मई 2019 के चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) द्वारा बहुमत प्राप्त करने के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दूसरा कार्यकाल आरम्भ हुआ. मोदी सरकार ने सरकारी अधिकारियों और नीतियों की आलोचना के लिए मुखर मानवाधिकार रक्षकों और पत्रकारों को हैरान-परेशान करने और जब-तब उन पर मुकदमा चलाने की अपनी व्यापक कारगुजारियां जारी रखी हैं.

अगस्त में, सरकार ने जम्मू-कश्मीर की विशेष स्वायत्त स्थिति रद्द कर इसे दो केन्द्रशासित प्रदेशों में बांट दिया. इसकी घोषणा से पहले सरकार ने राज्य में अतिरिक्त सैन्य बलों को तैनात किया, इंटरनेट एवं फोन सेवा बंद कर दी और हजारों लोगों को निरोधात्मक हिरासत में लिया. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इन कार्रवाइयों की व्यापक निंदा हुई.

धार्मिक अल्पसंख्यकों और अन्य कमजोर समुदायों पर भीड़ के हमलों, जो अक्सर भाजपा समर्थकों के नेतृत्व में होते हैं, को रोकने और उसकी जांच करने के सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को ठीक से लागू करने में सरकार विफल रही.

पूर्वोत्तर राज्य असम में, नागरिकता सत्यापन परियोजना के जरिए लगभग बीस लाख लोगों को नागरिकता सूची से बाहर कर दिया गया, जिनमें से अधिकांश नृजातीय बंगाली और कई मुस्लिम हैं. इनके राज्यविहीन होने का खतरा है.

जम्मू और कश्मीर

14 फरवरी को, पुलवामा जिले में सुरक्षा बलों के काफिले पर आत्मघाती हमला में 40 से अधिक भारतीय सैनिक मारे गए. पाकिस्तान स्थित उग्रवादी समूह जैश-ए-मोहम्मद ने इस हमले की जिम्मेदारी ली. इसने भारत और पाकिस्तान के बीच सैन्य प्रसार को बढ़ावा दिया. हमले के बाद, भारत के अन्य हिस्सों में भाजपा समर्थको ने कश्मीरी छात्रों और व्यापारियों को हैरान-परेशान किया गया या उनके साथ मारपीट की गई, यहां तक कि उन्हें किराये के मकानों और छात्रावासों से जबरन बाहर निकाल दिया गया.

5 अगस्त को, राज्य की विशेष स्वायत्त स्थिति रद्द करने से पहले सरकार ने सुरक्षा प्रतिबंध लगा दिए और अतिरिक्त सैन्य बलों की तैनाती कर दी. पूर्व मुख्यमंत्रियों, राजनीतिक नेताओं, विपक्षी कार्यकर्ताओं, वकीलों और पत्रकारों सहित हजारों लोगों को बिना किसी आरोप के हिरासत में ले लिया गया. इंटरनेट एवं फोन सेवा बंद कर दी गई. सरकार ने कहा कि ये उपाय जान-माल के नुकसान को रोकने के लिए हैं, लेकिन तब भी सुरक्षा बलों द्वारा मारपीट और यातना के विश्वसनीय और गंभीर आरोप सामने आए हैं.

नवंबर तक, कुछ प्रतिबंध हटा दिए जाने के बावजूद, सैकड़ों लोग हिरासत में थे और मोबाइल फोन सेवाओं तथा इंटरनेट तक पहुंच सीमित थी. सरकार ने विपक्षी नेताओं, विदेशी राजनयिकों और अंतर्राष्ट्रीय पत्रकारों को कश्मीर के स्वतंत्र दौरे से रोक दिया.

कई बार हिंसक प्रदर्शनकारियों ने उन लोगों को धमकी दी जो स्थिति सामान्य होने के सरकार के दावों के विरोध में बुलाए गए बंद में शामिल नहीं हुए. उग्रवादी समूहों के हमलों में कम-से-कम आठ लोग मारे गए.

जुलाई में, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय ने 2018 की अपनी कश्मीर रिपोर्ट का अपडेट जारी किया, जिसमें कश्मीर के भारतीय और पाकिस्तानी दोनों हिस्सों में राज्य सुरक्षा बलों और सशस्त्र समूहों के उत्पीड़न पर गंभीर चिंता जताई गई. इसमें कहा गया कि किसी भी देश ने पूर्व में जारी रिपोर्ट में उठाई गई चिंताओं को दूर करने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया. भारत सरकार ने इस रिपोर्ट को “झूठी और प्रेरित कहानी,” जो कि “सीमा पार आतंकवाद के मूल मुद्दे” की अनदेखी करती है, बताकर खारिज कर दिया.

सुरक्षा बलों को अभयदान

संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों की सिफारिशों सहित अनगिनत स्वतंत्र सिफारिशों के बावजूद सरकार ने सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) अधिनियम की न तो समीक्षा की है और न ही इसे रद्द किया है. यह अधिनियम सैनिकों को मानवाधिकार के गंभीर उल्लंघनों के अभियोजन से पूरी तरह अभयदान प्रदान करता है. यह कानून जम्मू-कश्मीर और उत्तर-पूर्व भारत के कई राज्यों में लागू है.

उत्तर प्रदेश में पुलिस द्वारा गैर-न्यायिक हत्याएं बेख़ौफ़ जारी हैं. मार्च 2017 में उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा सरकार के आने के बाद कम-से-कम 77 लोग मारे गए हैं और 1,100 से ज्यादा घायल हुए हैं. जनवरी में, संयुक्त राष्ट्र के चार अधिकार विशेषज्ञों ने इन हत्याओं पर चिंता व्यक्त की. साथ ही, उन्होंने इन मामलों में न्याय की मांग करने वालों को पुलिस द्वारा धमकी पर भी चिंता जताई. यह लिखे जाने तक न्यायालय की निगरानी में स्वतंत्र जांच की मांग करने वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट में लंबित थी.

इन हत्याओं ने पुलिस उत्पीड़न के लिए जवाबदेही के सतत अभाव और पुलिस सुधारों को लागू करने में विफलता उजागर की है.

दलित, आदिवासी समूह और धार्मिक अल्पसंख्यक

गोमांस के लिए गायों का व्यापार या हत्या की अफवाहों के बीच सत्तारूढ़ भाजपा से सम्बद्ध उग्रपंथी हिन्दू समूहों द्वारा अल्पसंख्यकों, विशेषकर मुसलमानों के खिलाफ भीड़-हिंसा साल भर जारी रही. मई 2015 से अब तक ऐसे हमलों में 50 लोग मारे गए हैं और 250 से अधिक घायल हुए हैं. मुसलमानों को पीटा भी गया और उन्हें हिंदू नारे लगाने के लिए मजबूर किया गया है. पुलिस अपराधों की सही तरीके से जांच करने में विफल रही है. उन्होंने जांच को बाधित किया है, प्रक्रियाओं की अनदेखी की है और गवाहों को परेशान करने तथा डराने के लिए आपराधिक मामले दर्ज किए हैं.

दलितों ने हिंसक हमलों और भेदभाव का सामना किया. सितंबर में, सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को पूरे भारत के विश्वविद्यालयों में जाति-आधारित भेदभाव की जांच हेतु नोटिस जारी की. यह नोटिस दो छात्रों - एक दलित और एक आदिवासी, जिन्होंने भेदभाव के कारण कथित रूप से आत्महत्या कर ली थी - की मांओं की याचिका के बाद जारी की गई.

फरवरी में सुप्रीम कोर्ट का उन सभी लोगों को बेदखल करने का फैसला आया जिनके दावे वन अधिकार कानून के तहत खारिज कर दिए गए थे. इस फैसले से लगभग 20 लाख आदिवासी समुदाय के लोगों तथा वनवासियों पर जबरन विस्थापन और जीविका छिन जाने का खतरा बना हुआ है. दावा प्रक्रिया में मौजूद खामियों पर व्यक्त की जा रही चिंताओं के बीच, अदालत ने बेदखली पर अस्थायी रोक लगा दी है. जुलाई में, संयुक्त राष्ट्र के तीन मानवाधिकार विशेषज्ञों ने सरकार से आग्रह किया कि दावों की पारदर्शी और स्वतंत्र समीक्षा की जाए और सभी विकल्पों के समाप्त होने और समाधान व मुआवजा सुनिश्चित करने के बाद ही बेदखली की जाए.

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और निजता

सरकार ने शांतिपूर्ण असहमति को दबाने के लिए राजद्रोह और आपराधिक मानहानि कानूनों का इस्तेमाल किया. अक्टूबर 2019 में, बिहार पुलिस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक खुला पत्र लिखने के लिए फिल्म की जानी-मानी हस्तियों सहित 49 लोगों के खिलाफ राजद्रोह का मुक़दमा दायर किया. इस पत्र में अल्पसंख्यक समुदायों को निशाना बनाने वाले घृणा अपराधों और भीड़-हिंसा पर चिंता व्यक्त की गई थी. व्यापक आलोचना के बाद, अधिकारियों ने कुछ दिनों के भीतर ही मामले को बंद कर दिया.

पत्रकारों को उनकी रिपोर्टिंग या सोशल मीडिया पर आलोचनात्मक टिप्पणियों के लिए परेशान किया गया और यहां तक कि हिरासत में लिया गया है, और उन्हें खुद पर सेंसर लगाने के बढ़ते दबाव का सामना करना पड़ा है. सितंबर में, उत्तर प्रदेश में पुलिस ने सरकारी स्कूलों में निःशुल्क भोजन की योजना में व्याप्त कुप्रबंधन को उजागर करने के लिए एक पत्रकार के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किया. जून में, पुलिस ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को बदनाम करने का आरोप लगाते हुए तीन पत्रकारों को गिरफ्तार कर लिया.

भारत इंटरनेट पर सबसे ज्यादा बार प्रतिबंध के मामले में पूरी दुनिया में सबसे आगे है. राज्य सरकारों ने या तो हिंसा और सामाजिक अशांति को रोकने या फिर कानून और व्यवस्था की जारी समस्या से निपटने के लिए व्यापक प्रतिबंधों का सहारा लिया है. सॉफ्टवेयर फ्रीडम लॉ सेंटर के मुताबिक, नवंबर तक भारत में कुल 85 बार ऐसे प्रतिबंध लगाए गए जिनमें 55 बार अकेले जम्मू और कश्मीर में किया गया.

जुलाई में, संसद ने बायोमेट्रिक पहचान परियोजना, आधार अधिनियम में संशोधन किया जिसने निजी क्षेत्रों द्वारा बायोमेट्रिक डेटा संग्रह और उपयोग का रास्ता साफ़ कर दिया. संशोधनों ने निजता और डेटा सुरक्षा के प्रति चिंता पैदा की है. ये संशोधन सितंबर 2018 के उच्चतम न्यायालय के उस फैसले के बावजूद किए गए जिसमें सरकारी सुविधाओं का उपयोग और कर अदायगी को छोड़कर अन्य उद्देश्यों के लिए आधार का इस्तेमाल प्रतिबंधित किया गया है.

दिसंबर 2018 में, सरकार ने नई सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती संस्थानों के लिए दिशानिर्देश) नियमावली प्रस्तावित की. यह नियमावली उपयोगकर्ताओं की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और निजता के अधिकारों को बहुत ही खोखला करेगी.

अक्टूबर में, फेसबुक के स्वामित्व वाली सोशल मीडिया कंपनी व्हाट्सएप ने पुष्टि की है कि भारत में उसके 121 उपयोगकर्ताओं को इजरायली कंपनी एनएसओ के स्वामित्व वाले निगरानी सॉफ्टवेयर द्वारा निशाना बनाया गया. इनमें से कम-से-कम 22 लोग मानवाधिकार कार्यकर्ता, पत्रकार, शिक्षाविद और नागरिक अधिकार वकील हैं. सरकार ने सॉफ्टवेयर खरीदने से इनकार किया है.

नागरिक समाज और शांतिपूर्ण सभा करने का अधिकार

सरकार ने मुखर अधिकार समूहों को परेशान करने और विदेशी धन प्राप्त करने की उनकी क्षमता को सीमित करने के लिए विदेशी योगदान (विनियमन) अधिनियम (एफसीआरए) का इस्तेमाल जारी रखा है. जून में, सरकार ने लॉएर्स कलेक्टिव के खिलाफ एक आपराधिक मामला दायर किया. यह संगठन हाशिए के समूहों के अधिकारों की वकालत और उन्हें कानूनी सहायता प्रदान करता है तथा लेस्बियन, गे, बायसेक्सुअल,  ट्रांससेक्सुअल, और क्वीर (एलजीबीटीक्यू) लोगों के खिलाफ भेदभाव समाप्त करने के लिए अभियान चलाता है. नवंबर में, सरकार ने जांच में इस संगठन के सहयोग के बावजूद हिरासत में पूछताछ हेतु इसके संस्थापकों की गिरफ्तारी के लिए अदालत से अनुमति मांगी.

2018 में आतंकवाद निरोधी कानून, गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के अंतर्गत गिरफ्तार नौ प्रमुख मानवाधिकार कार्यकर्ता आज भी जेल में हैं. इन पर एक प्रतिबंधित माओवादी संगठन के सदस्य होने और हिंसक विरोध प्रदर्शन उकसाने का आरोप है. इसी मामले में, सितंबर में अधिकारियों ने विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों और जातिगत भेदभाव के खिलाफ मुखर रहे, दिल्ली विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर के घर पर छापा मारा.

अगस्त में, केंद्र सरकार ने यूएपीए में संशोधन किया. यह संशोधन सरकार को किसी भी व्यक्ति को आतंकवादी घोषित करने की शक्ति प्रदान करता है. यह संशोधन मानवाधिकार समूहों द्वारा इन चिंताओं को व्यक्त के बावजूद किया गया कि कैसे यह कानून नियत प्रक्रिया संबधी अधिकारों का पहले से ही उल्लंघन करता रहा है और इसका इस्तेमाल धार्मिक अल्पसंख्यकों, सरकार के आलोचकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को निशाना बनाने के लिए किया जाता रहा है. संशोधनों को असंवैधानिक बताते हुए इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है और रिपोर्ट लिखे जाने तक यह मामला लंबित था.

शरणार्थी और नागरिकता अधिकार

अगस्त में, असम सरकार ने राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर प्रकाशित किया. इसका उद्देश्य है बांग्लादेश से नृजातीय बंगालियों के अनियमित प्रवासन के मुद्दे पर बार-बार विरोध प्रदर्शनों और हिंसा से उत्पन्न स्थिति में भारतीय नागरिकों और वैध निवासियों की पहचान करना. लगभग बीस लाख लोगों को इस नागरिकता सूची से बाहर कर दिया गया है, जिनमें कई मुस्लिम हैं. सूची से बाहर रह गए लोगों में बहुत ऐसे हैं जो सालों से भारत में रह रहे हैं, कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने पूरी जिंदगी यही गुजारी है. ऐसे गंभीर आरोप सामने आए हैं कि सत्यापन प्रक्रिया मनमानी और भेदभावपूर्ण थी, हालांकि सूची से बाहर कर दिए लोगों के पास न्यायिक अपील करने का अधिकार है.

असम सरकार ने कहा है कि अपील के बाद नागरिकता से वंचित लोगों के लिए वह दस नज़रबंदी शिविर बनाएगी. सितंबर में, भारत के गृह मंत्री ने घोषणा की कि राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर को पूरे देश में लागू किया जाएगा और सरकार मुसलमानों को छोड़कर पड़ोसी देशों के सभी अनियमित प्रवासियों को शामिल करने के लिए नागरिकता कानूनों में संशोधन करेगी.

अक्टूबर 2018 में सात रोहिंग्या मुसलमानों को म्यांमार निर्वासित करने के बाद, सरकार ने 2019 में आठ रोहिंग्या मुसलमानों को निर्वासित कर दिया - जनवरी में पांच सदस्यों के एक परिवार को और मार्च में एक पिता तथा उसके दो बच्चों को निर्वासित किया गया. अप्रैल में संयुक्त राष्ट्र के पांच मानवाधिकार विशेषज्ञों ने इसे अंतर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताते हुए निर्वासन की निंदा की. उन्होंने भारत में कुछ रोहिंग्याओं के अनिश्चित काल तक के लिए हिरासत पर भी चिंता जताई.

महिला अधिकार

इस साल सुर्ख़ियों में आने वाले बलात्कार के मामलों ने, जिनमें एक भाजपा नेता से जुड़ा मामला भी शामिल है, इस ओर ध्यान खींचा कि कैसे महिलाएं न्याय के रास्ते में पुलिस द्वारा मामला दर्ज करने से इंकार, पीड़िता पर दोषारोपण, धमकी तथा हिंसा और गवाह संरक्षण के अभाव जैसी गंभीर बाधाओं का सामना करती हैं. सोशल मीडिया पर और साथ में व्यापक स्तर पर आलोचना के बाद सितंबर में आरोपी नेता को गिरफ्तार किया गया.

अप्रैल में, सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ यौन उत्पीड़न की एक शिकायत ने भी इसी तरह की चुनौतियों को पेश किया. रसूखदार पुरुषों के खिलाफ शिकायतें दर्ज करने वाली अन्य महिलाएं भी आपराधिक मानहानि मुकदमों की चपेट में आ गईं.

बाल अधिकार

अगस्त में, भारत की संसद ने बाल यौन अपराध संरक्षण अधिनियम 2012 में संशोधन कर 18 साल से कम उम्र के किसी भी व्यक्ति के लिंग प्रविष्टि सम्बन्धी संगीन यौन उत्पीड़न के लिए मौत की सजा का प्रावधान किया और अन्य यौन अपराधों के लिए जुर्माना बढ़ा दिया. ऐसा बाल अधिकार समूहों द्वारा उठाई गई इन चिंताओं के बावजूद किया गया कि इससे पुलिस शिकायतों में कमी आ सकती है क्योंकि दर्ज होने वाले लगभग 95 प्रतिशत मामलों में अपराधी पीड़ित का परिचित, रोबदार हैसियत वाला  या परिवार का सदस्य होता है.

नवंबर में, बाल अधिकार कार्यकर्ताओं की एक याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू और कश्मीर उच्च न्यायालय की किशोर न्याय समिति से अगस्त माह से जारी प्रतिबंधों के दौरान बच्चों की कथित हिरासत और अन्य उत्पीड़नों पर विस्तृत रिपोर्ट मांगी. समिति ने इससे पहले पुलिस द्वारा हिरासत में लिए गए 144 बच्चों की एक सूची सौंपी थी, जिसमें सबसे कम उम्र का बच्चा 9 साल का था. पुलिस ने बताया कि ज्यादातर बच्चों को हिंसक विरोध प्रदर्शनों में भाग नहीं लेने की चेतावनी के बाद छोड़ा जा चुका है.

विकलांग लोगों के अधिकार

विकलांग महिलाओं और लड़कियों के उत्पीड़न का अभी भी बड़ा जोखिम बना हुआ है और अपने अधिकारों की रक्षा के कई कानूनी प्रावधानों के बावजूद उन्हें न्याय प्रणाली में गंभीर बाधाओं का सामना करना पड़ता है.

मनोसामाजिक या बौद्धिक रूप से हजारों विकलांग लोग ऐसे आवासीय संस्थानों में दिन काट रहे हैं, जहां उन्हें भीड़भाड़, स्वच्छता की कमी और शारीरिक, मौखिक तथा यहां तक कि यौन हिंसा का सामना करना पड़ता है. मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति से जुड़े लांछन और समुदाय आधारित पर्याप्त सहायता सेवाओं की कमी के कारण मनोसामाजिक रूप से कुछ विकलांग लोगों को बेड़ियों से बांधकर या छोटे कमरों में बंद करके भी रखा जाता है.

यौन उन्मुखता और लैंगिक पहचान

संसद ने ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) विधेयक पारित कर दिया. अधिकार समूहों ने प्रस्तावित कानून की आलोचना की है कि यह ट्रांसजेंडर लोगों को पूर्ण सुरक्षा और मान्यता प्रदान करने में विफल है. यह विधेयक ट्रांसजेंडर व्यक्ति के स्व-पहचान करने के अधिकार पर अस्पष्ट है, जिसे भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 2014 में एक ऐतिहासिक फैसले में मान्यता दी थी. इसके प्रावधान कानूनी लिंग मान्यता के अंतरराष्ट्रीय मानकों के भी विपरीत हैं.

प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय किरदार

अमेरिकी कांग्रेस ने मुख्य रूप से कश्मीर पर केंद्रित दो सुनवाई आयोजित की. कई सांसदों ने कश्मीर में राजनीतिक नज़रबंदी और संचार प्रतिबंधों सहित भारत की अन्य कार्रवाइयों की आलोचना की, और असम में नागरिकता सत्यापन प्रक्रिया समेत अन्य दुर्व्यवहारों पर चिंता व्यक्त की.

अगस्त में, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने दशकों बाद पहली बार जम्मू और कश्मीर पर बंद कमरे में एक बैठक की. पाकिस्तान के आग्रह पर चर्चा की मांग करने वाले चीन ने कहा कि सदस्य मानवाधिकारों और भारत तथा पाकिस्तान के बीच बढ़ते तनाव को लेकर चिंतित हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने मध्यस्थता और विवाद सुलझाने की पेशकश की.

सितंबर में, यूरोपीय संघ ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में जम्मू और कश्मीर के हालात का मुद्दा उठाया, और भारत से बाकी प्रतिबंधों को समाप्त करने और प्रभावित आबादी के अधिकारों तथा मौलिक स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए आग्रह किया. यूरोपीय संसद ने भी कश्मीर पर एक विशेष बहस की, जिसमें भारत और पाकिस्तान दोनों से अपने अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार दायित्वों का सम्मान करने का आग्रह किया गया.

पूरे साल, संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूतों ने भारत में गैर-न्यायिक हत्याओं, असम में लाखों लोगों की संभावित राज्यविहीनता, आदिवासी समुदायों और वनवासियों के संभावित बेदख़ली और कश्मीर में संचार प्रतिबंधों सहित अनेक मुद्दों पर चिंता जताते हुए कई वक्तव्य जारी किए. सितंबर में, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त मिशेल बाचेलेट ने जम्मू और कश्मीर में अधिकारों के उल्लंघन पर चिंता व्यक्त की.

विदेश नीति

पूरे साल पाकिस्तान के साथ संबंध बिगड़ते रहे. फरवरी में सुरक्षा बलों के काफिले पर कश्मीर में हुए हमले के बाद जवाबी हवाई हमले हुए. अगस्त में, भारत द्वारा जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा रद्द करने के फैसले के बाद, पाकिस्तान ने भारत के साथ अपने राजनयिक संबंधों का दर्जा गिरा दिया और भारतीय उच्चायुक्त को निष्कासित कर दिया. सितंबर में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के सत्र में चीन तथा इस्लामिक सहयोग संगठन के कई सदस्यों की मदद से पाकिस्तान ने भी कश्मीर में अधिकारों के उल्लंघन पर एक बयान जारी किया. संबंधों में लगातार गिरावट के बावजूद, नवंबर में,दोनों देशों ने पाकिस्तान स्थित सिख तीर्थस्थल के दर्शन हेतु भारतीय तीर्थयात्रियों के लिए वीजा मुक्त यात्रा की शुरुआत की.

भारत ने बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका और अफगानिस्तान सहित अन्य पड़ोसियों के साथ द्विपक्षीय वार्ता के दौरान सार्वजनिक रूप से अधिकारों की सुरक्षा का मुद्दा नहीं उठाया. अगस्त में, भारत के विदेश मंत्री ने बांग्लादेश की अपनी यात्रा के दौरान बांग्लादेश में विस्थापित रोहिंग्या और म्यांमार के रखाइन राज्य के विकास में और अधिक सहायता प्रदान करने की इच्छा जाहिर की. असम में नागरिकता सत्यापन परियोजना द्वारा बाहर किए गए लगभग 20 लाख लोगों के निर्वासन संबंधी चिंताओं पर विदेश मंत्री ने बांग्लादेश को आश्वस्त किया कि यह भारत का आंतरिक मामला है.

अगस्त में संयुक्त अरब अमीरात की यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को क्राउन प्रिंस ने देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से सम्मानित किया जो कि संयुक्त अरब अमीरात के साथ भारत के प्रगाढ़ होते रिश्ते का संकेत है. मार्च 2018 में दुबई के शासक की 32 वर्षीय बेटी को कथित रूप से बीच मार्ग में रोकने और निर्वासित करने के लिए भारत को संयुक्त राष्ट्र के एक निकाय और अंतर्राष्ट्रीय अधिकार समूहों के सवालों का सामना करना पड़ा. जबकि शासक की बेटी के मुताबिक वह अपने परिवार द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों से बच कर भागने की कोशिश कर रही थी.

जुलाई में, एलजीबीटी व्यक्तियों को हिंसा और भेदभाव से सुरक्षा देने पर एक स्वतंत्र विशेषज्ञ के नवीकरण सहित अन्य मुद्दों पर भारत ने अपनी पुरानी स्थिति बनाए रखी और संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में मतदान से गैरहाजिर रहा.