(रांची) - ह्मूमैनराइट्स वॉच ने आज जारी एक रिपोर्ट में कहा है कि माओवादी विद्रोहियों और सरकारी बलों के बीच निरंतर जारी संघर्ष भारत में हाशिए पर रह रहे दसियों हज़ार बच्चों की शिक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है.

"स्कूली शिक्षा में विघ्नः भारत के बिहार और झारखंड राज्यों में स्कूलों पर नक्सली आक्रमण और पुलिस का कब्ज़ा" नामक 103 पृष्ठों की रिपोर्ट में विस्तार से बताया गया है कि कैसे भारत के कई भागों में लंबे समय से जारी सशस्त्र आंदोलन के अंतर्गत नक्सलवादियों के नाम से जाने जाने वाले माओवादी सरकारी स्कूलों को निशाना बना रहे हैं और उन्हें विस्फोट द्वारा उड़ा रहे हैं. इसके साथ ही, पुलिस एवं अर्धसैनिक बल नक्सल-विरोधी अभियानों के लिए स्कूलों पर लंबे समय तक कब्ज़ा कर के शिक्षा में व्यवधान डाल रहे हैं. यह रिपोर्ट बिहार तथा झारखंड के 22 स्कूलों में जा कर 130 से अधिक व्यक्तियों का इंटरव्यू कर तैयार की गई है जिनमें 48 बच्चे, अभिभावक, शिक्षाविद्, पुलिस एवं स्थानीय अधिकारी शामिल हैं.

ह्यूमैनराइट्स वॉच के बाल अधिकार विभाग में शोधकर्ता और इस रिपोर्ट के लेखक बीड शेपर्ड का कहना है, "माओवादी कहते हैं कि वे भारत के गरीबों के लिए लड़ रहे हैं, किंतु स्कूलों पर उनके आक्रमण बच्चों को उस शिक्षा से वंचित कर रहे हैं जिसकी उनको अत्यधिक ज़रूरत है. इसके साथ ही, स्कूलों पर लंबे समय तक पुलिस के कब्ज़े के कारण ख़तरे एवं सदमे के वातावरण में रह रहे इन बच्चों को कक्षाओं से दूर रहना पड़ता है और वे भय के साए में रहने पर विवश हो जाते हैं."

ह्यूमैनराइट्स वॉच को पता चला कि माओवादी स्कूलों पर आक्रमण करते हैं क्योंकि उन सुदूर क्षेत्रों में जहाँ चरमपंथी सक्रिय हैं, प्रायः वही एकमात्र सरकारी इमारतें होती हैं. बिना किसी सुरक्षा व्यवस्था के ये स्कूल नज़र में आने वाले सरल लक्ष्य होते हैं और इन पर हमला करने से मीडिया का ध्यान इस ओर जाता है तथा स्थानीय समुदायों में भय और आंतक का माहौल पैदा होता है. बमविस्फोट का निशाना बने स्कूलों की तुरंत मरम्मत कराने में सरकार की विफलता बच्चों की शिक्षा पर इन आक्रमणों के प्रतिकूल प्रभाव को और अधिक समय तक बढ़ा देती है.

पिछले महीने में और 8 दिसंबर तक, झारखंड के कम से कम 14 और बिहार के दो अन्य स्कूलों पर बमबारी हुई.

सरकारी सुरक्षा बल-पुलिस एवं अर्धसैनिक पुलिस दोनों ही- नक्सलवाद विरोधी अभियानों के लिए स्कूलों की इमारतों का अधिग्रहण कर लेते हैं जो कि कभी-कभी तो कुछ दिनों के लिए ही होता है लेकिन प्रायः कई महीने या कई वर्ष भी जारी रहता है. कभी-कभी सुरक्षा बल स्कूलों की इमारतों पर पूरी तरह कब्ज़ा करते हैं और कहीं आंशिक रूप से जबकि बचे हुए भाग में छात्र अपनी शिक्षा जारी रखते हैं.

नक्सलवादी आक्रमण एवं सुरक्षा बलों द्वारा स्कूलों पर कब्ज़े से छात्रों को अनावश्यक रूप से नुकसान उठाना पड़ता है और कभी-कभी वे या तो स्कूल छोड़ देते हैं अथवा उनकी पढ़ाई में विघ्न पड़ जाता है. स्कूल की इमारत के कुछ हिस्से पर सुरक्षा बलों के कब्ज़े से परेशानी का अनुभव कर चुकी अथवा इसकी आशंका से ग्रस्त लड़कियाँ विशेष रूप से स्कूल छोड़ती देखी गई हैं. स्कूल के अहाते में सुरक्षा बलों द्वारा संदिग्ध लोगों की पिटाई देख कर छात्रों में दहशत पैदा होती भी देखी गई है. प्रायः स्कूल पूरी तरह बंद हो जाते हैं और छात्र या तो पढ़ाई से पूर्णतः वंचित हो जाते हैं अथवा कहीँ और बाहर खुले मैदान में पढ़ने को बाध्य होते हैं या कई बार उन्हें कहीं दूर पढ़ाई करने भी जाना पड़ता है.

शेपर्ड का कहना है, "नक्सलवादी नेताओं को अपने लड़ाकों को निर्देश देना चाहिए कि वे स्कूलों पर हमले तुरंत बंद करें. सरकार को भी स्कूलों के सैन्य इस्तेमाल की अपनी प्रथा पर पुनर्विचार करना चाहिए  जिसके कारण छात्रों की शिक्षा प्रभावित होती है तथा नक्सलवादी इसका लाभ उठाते हैं."

शिक्षा का अधिकार भारतीय संविधान एवं कानूनों के अंतर्गत सुनिश्चित किया गया है तथा यह अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संधियों का एक अंग है जिन पर भारत ने भी हस्ताक्षर किए हैं.

शेपर्ड का कहना है, "भारत में अत्यधिक गरीबी में या हाशिए पर रह रहे बच्चों की शिक्षा तक पहुँच भारत के विकास का एक अत्यावश्यक अंग है. इन क्षेत्रों में जहाँ संघर्ष जारी है, बच्चे वर्षों से इस अधिकार से वंचित हैं."

 

बच्चे तथा माता-पिता अपनी आपबीती सुना रहे हैं:

"स्कूल बुरी तरह बर्बाद हो चुका है...पूरी इमारत नष्ट हो गई है, खिड़कियाँ टूट गई हैं और उड़ चुकी हैं, फ़र्श पर दरारें पड़ गई हैं तथा दीवारों और छत पर भी. दरवाज़ा तक टूट गया है. बाहर की दीवार जो बरामदे से जोड़ती है वह भी नष्ट हो गई है, सब कुछ खंडहर बन गया है."

-एक 16 वर्षीय छात्र झारखंड में जिसके स्कूल पर नक्सलवादियों ने 9 अप्रैल, 2009 को बमबारी की.

"कभी-कभी (सुरक्षा बल) अपराधियों को स्कूल लाते हैं और उनकी पिटाई करते हैं...जब वे उन्हें पीटते हैं तब मुझे बहुत बुरा लगता है."

-एक 16 वर्षीय छात्र बिहार में जिसके स्कूल पर, 12 जून, 2009 तक की सूचना के अनुसार, राज्य सहायक पुलिस ने आंशिक रूप से कब्ज़ा कर रखा था.

"जब तक पुलिस नहीं आई थी तब तक कोई डर नहीं था और हम स्कूल में हर तरह की मस्ती करने के लिए स्वतंत्र थे."

-एक 15 वर्षीय छात्र झारखंड में जिसके स्कूल पर, 30 मई, 2009 तक प्राप्त सूचना के अनुसार, भारतीय केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल ने आंशिक रूप से कब्ज़ा कर रखा था.

"(नक्सलवादियों ने) स्कूल उड़ा दिया है...क्योंकि इमारतें नष्ट हो गई हैं इसलिए कक्षाएँ भी नहीं लगती हैं. अतः मेरे बच्चे स्कूल नहीं जा रहे हैं. मैं अपने बच्चों को गाँव से बाहर पढ़ने के लिए भेजने में समर्थ नहीं हूँ. हम गरीब लोग हैं. हम जंगलों में रहते हैं. हम अपनी रोज़ी-रोटी चलाने के लिए खेतों में बुवाई करते हैं. स्कूल में 250 छात्र हैं और कक्षाएँ न लगने के कारण वे बिगड़ रहे हैं. (अब मेरे बच्चे) कुछ नहीं करते हैं. वे गाँव में खेलते हैं...मवेशी चराते हैं और ऐसे ही काम करते हैं...जो अपने बच्चों को गाँव से बाहर भेजने में समर्थ हैं वे उन्हें अन्य गाँवों के स्कूलों में पढ़ने के लिए भेजते हैं. किंतु हम जैसे गरीब लोग अपने बच्चों को गाँव से बाहर पढ़ने नहीं भेज सकते."

-पाँच बच्चों के एक पिता-जिनमें से तीन झारखंड के एक स्कूल में पढ़ रहे थे जिसे 29 नवंबर, 2008 को नक्सलवादियों ने बम से उड़ा दिया.