भारत नियंत्रित कश्मीर के श्रीनगर में सुरक्षा प्रतिबंधों के दौरान कंटीली तारों से सड़क अवरुद्ध  करते भारतीय अर्धसैनिक बल के जवान. 18 अगस्त, 2019.

 

© 2019 एपी फोटो/डार यासीन
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने दशकों बाद पहली बार,16 अगस्त को जम्मू और कश्मीर पर बंद कमरे में एक बैठक की. भारतीय संसद में अनुच्छेद 370 के तहत राज्य के प्रदत्त विशेष स्वायत्त स्थिति रद्द करने और उसे दो अलग-अलग केंद्र शासित प्रदेशों में बांटने के पक्ष में मतदान करने के दो सप्ताह बाद यह बैठक आयोजित की गई.
 
पाकिस्तान के आग्रह पर चर्चा की मांग करने वाले चीन ने कहा कि सदस्य मानवाधिकारों और भारत तथा पाकिस्तान के बीच बढ़ते तनाव को लेकर चिंतित हैं. पाकिस्तान ने घोषणा की कि कश्मीर पर “समूची दुनिया में चर्चा हो रही है.”
 
दूसरों पर अंगुली उठाने की एक बहुत ही जानी-पहचानी प्रवृति रही है. पाकिस्तान ने राजनीतिक विपक्ष के नेताओं को सलाखों के पीछे बंद कर दिया है, अभिव्यक्ति पर कड़ी पाबंदी लगा दी है और कश्मीरियों के अधिकारों का दृढ़ता से बचाव करते हुए वह शिनजियांग के मुसलमानों के लिए आवाज़ उठाने में विफल रहा है. चीन ने हांगकांग में बड़े पैमाने पर हो रहे लोकतंत्र-समर्थक प्रदर्शनों की निंदा की है और कहा है कि प्रदर्शनकारियों की कार्रवाइयां “आतंकवाद के लक्षण” प्रदर्शित कर रही हैं. चीन का कहना है कि इसे “विदेशी ताकतों” द्वारा उकसाया जा रहा है. इस तरह के बयान भारत में बिल्कुल सुपरिचित हैं, जहां आलोचना करने या मानवाधिकार के लिए आवाज़ उठाने वालों को सरकार समर्थक मीडिया और ट्रोल द्वारा “राष्ट्र-विरोधी” या “पाकिस्तान परस्त” के रूप में निशाना बनाया जाता है.
 
संयुक्त राष्ट्र की बैठक के बाद भारत ने कहा कि उसके फैसले “आंतरिक मामले” हैं और  पाकिस्तान को “बातचीत शुरू करने से पहले आतंक पर लगाम लगाने” के लिए कहा. लेकिन भारत सरकार को स्वीकार करना चाहिए कि दुनिया भर में जम्मू और कश्मीर में अभूतपूर्व प्रतिबंधों के बारे में वाकई चर्चा हो रही है.
 
कश्मीर घाटी में अतिरिक्त सैनिकों को तैनात कर दिया गया है और वहां आवाजाही पर कड़े प्रतिबंध लागू हैं. लगभग दो सप्ताह से इंटरनेट पूरी तरह बंद है और इसी तरह मोबाइल फोन सेवाएं भी ठप्प हैं. लैंडलाइन कनेक्शन अब जाकर 17 अगस्त को बहाल किए गए हैं. राज्य में अखबार सामान्य रूप से प्रकाशित नहीं हो रहे हैं. यहां तक कि डाक सेवाओं को भी निलंबित कर दिया गया है. लोग चिकित्सा सहित अहम आपातकालीन सेवाएं प्राप्त करने के लिए मशक्कत  कर रहे हैं. जहां एक ओर भाजपा नेता और समर्थक कश्मीरी दुल्हन और जायदाद हासिल करने की खातिर महिला द्वेषी और जीत के उन्माद से भरी टिप्पणियां कर रहे हैं, वहीँ दूसरी ओर कश्मीर में सैकड़ों नेता और सामाजिक कार्यकर्ता निरोधात्मक नज़रबंदी में हैं, कई कश्मीर के बाहर हिरासत में रखे गए हैं, परिवार से मिलने में असमर्थ हैं या समुचित कानूनी सलाह प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं.
 
सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय को बताया कि कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए ये कदम आवश्यक हैं. बारह दिन गुजरने के बाद, प्रतिबंधों को सिर्फ धीरे-धीरे हटाया जा रहा है.
 
भाजपा नेताओं का दावा है कि इस फैसले से कश्मीर में विकास होगा, रोजगार पैदा होंगे, अंतर्राष्ट्रीय पर्यटक आएंगे और निवेश होगा तथा अलगाववादी हिंसा से मुक्ति मिलेगी.
 
लेकिन आलोचकों और स्वतंत्र मीडिया को चुप कराने की सरकार की कोशिशें यह बताती हैं कि वह बहुत कुछ छुपा रही है. 15 अगस्त को, राजनीति में शामिल होने के लिए सिविल सेवा की नौकरी छोड़ने वाले पूर्व कश्मीरी नौकरशाह शाह फैसल को हिरासत में लिया गया और देश से बाहर जाने से रोक दिया गया. अखबारों की रिपोर्ट के अनुसार, सरकार के फैसले की आलोचना करने वाले उनके मीडिया साक्षात्कारों के बारे में उनसे पूछताछ की गई. सामाजिक कार्यकर्ताओं को एकजुटता प्रदर्शित करने वाली बैठकें करने से रोका गया और उन्हें घरों में नजरबंद कर दिया गया.
 
जम्मू-कश्मीर में फैक्ट फाइंडिंग मिशन पर गए कार्यकर्ताओं के एक समूह ने बच्चों सहित संदिग्ध प्रदर्शनकारियों की मनमानी गिरफ्तारी की बात कही. एक व्यक्ति ने वहां की स्थिति को “बंदूक के साये में ख़ामोशी और मरघट की शांति” बताया है. प्रतिबंधों के बावजूद, कुछ कश्मीरियों ने विरोध प्रदर्शन किया. सुरक्षा बलों द्वारा उत्पीड़न की खबरें भी आ रही हैं.
 
अंतर्राष्ट्रीय हस्तक्षेप की मांग करते हुए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने “स्रेब्रेनिका जैसे मुसलमानों के क़त्लेआम और नस्लीय संहार” की चेतावनी दी जिससे “मुस्लिम दुनिया में गंभीर परिणाम और प्रतिक्रियाएं होंगी और कट्टरता और हिंसा का कुचक्र शुरू होगा.” हालांकि भारत ने इसे खौफ़ पैदा करने वाला बयान बताया है, मगर सरकार को उन कश्मीरी आवाज़ों पर ध्यान देना चाहिए कि हालिया कठोर नीतियां हिंसा को और उग्र कर सकती हैं. मानवाधिकारों पर ध्यान देना हिंसा के चक्र के समापन की दिशा में पहला कदम है.
 
15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के अपने भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कश्मीर में भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद से मुक्त एक नए युग की चर्चा की, लेकिन वह दशकों से जारी  मानवाधिकार उल्लंघन संबंधी जायज शिकायतों को संबोधित करने में विफल रहे. कश्मीरी न केवल मनमानी गिरफ्तारी, यातना, गैर-न्यायिक हत्याओं या बलात गुमशुदगी जैसे घोर उत्पीड़न के लिए जवाबदेही के अभाव की शिकायत करते हैं, बल्कि उनके भीतर चेक पोस्टों पर आक्रामक पूछताछ और महिलाओं के साथ बुरे बरताव सहित तलाशी अभियानों के दौरान अपमान और साथ ही भारी सैन्य उपस्थिति के तहत जीने को लेकर भी असंतोष है. इस बीच, 1990 में मुस्लिम बहुल कश्मीर घाटी से जबरन विस्थापित होने वाले हिंदुओं की वापसी अभी तक नहीं हो पायी है.
 
हाल के वर्षों में, विशेष रूप से 2016 में सरकारी बलों के साथ सशस्त्र मुठभेड़ में एक लोकप्रिय आतंकवादी नेता की हत्या के बाद अनेक विरोध प्रदर्शन हुए हैं और इस्लामी कट्टरपंथ के बढ़ने की खबरें आई हैं. सुरक्षा बलों की जवाबी कार्रवाई, जिसमें मनमाने ढंग से नज़रबंदी और सैकड़ों लोगों को अंधा कर देने वाले पैलेट गन का अंधाधुंध उपयोग शामिल है, ने विरोध प्रदर्शनों को हवा दी है. उसी समय, आतंकवादी हमलों में वृद्धि हुई, जिसमें फरवरी 2019 में पुलवामा में  सुरक्षा बलों के एक काफिले को निशाना बनाते हुए घातक आत्मघाती बम विस्फोट भी शामिल था. पाकिस्तान स्थित एक समूह ने इस विस्फोट की जिम्मेदारी ली थी.
 
भारत आतंकवादियों को हथियार मुहैया कराने और उन्हें प्रशिक्षित करने के लिए लंबे समय से पाकिस्तान को दोषी ठहराता रहा है. इस्लामाबाद पाकिस्तान स्थित उन समूहों की मौज़ूदगी स्वीकार करने या उनके खिलाफ समुचित कार्रवाई से इनकार करता रहा है जो भारत में नागरिकों पर हुए कई हमलों के लिए जिम्मेदार हैं.
 
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया केवल कश्मीर के स्वामित्व संबंधी भारत-पाकिस्तान विवाद पर केंद्रित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसमें संकटग्रस्त कश्मीरी लोगों के अधिकारों की सुरक्षा की भी चिंता होनी  चाहिए. पहले कदम के रूप में, सरकार को राजनीतिक बंदियों को रिहा करना चाहिए, संचार से जुड़े दम घोंटू प्रतिबंधों को वापस लेना चाहिए और सुरक्षा बलों को अधिकारों का सम्मान करने का आदेश देना चाहिए.
 
संयुक्त राष्ट्र के प्रवक्ता ने कहा है कि महासचिव “प्रतिबंधों की खबरों से चिंतित हैं” क्योंकि ये “इस क्षेत्र में मानवाधिकारों की स्थिति को और बदतर कर सकते हैं.” इसके जवाब में भारत को अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों को अपनाना चाहिए, न कि अपने पड़ोसियों की दमनकारी रणनीतियों की नक़ल करनी चाहिए.