भारत सरकार के जम्मू और कश्मीर राज्य की विशेष संवैधानिक स्थिति को रद्द करने के निर्णय के बाद, श्रीनगर में भारतीय अर्धसैनिक बल के जवान, 5 अगस्त, 2019.

© 2019 मुज़म्मिल मट्टू/नूर फोटो वाया गेटी इमेज

(न्यूयॉर्क) – ह्यूमन राइट्स वॉच ने आज अपनी वर्ल्ड रिपोर्ट 2020 में कहा कि अगस्त 2019 में जम्मू-कश्मीर में भारत सरकार की बड़े पैमाने पर कार्रवाई ने कश्मीरियों के समक्ष काफी दुश्वारियां खड़ी की हैं और उनके अधिकारों का उल्लघंन किया है. भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार ने राज्य का विशेष संवैधानिक दर्जा रद्द कर इसे दो अलग-अलग केंद्र शासित प्रदेशों में बांट दिया है. 

भारत सरकार धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा करने में भी विफल रही. उसने शांतिपूर्ण असहमति को दबाने के लिए राजद्रोह और उग्रवाद निरोधी कठोर कानूनों का इस्तेमाल किया और सरकार के कार्य और नीतियों की आलोचना करने वाले गैर-सरकारी संगठनों को बदनाम करने और उनकी आवाज़ दबाने के लिए विदेशी अनुदान विनिमयन और अन्य कानूनों का इस्तेमाल किया.

ह्यूमन राइट्स वॉच की दक्षिण एशिया निदेशक मीनाक्षी गांगुली ने कहा, “भारत सरकार ने कश्मीर को पूरी तरह प्रतिबंधित करने की कोशिश की है. वह वहां हुए नुकसान की पूरी तस्वीर छिपा रही है. अल्पसंख्यकों पर बढ़ते हमलों को रोकने के बजाय, उसने 2019 में आलोचकों की आवाज़ दबाने के प्रयासों को तेज कर दिया.”

ह्यूमन राइट्स वॉच ने 652 पन्नों की विश्व रिपोर्ट 2020, जो कि इसका 30वां संस्करण है, में लगभग 100 देशों में मानवाधिकारों की स्थिति समीक्षा की है. अपने परिचयात्मक आलेख में, कार्यकारी निदेशक केनेथ रोथ ने कहा है कि चीन की सरकार, जो सत्ता में बने रहने के लिए दमनात्मक नीतियों पर निर्भर रहती है, दशकों बाद वैश्विक मानवाधिकार पर सबसे तीखा हमला कर रही है. वह कहते हैं कि जहाँ बीजिंग की कार्रवाई दुनिया भर के निरंकुश लोकलुभावनवादी शासकों को शह दे रही है और वहीँ उनका समर्थन भी हासिल कर रही है, वहीं चीन की सरकार अन्य सरकारों को आलोचना से रोकने के लिए अपनी आर्थिक ताकत का इस्तेमाल कर रही है. यह बेहद जरुरी है कि इस हमले का विरोध किया जाए, जो मानवाधिकारों पर कई दशकों में हुई प्रगति और हमारे भविष्य के लिए खतरा है.

जम्मू और कश्मीर में अपनी कार्रवाई से पहले, सरकार ने राज्य में अतिरिक्त सैनिकों की तैनाती की, इंटरनेट और फोन बंद कर दिए और मनमाने ढंग से हजारों कश्मीरियों को हिरासत में ले लिया, जिनमें राजनीतिक नेता, कार्यकर्ता, पत्रकार, वकील और बच्चों सहित संभावित प्रदर्शनकारी शामिल थे. विरोध प्रदर्शनों को रोकने के लिए सैकड़ों लोगों को बिना किसी आरोप के हिरासत में लिया गया या घरों में नज़रबंद कर दिया गया.

धार्मिक अल्पसंख्यकों और अन्य कमजोर समुदायों के खिलाफ भीड़-हिंसा की घटनाओं, जिनका नेतृत्व अक्सर भाजपा समर्थकों द्वारा किया जाता है, को रोकने और उनकी जांच करने के सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को ठीक से लागू करने में सरकार विफल रही है. गोमांस के लिए गायों का व्यापार या हत्या की अफवाहों के बीच उग्रपंथी हिन्दू समूहों की हिंसा में 50 लोग मारे गए और 250 से अधिक घायल हुए हैं. मुसलमानों को पीटा भी गया और उन्हें हिंदू नारे लगाने के लिए मजबूर किया गया है. पुलिस अपराधों की सही तरीके से जांच करने में विफल रही है, उन्होंने जांच को बाधित किया है, प्रक्रियाओं की अनदेखी की है और गवाहों को परेशान करने तथा डराने के लिए आपराधिक मामले दर्ज किए हैं.

फरवरी में सुप्रीम कोर्ट का उन लोगों को बेदखल करने का फैसला आया जिनके दावे वन अधिकार कानून के तहत खारिज कर दिए गए थे. इस फैसले से लगभग 20 लाख आदिवासी समुदाय के लोगों तथा वनवासियों पर जबरन विस्थापन और रोजी-रोटी के छीन जाने का खतरा बना हुआ है.

उत्तरपूर्वी राज्य असम में सरकार ने राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर प्रकाशित किया. इसका उद्देश्य है बांग्लादेश से नृजातीय बंगालियों के गैर कानूनी प्रवासन के मुद्दे पर बार-बार विरोध प्रदर्शनों और हिंसा से उत्पन्न स्थिति में भारतीय नागरिकों और वैध निवासियों की पहचान करना. लगभग बीस लाख लोग इस नागरिकता सूची से बाहर हैं, जिनमें अनेक मुस्लिम हैं. सूची से बाहर रह गए लोगों में कई तो ऐसे हैं जो वर्षों से भारत में रह रहे हैं या फिर अपनी पूरी जिंदगी  यहीं गुजारी है. ऐसे गंभीर आरोप लगे हैं कि सत्यापन प्रक्रिया मनमानी और भेदभावपूर्ण थी. हालांकि लोगों को अपील करने का अधिकार है, सरकार अपील के बाद नागरिकता से वंचित लोगों के लिए नज़रबंदी शिविर बनाने की योजना पर काम कर रही है.

सरकार ने यह भी कहा है कि नागरिकता सत्यापन प्रक्रिया पूरे देश में लागू की जाएगी और पड़ोसी देशों के सभी अनियमित प्रवासियों को शामिल करने के लिए नागरिकता कानूनों में संशोधन किया जाएगा, लेकिन मुसलमानों को इस सूची से बाहर रखा जाएगा.

कश्मीर में भारत सरकार की कार्रवाइयों से कश्मीरियों की रोजी-रोटी और शिक्षा-दीक्षा का नुकसान हुआ है. अमेरिकी कांग्रेस, यूरोपीय संसद और संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद सहित कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सरकार की दमनात्मक कार्रवाइयों की आलोचना हुई. पूरे साल, संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों ने भारत में गैर-न्यायिक हत्याओं, असम में लाखों लोगों की संभावित राज्यविहीनता, आदिवासी समुदायों और वनवासियों की संभावित बेदख़ली और कश्मीर में संचार प्रतिबंधों सहित कई मुद्दों पर चिंता व्यक्त की.