्चित करते हैं.

ह्यूमन राइट्स वॉच ने भारत के आठ राज्यों (छत्तीसगढ़, दिल्ली, कर्नाटक, महाराष्ट्र, ओडिशा, तमिलनाडु, उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल) में बलात्कार और सामूहिक बलात्कार के 17 मामलों की जांच की. इनमें आठ लड़कियां और नौ महिलाएं शामिल हैं जो शारीरिक, मस्तिष्कीय, बौद्धिक और मनोवैज्ञानिक विकलांगता सहित कई अन्य तरह की विकलांगता के साथ जी रही हैं. कुल मिलाकर 111 लोगों का साक्षात्कार किया गया, जिनमें यौन हिंसा उत्तरजीवी, परिवार के सदस्य, वकील, मानसिक आरोग्यशालाओं और आश्रय स्थलों के अधिकारी, पुलिस, सरकारी अधिकारी, विकलांगता अधिकार कार्यकर्ता और "विशेष शिक्षक" शामिल थे.

भारत में यौन उत्पीड़न उत्तरजीवियों के लिए न्याय और समर्थन सेवाओं सम्बन्धी बाधाओं पर नवंबर 2017 की एक रिपोर्ट में, ह्यूमन राइट्स वॉच ने पाया कि बलात्कार और अन्य यौन हिंसा उत्तरजीवी महिलाएं और लड़कियां अक्सर थानों और अस्पतालों में अपमानित होती हैं. पुलिस अक्सर उनकी शिकायत दर्ज करने के लिए तैयार नहीं होती, पीड़ितों और गवाहों को मामूली संरक्षण मिलता है और चिकित्सा पेशेवर अभी भी अपमानजनक "दो ऊँगली" परीक्षण करते हैं. न्याय और गरिमा पाने के रास्ते की ये बाधाएं अपर्याप्त स्वास्थ्य देखभाल, परामर्श और आपराधिक सुनवाइयों के दौरान पीड़ितों के लिए कानूनी सहायता से जुड़ी हुई हैं.

भारत में विकलांग महिलाओं और लड़कियों, जो यौन हिंसा संबंधी सबसे ज्यादा ज़ोखिमों   का सामना करती हैं,  के लिए चुनौतियां और भी बड़ी हैं. शारीरिक रूप से विकलांग महिलाओं के लिए हिंसक स्थितियों से बचना अधिक मुश्किल हो सकता है. बधिर महिलाएं मदद के लिए गुहार लगाने में सक्षम नहीं हो सकतीं या दुर्व्यवहार के बारे में आसानी से बता नहीं सकती हैं. बौद्धिक या मनोवैज्ञानिक रूप से विकलांग महिलाओं और लड़कियों को यह पता नहीं हो सकता कि बगैर सहमति के यौन सम्बन्ध अपराध हैं और ऐसा किये जाने पर मामला दर्ज किया जाना चाहिए. उनकी लैंगिकता और विकलांगता से जुड़े लांछन इन चुनौतियों को बढ़ा देते हैं.

पश्चिम बंगाल के एक गांव की बौद्धिक तौर पर विकलांग 19 वर्षीय महिला "कंचन" के साथ एक स्थानीय व्यक्ति द्वारा 2013 में कई बार बलात्कार किया गया. कंचन को पता नहीं था कि उसे बलात्कार की रिपोर्ट दर्ज करानी चाहिए, जिसका पता तब जाकर चला जब वह पांच महीने की गर्भवती हो गईं. और बौद्धिक विकलांगता के कारण उसके लिए अपने साथ जो कुछ भी हुआ था उसे पुलिस को समझाना मुश्किल हो गया.

ह्यूमन राइट्स वॉच ने पाया कि इन मामलों के लिए चंद पुलिस अधिकारियों को ही प्रशिक्षण या विशेषज्ञ सहायता प्राप्त है. उत्तरजीवियों द्वारा विकलांगता प्रमाणित करने में असमर्थ रहने की वजह से कुछ मामलों में पुलिस ने विकलांग महिलाओं और लड़कियों को 2013 के  संशोधनों में गारंटी की गई विशिष्ट सहायता से वंचित रखा. अन्य मामलों में पुलिस अपनी प्रथम सूचना रिपोर्ट में आवश्यक विवरण शामिल नहीं कर पाई. इसके अलावा, पुलिस ने उत्तरजीवियों या उनके परिवारों को शायद ही कभी मुफ़्त कानूनी सहायता या कानूनी सहायता सेवाओं के अधिकार के बारे में बताया.

भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली 2013 के संशोधनों को लागू करने, जैसे विकलांग उत्तरजीवियों के लिए सक्षम, मददगार वातावरण बनाने के लिए पुलिस सहायता और न्यायिक प्रशिक्षण प्रदान करने में काफी हद तक विफल रही है. कुछ राज्यों ने कुशल कार्यप्रणाली अपनाई है, लेकिन वे अपवाद हैं, सामान्य तौर पर ऐसा नहीं है.

पुलिस और न्यायिक प्रक्रिया के साथ अंतःक्रिया में सुधार के लिए, विकलांग महिलाओं और लड़कियों को उनकी विकलांगताओं के अनुरूप प्रक्रियात्मक और आयु के उपयुक्त सुविधाओं और अन्य सहायता की आवश्यकता हो सकती है. इसमें संकेत भाषा (साइन-लैंग्वेज) में बयान दर्ज करने की सुविधा, बयान दर्ज कराने में मदद के लिए किसी व्यक्ति ("विशेष शिक्षक") की उपस्थिति, सरल भाषा का उपयोग और ब्रेल लिपि में रिपोर्ट दर्ज करने का विकल्प शामिल हो सकता है.

"रज़िया" बौद्धिक तौर से विकलांग 13 वर्षीय लड़की है जो बोलने में भी कठिनाइयों का सामना करती हैं. उसे अपने भाई के 17 वर्षीय शिक्षक द्वारा अपने बलात्कार के बारे में बताने में परेशानी हुई. लतिका रॉय फाउंडेशन के एक सामाजिक कार्यकर्ता ने गुड़िया के उपयोग जैसे मौलिक तरीके खोजे जिसने रज़िया को स्पष्ट और सुसंगत तरीके से अपने उत्पीडन के अनुभव बताने में मदद की.

अल्प दृष्टि वाली महिला करुणा ने अपने परिवार को यह नहीं बताया  एक दृष्टिहीन आदमी ने उसके साथ बलात्कार किया. करुणा ने बताया, "उसने मुझे किसी को नहीं बताने की धमकी दी. मैंने किसी को नहीं बताया क्योंकि मैं डर गई थी." (ओडिशा).

© 2016 शांथा राव बर्रिगा/ह्यूमन राइट्स वॉच
भारतीय कानून और नीतियों के मुताबिक राज्य सरकारों को मुआवज़ा देना है, इनमें वे मामले भी शामिल हैं जिनमें अपराधी का पता नहीं लगाया जा सकता या उसकी पहचान नहीं की जा सकती. हालांकि, ह्यूमन राइट्स वॉच ने पाया कि बर्बर हिंसा, सदमा और आर्थिक कठिनाई सहित उन मामलों में भी विकलांग महिलाओं और लड़कियों को मुआवज़ा हासिल करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा जिनमें बलात्कार के बाद उत्तरजीवी ने बच्चे को जन्म दिया. ग्रामीण क्षेत्रों या हाशिये के समुदायों से आने वाली विकलांग महिलाओं और लड़कियों और उनके परिवारों के लिए मुआवज़ा विशेष रूप से महत्वपूर्ण है.

भारत के नेतृत्व ने यौन हिंसा पर बार-बार चिंता व्यक्त की है और कहा है कि वह सुधारों के लिए प्रतिबद्ध है. 2007 में  भारत ने विकलांग लोगों के अधिकारों पर कन्वेंशन की पुष्टि की. दिसंबर 2016 में, संसद ने विकलांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम को मंजूरी दी, जिसका उद्देश्य सभी विकलांगों को दुर्व्यवहार, हिंसा और शोषण से सुरक्षा प्रदानं करना है और इसमें उपयुक्त सरकारी अधिकारियों, कार्यकारी मैजिस्ट्रेट और पुलिस द्वारा उठाए जाने वाले विशिष्ट उपायों का स्पष्ट रूप से उल्लेख है.

गोयल ने कहा, "भारत ने विकलांग महिलाओं और लड़कियों को शामिल करने के लिए आपराधिक न्याय प्रणाली में सुधार के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं, लेकिन हमारा नया शोध कार्रवाई और क्रियान्वयन की आवश्यकता को दर्शाता है. सरकार को समायोजन और अन्य उपायों को सुनिश्चित करने के लिए तत्काल कार्रवाई करनी चाहिए ताकि विकलांग महिलाओं और लड़कियों को सचमुच में न्याय  मुहय्या किया जा सके."

आपराधिक कानून संशोधन, 2013 के मुख्य प्रावधान जो आपराधिक न्याय प्रक्रिया में विकलांग महिलाओं और लड़कियों की भागीदारी सुनिश्चित करते हैं:

• अपने घर की सुरक्षा में या अपनी पसंद के स्थान पर पुलिस के समक्ष अपना बयान दर्ज कराने का अधिकार;

• पुलिस को दिए गए अपने बयान की वीडियोग्राफी कराने का अधिकार;

• शिकायत दर्ज कराते वक़्त और सुनवाई के दौरान "विशेष शिक्षक" या दुभाषिया की सहायता प्राप्त करने का अधिकार; तथा

• सुनवाई, ज़िरह के दौरान वीडियोग्राफी किए गए अपने बयान को दोहराने से छूट

 

बलात्कार उत्तरजीवी और उनके परिवारों के उद्धरण

"पुलिस ने मुझसे बहुत भद्दे सवाल किए जैसे मैंने कैसा महसूस किया. मैंने उन्हें बताया कि मैं पूरी तरह से बेहोश थी, तो मुझे कैसे पता चलेगा? पुलिस ने ऐसी बातें भी कहीं, "वह पागल है, मैं क्यों उसकी बातों पर ध्यान दूं?"

- "सुस्मिता," 26, कोलकाता, पश्चिम बंगाल की मनोवैज्ञानिक विकलांग महिला, जिसने फरवरी 2014 में चार पुरुष पड़ोसियों द्वारा बेहोश करने और बलात्कार का मामला दर्ज कराया था.

"एक दिन, मेरी शिक्षक बरामदे में सिलाई मशीन पर कुछ काम खत्म कर रही थी और उन्होंने मुझे घर के अंदर इंतजार करने के लिए कहा. मैं जब अंदर अकेली थी तभी उनके भाई ने मेरे साथ जबरदस्ती की. मुझे नहीं पता था कि अगर कोई मेरा बलात्कार करता है, तो मैं पुलिस के पास जा सकती हूं."

- "नफीसा,” 19, सुनने और बोलने में कठिनाई का सामना करने वाली महिला, भुवनेश्वर, ओडिशा, जिसने सितंबर 2016 में बलात्कार का मामला दर्ज कराया था.

"हमने पुलिस को बताया कि वह मानसिक रूप से विकलांग और शारीरिक रूप से असक्षम हैं... आप उसकी विकलांगता देख सकते हैं लेकिन एफआईआर में अभी भी यह बात दर्ज नहीं की गई."

- "कनिका," “मेनका” की बहन. “मेनका,” 15, मानसिक और शारीरिक रूप से विकलांग लड़की, जिसने अक्टूबर 2015 में यह मामला दर्ज कराया था कि दिल्ली के पड़ोस में दो लोगों ने उसका बलात्कार किया.

सहयोगियों  के उद्धरण:

"निरक्षरता के उच्च स्तर के कारण, ज्यादातर विकलांग लोगों के पास आय का कोई स्रोत नहीं होता है और वे अपने परिवारों पर निर्भर होते हैं. इससे वे हिंसा के आसान शिकार बन जाते हैं, अक्सर उन लोगों द्वारा जिन पर वे सबसे अधिक निर्भर होते हैं. इस संदर्भ में, यह स्पष्ट है कि क्यों बहुत कम विकलांग महिलाएं यौन हिंसा की रिपोर्ट दर्ज कराती हैं."

- आशा हंस, उपाध्यक्ष, शांता मेमोरियल रिहैबिलिटेशन सेंटर

"ऐसे लोग जिनके सामने अपने हम उम्रों के मुकाबले यौन शोषण का शिकार होने का अधिक जोखिम है, आपराधिक न्याय प्रणाली द्वारा विकलांग महिलाओं को गंभीर रूप से वंचित कर दिया गया है. इस मुद्दे पर वकालत करनेवालों का ध्यान ज्यादा कठोर सज़ा पर रहा है, लेकिन इसका कोई मतलब नहीं रह जाता है अगर विकलांग महिलाएं कार्यवाही में भाग नहीं ले सकती हैं और अपराधियों को सज़ा सुनिश्चित नहीं कर सकती हैं."

- अम्बा सल्कर, कार्यक्रम निदेशक, इक्वल्स - सेंटर फॉर प्रमोशन ऑफ़ सोशल जस्टिस