I. सारांश
यह स्कूल बुरी तरह से नष्ट हो गया है ... पूरी इमारत बरबाद हो गई है . खिड़कियां टूट और उड़ गई हैं , दीवारों और छत की तरह फ़र्श में भी दरारें पड़ गई हैं . बारामदे और कमरों के बीच की दीवार भी बरबाद हो गई है , हर चीज़ नष्ट हो गई है
- एक 16 वर्षीय छात्र जिसके स्कूल को नक्सलियों ने 9 अप्रैल 2009 को बम से उड़ा दिया .
कई बार ( सुरक्षाकर्मी ) अभियुक्तों को स्कूल में लाते हैं और उनकी पिटाई करते हैं ... मुझे बहुत बुरा लगता है जब वह उनको मारते हैं
-16 वर्षीय इंदिरा परकेश , जिनके स्कूल के कुछ भाग पर राज्य की सह - पुलिस का कब्ज़ा है , 12 जून , 2009.
भारत के पूर्वी राज्य बिहार और झारखंड में नक्सली विद्रोहियों और पुलिस और अन्य सुरक्षा बलों के बीच जारी सशस्त्र संघर्ष के कारण भारत के सबसे अधिक सुविधाविहीन और हाशिए पर आए दसियों हज़ार बच्चों की शिक्षा प्रभावित हो रही है . नक्सल विरोधी अभियान के लिए सुरक्षा बल के जवान सरकारी स्कूलों की इमारत पर कब्ज़ा किए हुए हैं , कभी कभी वे कुछ ही दिनों के लिए उसका इस्तेमाल करते हैं लेकिन वे प्रायः वर्षों तक वहां रहते हैं . इस दौरान लंबे समय से भारत के कई भागों में जारी माओवादी आंदोलनकारी नक्सली सरकारी स्कूलों को सीधा निशाना बना रहे हैं . इनमें वे स्कूल भी सम्मिलित हैं जिन पर सुरक्षा बलों का कब्ज़ा नहीं है . क्षतिग्रस्त स्कूलों की तत्काल मरम्मत कराने में सरकार की विफलता इन हमलों के स्थाई प्रभाव को बढ़ा देती है .
नक्सली दावा करते हैं कि स्कूल पर उनके हमलों से बच्चों की शिक्षा प्रभावित नहीं होती है क्योंकि , उनका कहना है कि वे उन्ही स्कूलों को निशाना बनाते हैं जो राज्य सुरक्षा बल द्वारा नक्सल विरोधी अभियान के लिए प्रयोग में है . ह्यूमैनराइट्स वॉच का शोध स्थापित करता है कि यह दावा ग़लत है . हमारे शोध से संकेत मिलता है कि उन स्कूलों पर भी हमले हुए हैं जो सुरक्षा बलों के प्रयोग में नहीं थे . किसी सरकारी निगरानी के अभाव में नक्सली हमलों के विस्तार और स्वरूप की स्पष्ट जानकारी प्राप्त करना अत्यंत कठिन हो जाता है . फिर भी , ह्यूमैनराइट्स वॉच की अपनी ज़मीनी जांच और सार्वजनिक समाचार सूत्रों के सर्वेक्षण से संकेत मिलता है कि नवंबर 2008 और अक्तूबर 2009 के बीच बिहार और झारखंड के जितने स्कूलों पर हमले हुए उनमें से कम से कम 25 ऐसे स्कूल हैं जो अरक्षित थे और हमले के समय सुरक्षा बलों के प्रयोग में नहीं थे . ऐसा लगता है कि नक्सली सरकारी स्कूलों पर हमला इसलिए करते हैं कि इन सुदूर क्षेत्रों में जहां नक्सलियों का सबसे अधिक प्रभाव और गतिविधि है वहां प्रायः यही सरकारी इमारतें होती हैं . इसके अलावा अरक्षित स्कूल अधिक दिखने वाला आसान शिकार है , उन पर हमला करने से मीडिया आकर्षित होता है और स्थानीय समुदायों में भय और आतंक पैदा होता है . जबकि नक्सली सीधा छात्रों को निशाना बनाते नहीं दिखते हैं लेकिन जो स्कूल सैन्य उद्देश्यों के लिए प्रयोग में नहीं हैं उन पर हमला करना अंतरराष्ट्रीय मानवतावादी क़ानून और भारतीय आपराधिक क़ानून दोनों का उल्लंघन है .
अपने विद्रोह निरोधक अभियान के एक अंग के तौर पर पुलिस और अर्ध - सैनिक बल स्कूल की इमारतों पर अल्पकालीन या अधिक समय के लिए कब्ज़ा किए हुए हैं . सुरक्षा बल स्कूलों की समस्त सुविधाओं और परिसर पर कब्ज़ा कर लेते हैं और स्कूल पूरी तरह से बंद हो जाता है या फिर स्कूल के कुछ भाग पर कब्ज़ा कर लेते हैं और इस प्रकार वे स्कूल की सीमित कक्षाओं में पढ़ाई जारी रखने के लिए बाध्य कर देते हैं जहाँ सुरक्षा बल भी आसपास ही मौजूद होते हैं . कुछ कब्ज़े कभी - कभी और कुछ समय के लिए ही होते हैं - और उनका संयोग चुनाव अथवा स्कूलों और सुदूर स्थानों को अधिक सुरक्षा प्रदान करने के समय से जुड़ा होता है , या फिर वे नक्सल विरोधी सफ़ाई अभियान के लिए उनके अड्डे के तौर पर प्रयोग में लाए जाते हैं . यह व्यापक " सफ़ाई " अभियान किसी क्षेत्र पर कब्ज़ा करने के बजाए व्यक्तियों को पकड़ने के लिए होता है . बहरहाल , कई पुलिस अधिग्रहण कई महीनों , यहां तक कि वर्षों जारी रहते हैं .
जिस प्रकार नक्सली कहते हैं कि उनके हमलों से शिक्षा पर प्रभाव नहीं पड़ता उसी प्रकार बिहार और झारखंड की पुलिस भी दावा करती है कि उनके स्कूलों के अधिग्रहण से बच्चों की शिक्षा प्रभावित नहीं होती है . ह्यूमैनराइट्स वॉच के शोध ने इसे भी उसी प्रकार झूठ पाया . इस रिपोर्ट की खोज कहती है कि चाहे स्कूल पूरी तरह से अधिग्रहित हों या आंशिक रूप से , उसके कारण नियमित रूप से बच्चे स्कूल छोड़ रहे हैं या स्कूल कम जाते हैं . भारी हथियार से लैस पुलिस और अर्ध - सैनिक बल की उसी इमारत में उपस्थिति जहां बच्चे पढ़ते हैं निश्चित रूप से हानिकारक प्रभाव डालेगी और इससे प्रायः बच्चों के शिक्षा के अधिकार के प्रति अधिकारी अपने दायित्व का निर्वाह न करने की स्थिति में आ जाते हैं .
इस रिपोर्ट के लिए बिहार और झारखंड में मई और जून 2009 में शोध किया गया . ह्यूमैनराइट्स वॉच ने 22 विद्यालयों का दौरा किया और 130 लोगों के साथ इंटरव्यू किया जिसमें सात से 17 साल तक के 48 बच्चे भी सम्मिलि हैं . ह्यूमैनराइट्स वॉच ने माता - पिता , शिक्षक , स्कूल प्रधानाध्यपक , स्थानीय शिक्षा समिति के सदस्यों , स्थानीय पुलिस , ज़िले और राज्य स्तर के सरकारी अधिकारियों और स्थानीय एवं अंतरराष्ट्रीय ग़ैर - सरकारी संस्थानों ( एनजीओज़ ) के साथ भी इंटरव्यू किया .
विद्यालयों पर नक्सलियों के हमले
सरकारी नियंत्रण वाले क्षेत्रों में स्थित स्कूलों में नक्सलियों ने लगातार बम विस्फोट किए हैं . यह हमले आम तौर पर शाम या रात को होते हैं और उन्हें स्थानीय तौर पर विस्फोटक उपकरणों के ज़रिए बनाया जाता है जिसे इस क्षेत्र में " डब्बा बम " के नाम से जाना जाता है जिसमें स्टील के कैन में विस्फोटक सामग्री भर दी जाती है . नक्सली छात्रों को सीधे तौर पर निशाना बनाते नहीं प्रतीत होते हैं . विस्फोट के फलस्वरूप स्कूलों को होने वाली क्षति व्यापक तौर पर अलग अलग होती है : इन में आस - पास की इमारतों को अपेक्षाकृत छोटे मोटे नुक़सान से लेकर पूरी इमारत के लगभग ध्वस्त हो जाने तक क्षति पहुंचती है . नक्सली सार्वजनिक तौर पर दावा करते हैं कि वे स्कूलों पर हमला इसलिए करते हैं क्योंकि उनका सुरक्षा बलों द्वारा प्रयोग होता है , लेकिन जिस छोटे स्तर के ये हमले होते हैं उससे उनके दावे मेल नहीं खाते हैं क्योंकि इमारतों को होने वाली यह छोटी मोटी क्षति सुरक्षा बलों को वहाँ उनकी तैनाती से नहीं रोक पाती है .
अप्रैल एवं मई , 2009 में लोकसभा चुनाव से ठीक पूर्व स्कूलों पर बमबारी की घटनाओं में वृद्धि के साथ - साथ इस तरह के पोस्टर लगे हुए या ग्राफ़िटी लिखी हुई भी देखी गई जिसमें चुनाव के आम बहिष्कार का समर्थन किया गया था .
जो नक्सली लड़ाके अथवा उनके कमांडर स्कूलों पर हमले में भाग लेते हैं वे भारतीय आपराधिक क़ानून तथा नागरिक ठिकानों को निशाना बनाने के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय मानवीय क़ानून दोनों का उल्लंघन करते हैं . इसके बावजूद यह सरकार की ज़िम्मेदारी है कि वह ऐसे हमलों के कारण बच्चों की शिक्षा पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव को कम से कम करने के लिए तुरंत और प्रभावी कार्रवाई करे . सरकार को चाहिए कि वह क्षतिग्रस्त स्कूलों की तत्काल मरम्मत या पुनर्निर्माण का काम प्राथमिकता के आधार पर कराए , और जहां संभव हो वहां बच्चों को तुरंत मनो - सामाजिक सहायाता से लाभान्वित कराए और साथ ही आपात वैकल्पिक शिक्षा का प्रबंध कराए . बहरहाल , बिहार और झारखंड सरकारें अपने इस दायित्व को निभाने में विफल रही हैं जिससे नक्सली हमलों का नकारात्मक प्रभाव बढ़ता है . ह्यूमैनराइट्स वॉच की टीम जहाँ - जहाँ गई वहाँ किसी भी स्कूल को अभी तक मरम्मत या पुनर्निर्माण के लिए कोई भी सरकारी सहायता नहीं मिली थी . हालांकि सारे हमले हमारे दौरों से दो से छह महीने पहले हुए हैं और दोनों राज्यों में शिक्षा के लिए ज़िम्मेदार उच्च प्रशासनिक अधिकारियों का दावा है कि मरम्मत के लिए एक दो महीने से ज़्यादा का समय नहीं लगना चाहिए .
सुरक्षा बलों द्वारा स्कूलों का अधिग्रहण
पुलिस और अर्ध - सैनिक पुलिस बल नक्सली विद्रोह के विरुद्ध अभियान के लिए कई कारणों की बुनियाद पर स्कूलों पर कब्ज़ा कर रहे हैं . सुरक्षा बल सुदूर क्षेत्रों में नक्सलियों की सफ़ाई अभियान के दौरान वहां मौजूद किसी स्कूल को अस्थायी शिविर या आश्रय के तौर पर प्रयोग कर सकते हैं जिसकी अवधि एक रात से लेकर दस दिन या उससे अधिक हो सकती है . वे मज़बूत स्कूल की इमारतों पर अपनी अधिक सुरक्षा और हिफ़ाज़त के लिए भरोसा करते हैं . जनता , मीडिया और सरकारी अधिकारियों को स्कूल के इसी तरह के इस्तेमाल की जानकारी होती है .
बहरहाल , इन दोनों राज्यों के विद्यालयों और शिक्षा विभाग के वरिष्ठ सरकारी अधिकारी भी पुलिस अधिग्रहण के स्वरूप और उसकी अवधि का पूरी तरह आकलन नहीं कर पाते हैं और इसका एक कारण यह है कि विभाग के पास इस तरह के अधिग्रहण की पूरी निगरानी की कोई व्यवस्था नहीं है . ह्यूमैनराइट्स वॉच की रिपार्ट दर्शाती है कि पुलिस द्वारा स्कूल अधिग्रहण के दसियों मामलों में पुलिस स्कूलों पर लंबे समय तक कब्ज़ा किए रही है . ह्यूमैनराइट्स वॉच द्वारा जिन अधिग्रहणों की जाँच की गई वहाँ अवधि छह से तीन साल तक रही है और कुछ शैक्षिक सुविधाओं पर एक दशक से ज़्यादा तक कब्ज़ा रहा है . इन लंबे समय तक जारी रहने वाले कब्ज़े का मतलब लंबा खिंचने वाला विद्रोह - निरोधक अभियान हो सकता है . लेकिन ह्यूमैनराइट्स वॉच द्वारा जांचे गए कम से कम दो मामलों में यह पाया गया कि वहां कोई अभियान जारी नहीं था , पुलिस ने स्कूल का एक भाग अपने कब्ज़े में सिर्फ़ इसलिए ले लिया था कि उनका थाना नक्सलियों के हमले में नष्ट हो गया था और उस समय से अब तक उसका पुनर्निर्माण नहीं हो सका था . अन्य मामलों में सुरक्षा बलों ने स्कूल का प्रयोग उस क्षेत्र में सुरक्षा संबंधी किसी विशिष्ट घटना के जवाब में पुलिस चौकी बना कर किया है लेकिन उन्होंने स्कूल के बाहर किसी वैकल्पिक थाने के निर्माण का कोई प्रयास नहीं किया है .
नक्सली हिंसा की घटनाओं से प्रभावित क्षेत्रों में किस स्तर की सुरक्षा आवश्यकता है यह तय करना भारत सरकार की ज़िम्मेदारी है . ह्यूमैनराइट्स वॉच की चिंता केवल स्कूल का प्रयोग है जिसके कारण बच्चे को अनावश्यक रूप से हानि हो रही है अथवा उनकी शिक्षा के अधिकार में हस्तक्षेप हो रहा है . हमारे शोध से संकेत मिलता है कि सुरक्षा बल बहुत जल्दी - जल्दी , बहुत अधिक दिनों के लिए और इन स्कूलों में बच्चों की शिक्षा की बहुत बड़ी क़ीमत पर सरकारी स्कूलों का प्रयोग कर रहे हैं जिसके विकल्प की योजना शीघ्रातिशीघ्र बनाए जाने की ज़रूरत है .
सरकारी सुरक्षा बलों ने प्राथिमिक विद्यालयों , माध्यमिक विद्यालयों , उच्च विद्यालयों और झारखंड में एक कॉलेज के कैंपस के कुछ भाग पर अधिग्रहण कर रखा है . जब एक बार सुरक्षा बल किसी स्कूल पर कब्ज़ा कर लेते हैं तो वह उसे तुरंत सैन्य रंग दे देते हैं और उसे क़िलाबंद करने लगते हैं , इससे कोई मतलब नहीं कि वे पूरे स्कूल की आबादी को बाहर कर देते हैं या स्कूल की इमारत के कुछ भाग पर ही कब्ज़ा करते हैं जबकि शिक्षक और छात्र बचे हुए हिस्से में पढ़ाई जारी रखने की कोशिश करते रहते हैं . क़िलेबंदी के तरीक़ों को ह्यूमैनराइट्स वॉच ने ख़ुद देखा है जिसमें वे स्कूल की छत पर संतरी - कक्ष बना देते हैं ताकि अर्ध - स्वचालित हथियार से लैस निगरानी करने वाले और गार्ड को सुरक्षा प्रदान की जा सके . जिस स्कूल की चहारदीवारी नहीं होती वहां वे खाई खोद सकते हैं या कांटेदार तार के लच्छों से या रेत की बोरियों से सुरक्षा दीवार बना सकते हैं . हथियार और युद्ध सामग्रियां स्कूल परिसर या उसकी इमारत में रखे जाते हैं , और सुरक्षा बल के जवान स्कूल के परिसर में आम तौर पर अर्ध - स्वचालित हथियार या बंदूक़ से लैस रहते हैं . प्रायः जो सुरक्षा बल जिस स्कूल पर कब्ज़ा किए होता है वह अपनी यूनिट का नाम और साइनबोर्ड लगाता है या स्कूल की इमारत पर कुछ लिख देता है . और सुरक्षा बलों के स्कूल परिसर को छोड़ने के बाद भी वे अपने पीछे ये सैन्य क़िलाबंदी और निशान छोड़ जाते हैं जिससे यह ख़तरा पैदा हो जाता कि कहीं यह सैन्य लक्ष्य तो नहीं .
स्कूल के प्रधानाचार्य , शिक्षक , माता - पिता , और छात्रों ने लगातार ह्यूमैनराइट्स वॉच को सूचना दी है कि उन्हें पुलिस द्वारा उनके स्कूल के अधिग्रहण के बारे में कोई भी सूचना पहले से नहीं मिली है . स्कूल अधिकारियों को सूचना न मिलने के कारण वह समुदाय पढ़ाई जारी रखने के बेहतर विकल्प तैयार करने के अवसर से वंचित रह जाता है और इससे स्थानीय निवासियों और उनके बच्चों को पुलिस वालों को दूसरे स्थान के विकल्प देने का अवसर समाप्त हो जाता है . इसके अतिरिक्त अधिसूचना और छात्रों से स्पष्टीकरण की कमी के कारण बच्चे घबराहट और अनिश्चितता का शिकार हो जाते हैं .
सुरक्षा बल जिस प्रकार स्कूलों पर कब्ज़ा करते चले जा रहे हैं ऐसे में नागरिक प्रभाव की कमी एक बड़ी समस्या हो जाती है . उदाहरणस्वरूप , शिक्षा और स्कूलों के लिए ज़िम्मेदार सरकारी विभाग यानी बिहार और झारखंड के मानव संसाधन विकास विभाग ने ज़ोरदार तरीके से कहा कि उन्होंने सुरक्षा बलों द्वारा स्कूल के प्रयोग का विरोध किया है और कड़ी आपत्ति जताई है , लेकिन इस प्रथा को रोकने या एक बार किसी स्कूल में सुरक्षा बल के स्थापित हो जाने बाद वे उन्हें निकालने में असहाय नज़र आते हैं . वर्तमान में कितने स्कूल अधिकृत हैं , इन अधिग्रहणों की अवधि , सुरक्षा बल की कौन सी टुकड़ी कब्ज़ा किए हुए है या इन कब्ज़ों का औचित्य क्या है इन दोनों विभागों के पास इन बुनियादी आंकड़ों का भी अभाव है . स्कूल के प्रधानाचार्य तथा शिक्षकों ने लगातार ह्यूमैनराइट्स वॉच को बताया कि उन्होंने भी अपने स्कूल में पुलिस और अर्ध - सैनिक बलों की उपस्थिति का विरोध किया लेकिन स्थानीय पुलिस अधिकारियों से उनकी शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं हुई , अथवा यह कि वे सरकारी कर्मचारी होने के नाते इस प्रकार के सरकारी कार्यों का विरोध करने में असमर्थ हैं .
नागरिक अधिकारों के भीषण अभाव का एक विशिष्ट चौंकाने वाला उदाहरण है पुलिस के कब्ज़े पर आपत्ति दर्ज कराने के लिए 2008 के अंत में झारखंड उच्च न्यायालय में लाई गए एक जनहित याचिका पर पुलिस की प्रतिक्रिया . राज्य की सर्वोच्च अदालत के मुख्य न्यायधीश ने 21 नवंबर 2008 को आदेश दिया कि जनवरी , 2009 के दूसरे सप्ताह तक सभी कब्ज़ा किए हुए स्कूलों को ख़ाली कर दिया जाए . हालाँकि , ह्यूमैनराइट्स वॉच ने मई एवं जून 2009 में की अपनी जांच में पाया कि न केवल दौरा किए जाने वाले स्कूलों में से अधिकतर पर उस समय तक कब्ज़ा था बल्कि ह्यूमैनराइट्स वॉच ने पाया कि कई अन्य शैक्षिक सुविधाओं जिन पर सुरक्षा बलों ने कब्ज़ा कर रखा था उन्हें तो न्यायलय के सामने प्रकट ही नहीं किया गया था . ह्यूमैनराइट्स वॉच ने कम से कम दो उदाहरण ऐसे पाए जिनमें न्यायालय के आदेश के बाद स्कूल पर नया कब्ज़ा किया गया था .
यदि किसी विशिष्ट मामले में किसी स्कूल पर पुलिस कब्ज़े को सुरक्षा कारणों से न्यायोचित ठहरा भी दिया जाए तो भी कब्ज़े की वर्तमान प्रथा इन ज़रूरतों से कहीं अधिक है . दो पुलिस अधीक्षकों ने ह्यूमैनराइट्स वॉच को बताया कि हालांकि नक्सल विरोधी अभियान के लिए अस्थायी ठिकाने के तौर पर उन्हें स्कूल की ज़रूरत पड़ती है लेकिन स्कूलों का दीर्घकालीन प्रयोग आवश्यक नहीं है और यह कार्य कहीं और भी किया जा सकता है .
ह्यूमैनराइट्स वॉच ने अगस्त 2009 में अपनी एक रिपोर्ट " खंडित व्यवस्था : भारतीय पुलिस में दुष्क्रिया , दुर्व्यवहार और दंडमुक्ति " में पूरे भारत में उन खराब परिस्थितियों का लेखाजोखा प्रस्तुत किया था जिनके अंतर्गत पुलिस अधिकारियों को काम करना पड़ता है और यह कि किस प्रकार यह परिस्थितियां उनके द्वारा मानवाधिकार के हनन का कारण बनती हैं . स्कूलों का अधिग्रहित नियोचित सुरक्षा कार्यों के लिए पुलिस को आवश्यक मूलभूत ढांचा सुनिश्चित कराने में विफलता का एक और उदाहरण है जिसके कारण अधिकारों के हनन में सहयोग मिलता है .
स्कूलों पर कब्ज़ा एक अन्य उदाहरण है जहाँ आवश्यक मूलढाँचे का निर्माण सुनिश्चित करने में विफलता , जो पुलिस को एक वैध सुरक्षा भूमिका निभाने के लिए समर्थ बना सके , उनके मानवाधिकार हनन में योगदान करती है .
शिक्षा में व्यवधान
संघर्ष में शामिल दोनों पक्षों के विपरीत दावों के बावजूद ह्यूमैनराइट्स वॉच के शोध से स्पष्ट है कि बच्चों की शिक्षा प्राप्ति के रास्ते में नक्सली हमले और सरकारी कब्ज़े दोनों गंभीर रुकावट खड़ी कर सकते हैं .
इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं कि स्कूलों में सुरक्षा बलों की मौजूदगी से छात्रों को अनावश्यक तौर पर नक्सली हमलों का ख़तरा बना रहता है . हालांकि ह्यूमैनराइट्स की जांच में पाया गया है कि नक्सली हमले सामान्य रूप से ऐसे समय में किए गए हैं जब स्कूलों में बच्चे नहीं रहते हैं . हालाँकि , ह्यूमैनराइट्स वॉच के सामने हत्या का एक ऐसा मामला आया है जो स्कूल के हॉल में हुआ और वह हॉल छात्रों से भरा हुआ था . इसके अतिरिक्त , हमारे शोध में ऐसे आवासीय स्कूलों के उदाहरण मौजूद हैं जिसे सुरक्षा बलों ने अपने कब्ज़े में ले रखा है और जहां छात्र रात में रहते हैं . ऐसे स्कूलों में अपने शिविर स्थापित करके सुरक्षाकर्मी छात्रों को पुलिस चौकी पर किए जाने वाले रात्रि हमले के नतीजे में दोनों ओर की गोलीबारी के बीच फंसने के ख़तरे में डाल रहे हैं .
उन स्कूलों में जिसके कुछ भाग में सुरक्षा बल वाले पुलिस थाना चलाते हैं और साथ साथ उसमें छात्र भी पढ़ते हैं वहां ह्यूमैनराइट्स वॉच ने कुछ शिकायतें एकत्र की हैं जिनमें कहा गया है कि सुरक्षाकर्मी अपराधियों को स्कूल वापस लाते हैं और छात्रों के सामने उनकी पिटाई करते हैं और उनसे दुर्व्यवहार करते हैं . छात्रों ने ह्यूमैनराइट्स वॉच को यह भी बताया कि जब सुरक्षाकर्मी उनकी ओर अपने हथियार का रुख़ करते हैं या उनसे निजी प्रश्न पूछते हैं तो वे डर जाते हैं . कुछ छात्रों ने वहां के वातावरण को प्रतिकूल पाया क्योंकि सुरक्षा बल के जवान उनके सामने कच्छों में नहाते हैं , जबकि कुछ छात्रों ने उन जवानों द्वारा बीयर और शराब की ख़ाली बोतलों से अपने स्कूल के प्रांगण को गंदा करने पर आपत्ति जताई .
इस प्रकार के सफल नक्सली हमलों में एक ओर जहां स्कूल के मूलभूत ढांचे को क्षति पहुँचती है वहीं यह सामान्य भय और विदारण का भी कारण हो सकता है और इन स्थितियों में कुछ छात्र सदा के लिए स्कूल छोड़ देते हैं अथवा उनकी शिक्षा में व्यवधान आ जाता है . सुरक्षा बलों द्वारा किसी स्कूल के आंशिक या पूर्ण अधिग्रहण के साथ ही कुछ छात्र लगभग तुरंत स्कूल से पलायन कर जाते हैं . किसी स्कूल के आंशिक अधिग्रहण के परिणामस्वरूप लड़कियां विशेष तौर से स्कूल आना छोड़ देती हैं . हालांकि , कुछ छात्र उस क्षेत्र में मौजूद किसी अन्य स्कूल में स्थानांतरण करवा सकते हैं यदि उनके माता - पिता उसके ख़र्च को सहन कर सकें , किंतु बहुत सारे छात्र सिरे से पढ़ाई ही छोड़ देते हैं . लड़कियों का अधिक संख्या में पढ़ाई छोड़ना सुरक्षाकर्मियों द्वारा छात्राओं के उत्पीड़न के सीधे अथवा देखे हुए अनुभव से जुड़ा हुआ है .
यदि पूरा का पूरा स्कूल किसी नक्सली हमले या पुलिस अदिग्रहण के नतीजे में स्थानांतरित हो जाता है तो स्कूल को खुले आकाश के नीचे , किसी सराय में , किसी ख़ाली पड़े कारख़ाने में , किसी अन्य सरकारी इमारत में , स्कूल के बारामदे में , स्कूल के आंगन या किसी दूर के स्कूल में जहां जाने के लिए छात्रों को लंबी दूरी तय करनी पड़ती है जैसे निम्न स्तर के विकल्प मिलते हैं जिसके परिणामस्वरूप कम दर्जे की पढ़ाई का माहौल होता है . सामान्य रूप से स्कूल की शिक्षा को उस समय तक के लिए स्थगित कर दिया जाता है जब तक कि कोई विकल्प तलाश या स्थापित नहीं कर लिया जाता .
स्कूलों के दीर्घकालीन अधिग्रहण के कारण जहां छात्रों के स्कूल छोड़ने की दर में वृद्धि होती है वहीं छात्रों के स्कूल में प्रवेश लेने और उच्च शिक्षा जारी रखने की दर में भी कमी आती है . ह्यूमैनराइट्स वॉच ने जिस एक स्कूल का दौरा किया वहाँ सरकार ने एक आवासीय छात्रावास की मंज़ूरी दे रखी है ताकि 200 सुविधाविहीन स्कूल से बाहर की छात्राएं स्कूल जाना आरंभ कर दें और सरकार ने छात्राओं की छात्रवृत्ति के लिए पैसे देने भी शुरू कर दिए हैं . बहरहाल , स्कूल के दो कमरों में केवल 10 पुलिसकर्मियों की उपस्थिति के कारण माता - पिता अपनी बच्चियों का स्कूल में दाख़िला नहीं कराना चाहते हैं जिससे कि वे सरकार की इस योजना से लाभान्वित हो सकें .
एक अन्य स्कूल को सरकार ने XI वीं और XII वीं कक्षाओं तक बढ़ाने की पहले से ही स्वीकृति दे रखी है . किंतु , स्कूल के 11 में से आठ कमरों पर पुलिस के कब्ज़े के कारण वहां ये अतिरिक्त कक्षाएँ लगाने के लिए बिलकुल जगह नहीं है . छात्रों ने ह्यूमैनराइट्स वॉच को बताया कि वे किस प्रकार अपनी पढ़ाई स्कूल में जारी रखना चाहते हैं लेकिन वे सुरक्षा बलों की मौजूदगी के कारण ऐसा नहीं कर सकते .
जहां सुरक्षा बलों ने स्कूल के मात्र कुछ भाग पर ही कब्ज़ा कर रखा है , या नक्सली हमले में स्कूल की इमारत नष्ट हो गई है वहां इमारत के बचे हुए भाग में छात्रों की ज़रूरत से ज़्यादा भीड़ हो जाती है . इसके कारण विभिन्न वर्गों के छात्र एक ही कमरे में आ जाते हैं जिसके कारण पढ़ाई में और अधिक बाधा पड़ने लगती है और इससे उनकी पढ़ने की क्षमता प्रभावित होती है . छात्रों की अधिक संख्या से निबटने के लिए कोई स्कूल बारी बारी से कई शिफ़्ट में स्कूल चलाने का प्रयास कर सकता है अथवा एक सप्ताह में एक छात्र को जितने घंटे की पढ़ाई मिलती है उसमें कमी करके उससे निबटने की कोशिश कर सकता है लेकिन इससे जो लोग अलग से ट्यूशन का बोझ उठा सकते हैं उन्हें निजी ट्यूशन की ओर प्रेरित किया जाता है जबकि जो ट्यूशन नहीं ले सकते हैं वे अपना पाठ्यक्रम पूरा करने में विफल हो जाते हैं . छात्रों की अधिक संख्या से निबटने के लिए कुछ स्कूल कुछ वर्गों को बाहर किसी पेड़ के नीचे बिना बलैकबोर्ड और डेस्क के पढ़ाने की कोशिश करते हैं जिसके कारण अधिक ध्यान भंग होता है . इन सारी परिस्थितियों का परिणाम सामान्यतः ये होता है कि पढ़ाई कम होती है और भगौड़ापन अधिक हो जाता है .
स्कूल की इमारत पर पुलिस के कब्ज़े के कारण बच्चों को विशेष सुविधाओं की प्राप्ति में रुकावट आ सकती है . ह्यूमैनराइट्स वॉच द्वारा दौरा किए गए स्कूलों में आम तौर पर यह पाया गया कि बच्चों की विज्ञान की प्रयोगशाला , सुदूर के छात्रों के लिए छात्रावास , पानी के पंप , खेल के मैदान , रसोई जहां मिड - डे - मील यानी दोपहर के भोजन का प्रावधान होना चाहिए वे सब जगहें उनसे छिन जाती हैं . ( जिन स्कूलों में लड़किया पढ़ती हैं वहां शौचालय की सुविधा को विश्व भर में एक महत्वपूर्ण तत्व माना जाता है ). नक्सली हमले के शिकार एक स्कूल में जहां ह्यूमैनराइट्स वॉच ने दौरा किया वहां स्कूल के शौचालय और रसोई पर विस्फोट का सर्वाधिक प्रभाव नज़र आया .
व्यापक संदर्भ
भारत की विश्व की बड़ी आर्थिक शक्ति बनने की इच्छा में उत्कृष्ट शिक्षा तक सार्वभौमिक पहुंच और अपने बच्चों को सारी सुविधाएं देना अपरिहार्य अंग है . फिर भी , एक परेशान करने वाली बनावटी स्थिति यह है कि इस संघर्ष में सम्मिलित दोनों पक्ष अपने कार्यकलापों से बच्चों पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर चिंतित नहीं हैं .
बिहार और झारखंड दोनों राज्यों की सरकारों का दावा है कि वे अपने - अपने राज्य के सभी छात्रों को शिक्षा देने के लक्ष्य की प्राप्ति का प्रयास कर रहे हैं . जब शिक्षा के अवसर और उसके परिणाम की बात आती है तो हालांकि यह दोनों राज्य भारत की रैंकिंग में सबसे नीचे रहते हैं लेकिन दोनों सरकारें इन क्षेत्रों में प्रगति कर रही हैं . किंतु , यह इस पृष्टभूमि के विरुद्ध है कि स्कूलों का प्रयोग इसके प्रतिकूल है . क्योंकि सरकार का एक हाथ यदि शिक्षा तक पहुंच को बढ़ाने का प्रयास करता है तो दूसरा हाथ शिक्षा केअवसरों को वापस ले रहा है जो पहले से स्थापित हैं और जिनका उपयोग राज्य के सबसे अधिक ज़रूरतमंद बच्चों के लिए है . बच्चों को उनका अधिकार नहीं देना और उन्हें जीवन के इस अवसर से सदा के लिए वंचित कर देना यह बच्चों के लिए विपत्तिकारक है .
नक्सलियों का दावा है कि वे उन राज्यों के सबसे पिछड़े और उपेक्षित ग्रामीण समुदायों की ओर से एक क्रांतिकारी " जन युद्ध " लड़ रहे हैं . लेकिन फिर भी स्कूलों को नुक़सान पहुंचा कर या नष्ट करके जोकि उनके हमले के समय शिक्षा केंद्र के तौर पर काम कर रहे थे वह सिर्फ़ उन समुदायों के पहले से ही सुविधाविहीन बच्चों के अवसर को कम कर रहे हैं .
हालांकि यह रिपोर्ट बिहार और झारखंड पर आधारित है किंतु विद्यालयों पर नक्सली आक्रमणों और पुलिस एवं अर्ध - सैनिक बलों द्वारा स्कूलों का अधिग्रहण केवल इन्ही राज्यों तक सीमित नहीं है . सितंबर 2008 में ह्यूमैनराइट्स वॉच ने " ख़तरनाक काम : बच्चे और छत्तीसगढ़ संघर्ष " के नाम से एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी जिसमें उस राज्य में सभी पक्षों द्वारा संघर्ष में बच्चों के प्रयोग और बच्चों की शिक्षा पर संघर्ष के प्रतिकूल प्रभाव का विवरण शामिल था . नक्सली हिंसा की घटनाएँ 2008-2009 में भारत के 13 राज्यों में हुई हैं . संपूर्ण 2008 और जून 2009 के मध्य तक जितनी नक्सली घटनाएँ हुईं उनमें से 86 प्रतिशत बिहार और झारखंड के साथ छत्तीसगढ़ और उड़ीसा में घटी हैं . पश्चिम बंगाल ने माओवादियों का कब्ज़ा समाप्त करने के लिए एक सुरक्षा अभियान चलाया क्योंकि माओवादियों ने अपने नियंत्रण वाले राज्य के पश्चिमी क्षेत्र को " स्वतंत्र अंचल " घोषित कर दिया था . इन अन्य तीन प्रमुख नक्सल - प्रभावित राज्यों में से प्रत्येक में विद्रोह और सरकार द्वारा विद्रोह कुचलने की कार्रवाइयों के फलस्वरूपर शिक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है .
भारत सरकार ने संबद्ध राज्यों के साथ मिलकर बढ़ते हुए सशस्त्र नक्सली हमलों के विरुद्ध अभियान चलाने की योजना की घोषणा की है . नक्सलियों द्वारा और अधिक स्कूलों को निशाना बनाने और सुरक्षा बलों द्वारा स्कूलों के अधिग्रहण से गंभीर चिंता उत्पन्न होती है कि और अधिक बच्चों को शिक्षा में दीर्घकालीन विघ्न का सामना करना पड़ सकता है .
II. सिफ़ारिश
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ( माओवादी) से
स्कूल की इमारतों सहित समस्त नागरिक प्रतिष्ठानों पर आक्रमण बंद किए जाएँ यदि वे नक्सल विरोधी सैन्य गतिविधियों के लिए पुलिस और अर्ध - सैनिक बलों द्वारा इस समय प्रयोग में नहीं हैं .
स्कूल की इमारतों सहित ऐसे समस्त नागरिक प्रतिष्ठानों के विरुद्ध तुरंत आक्रमण बंद करें जो सैन्य लक्ष्य हैं और जहां नागरिकों की जान और माल का नुकसान अपेक्षित सैन्य लाभ के अनुपात में अधिक हो .
तुरंत सार्वजनिक बयान जारी किया जाए जिसमें नक्सलियों को निर्देश दिया जाए कि वे अंतरराष्ट्रीय मानवीय क़ानून के तहत स्कूलों और शैक्षणिक संसाधन केंद्रों का संरक्षित वस्तुओं के तौर पर आदर करें .
भारत की केंद्र सरकार से
प्रत्येक राज्य के लिए सर्व - शिक्षा अभियान के वार्षिक बजट की समीक्षा के दौरान केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय को चाहिए कि वह स्कूलों पर होने वाले नक्सली आक्रमण से प्रभावित हर राज्य से :
क्षतिग्रस्त स्कूलों की मरम्मत और पुनर्निर्माण के पूरा होने की ताज़ा जानकारी प्राप्त करे ,
पिछले वर्ष सुरक्षा बलों द्वारा अधिग्रहित स्कूलों की संख्या , अधिग्रहण की अवधि और प्रत्येक अधिग्रहण के औचित्य की ताज़ा जानकारी प्राप्त करे ,
नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में जिन स्कूलों को ख़तरा है उन स्कूलों के बाहर रात में प्रकाश की व्यवस्था और मज़बूत क़िलाबंद दीवारों जैसी बुनियादी सुरक्षा सुविधाओं के लिए केंद्र और राज्य सरकारों से उचित फ़ंड मिला है या नहीं उसका ताज़ा ब्यौरा प्राप्त करें .
एक उन्नत त्वरित जवाबी व्यवस्था तैयार करने के लिए , संभवतः विशेष आपात फ़ंड के ज़रिए , नक्सल प्रभावित राज्यों के साथ सहयोग करें , ताकि जब आक्रमण हो तो स्कूलों की तुरंत मरम्मत की जा सके या उनका पुनर्निर्माण किया जाए और क्षतिग्रस्त शैक्षणिक सामग्री बदली जा सके ताकि बच्चे जितना जल्दी हो सके स्कूल वापस आएं . पुनर्निर्माण के दौरान बच्चों को शिक्षा के दूसरे विकल्प मिलने चाहिएं जहाँ उचित मनोवैज्ञानिक - सामाजिक सहायता का प्रबंध हो .
पुलिसकर्मियों को स्थानीय स्कूल की इमारतों में स्थानांतरित करने के बजाए नक्सली आक्रमण के शिकार पुलिस थानों की तुरंत मरम्मत कराएं या उनका पुनर्निमाण कराएं . नक्सली हिंसा प्रभावित इलाक़ों में पुलिस थाना स्कूल या अन्य नागरिक इमारतों के पास नहीं बनाए जाने चाहिए .
अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय के रोम क़ानून को स्वीकार करें जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा के लिए समर्पित इमारतों के विरुद्ध आक्रमण को युद्ध अपराध मानता है , बशर्ते अंतरराष्ट्रीय अथवा आंतरिक सशस्त्र युद्ध के दौरान उनका प्रयोग सैन्य उद्देश्य के लिए नहीं हो रहा हो .
बिहार और झारखंड की राज्य सरकारों से
सुरक्षा बलों को स्कूल की इमारतों को शिविर , पुलिस चौकी अथवा पुलिस थाने के लिए प्रयोग की अनुमति नहीं दें जहाँ अंतरराष्ट्रीय क़ानून के तहत बच्चे शिक्षा के अधिकार से वंचित रह जाएँगे .
सुरक्षा बलों को हर प्रकार की सुसंगत एहतियात बरतनी चाहिए और अपने नियंत्रण में आने वाले बच्चों और अन्य नागिरकों को आक्रमण के प्रभाव से सुरक्षा प्रदान करने के लिए अधिग्रहित स्कूलों के आस पास से हटा देना चाहिए .
तुरंत एक अंतर - विभागीय कार्यगुट का गठन करें जिसमें मानव संसाधन विभाग , युवा विभाग , गृह विभाग , झारखंड में कल्याण विभाग , बिहार में अनुसूचित जाति / जनजाति विभाग और राज्य के मानवाधिकार आयोग के उपयुक्त प्रतिनिधि शामिल हों . इन कार्यगुटों को चाहिए कि वे :
अपने अपने राज्यों में हर उस गाँव और शहर का दौरा करें जहां हाल में सुरक्षा बलों द्वारा किसी स्कूल पर क़ब्ज़ा कर लिया गया है , वहां जाकर अलग अलग स्कूलों के प्रधानाचार्यों , शिक्षकों और परा - शिक्षकों , स्थानीय शिक्षा समितियों , वर्तमान और पूर्व छात्रों , माता - पिताओं एवं अभिभावकों , गाँव के पंचों और स्थानीय पुलिस से मिल कर ये सुनिश्चित करें कि स्कूल और छात्रों को किन अतिरिक्त सुविधाओं की आवश्यकता है ताकि उनकी पढ़ाई बाधित न हो और इसे सुनिश्चित करने हेतु उचित उपाय करें .
अपने अपने राज्यों में उस प्रत्येक गाँव और शहर का दौरा करें जहां हाल में किसी स्कूल पर नक्सली हमला हुआ है और उन्हीं गुटों और पणधारियों से यह जानने के लिए मिलें कि स्कूल और छात्रों को कौन सी अतिरिक्त सुविधाओं की आवश्यकता है ताकि उनकी शिक्षा बाधित न हो और यह सुनिश्चित भी करें कि बुनियादी ढांचों की आवश्यक मरम्मत पूरी हो गई है .
इस प्रकार के विचार - विमर्श पर आधारित ' अब तक सीखे सबक ' की एक सूची प्रकाशित करें जिसमें उपयुक्त राज्य सरकारों के लिए भविष्य में स्कूलों पर नक्सली हमलों और सुरक्षा बलों द्वारा क़ब्ज़ों के बारे में सुझाव शामिल हों .
स्कूल की इमारतों और सुविधाओं की और अधिक मरम्मत या पुनर्निर्माण के द्वारा प्रभावित स्कूलों और छात्रों की सहायता करें . बच्चों के लिए मनो - समाजिक सहायता , प्रतिकारक शिक्षा कार्यक्रम के प्रावधान , और स्कूलों की सुरक्षा व्यवस्था ( उदाहरणस्वरूप , बाह्य प्रकाश का प्रबंध और अहाते की दीवार की मज़बूती ) को बढ़ा कर सहायता करें .
बिहार और झारखंड के मानव संसाधन विकास विभागों से
सुरक्षा बलों द्वारा कब्ज़ा किए गए प्रत्येक स्कूल का लेखाजोखा रखने के लिए एक निगरानी तंत्र की स्थापना करें जिसमें कब्ज़े की तिथि , क़ब्ज़े की अवधि , किस सुरक्षा बल ने कब्ज़ा किया है , स्कूल में स्थित लोगों की संख्या , उनके ख़ाली करने की अपेक्षित तिथि , और कब्ज़ा करने का औचित्य सभी का लेखा जोखा हो . कब्ज़ा किए गए हर स्कूल के लिए जितना जल्दी संभव हो सके स्कूल में शिक्षा बहाल किए जाने की एक योजना बनाई जाए . इस प्रकार के प्रतिकारक उपाय किए जाएँ कि बच्चों की शिक्षा कम से कम प्रभावित हो .
क्षतिग्रस्त स्कूल की इमारतों की तुरंत मरम्मत और पुनर्निर्माण की उच्च स्तरीय निगरानी के लिए हर राज्य की राजधानी में एक उच्च पदाधिकारी की नियुक्ति की जाए .
एक उन्नत त्वरित जवाबी व्यवस्था तैयार की जाए ताकि जब किसी स्कूल पर नक्सली हमला हो तो स्कूल की शीघ्रातिशीघ्र मरम्मत और पुनर्निमाण किया जा सके और नष्ट होने वाली शिक्षा सामग्री को बदला जा सके और जितना जल्दी संभव हो बच्चे स्कूल वापस आ सकें .
वर्तमान में अधिग्रहित स्कूलों और पुलिस चौकियों के समीप नए स्कूल न बनाए जाएं .
बिहार और झारखंड के गृह विभाग के लिए
केंद्र सरकार के गृह विभाग के परामर्श से कड़े दिशानिर्देश तैयार किए जाएँ जिनके अंतर्गत पुलिस और अर्धसैनिक बलों द्वारा स्कूली इमारतों के इस्तेमाल का नियमन हो और ऐसे एहतियाती उपाय किए जाएं जिससे स्कूलों , छात्रों , अध्यापकों एवं प्रशासन को पहुँचने वाली क्षति को कम से कम किया जा सके .
दिशानिर्देशों में पुलिस और सुरक्षा बलों से कहा जाए कि :
वे स्कूल के प्रधानाध्यापक एवं स्थानीय स्कूल शिक्षा समितियों को जितना जल्दी हो सके सूचना जारी करें ताकि स्थानीय समुदायों को अधिग्रहित स्थान के विकल्प का प्रस्ताव देने के बेहतर अवसर मिल सकें और छात्रों की शिक्षा को कम से कम बाधित होने की कार्यनीति बन सके .
निगरानी और पारदर्शिता को बढ़ाने के लिए गृह विभाग , मानव संसाधन विकास विभाग , और बिहार में अनुसूचित जाति / जनजाति विभाग तथा राज्य मानवाधिकार आयोग और झारखंड में कल्याण विभाग को तुरंत क़ब्ज़े की सूचना , क़ब्ज़े का औचित्य , कब्ज़े का आकार और अवधि , और क़ब्ज़े के अपेक्षित समापन की तिथि से अवगत कराएँ .
जब स्कूल छोड़ें तो उसे उसी स्थिति में या उससे बेहतर स्थिति में छोड़ें जैसी वह अधिग्रहण से पूर्व थी . पुलिस क़ब्ज़े के सारे चिन्ह हटा दें जैसे कि संतरी - चौकी और कांटेदार तार और जिन छात्रों को नुक़सान पहुंचा है उन्हें मुआवज़ा दें .
यदि किसी स्कूल का अधिग्रहण किया जाता है तो तुरंत किसी अन्य सुरक्षित स्थान पर अस्थाई संसाधन ( जैसे तंबू और पहले से बने हुए कक्ष ) का प्रबंध किया जाए जिसमें बलैकबोर्ड , मेज़ , कुर्सियां , और शिक्षा सामग्री जैसी सभी आवश्यक सुविधाएँ हों तथा पेयजल एवं और शौचालय का प्रावधान हो .
सुरक्षाकर्मियों द्वारा बच्चों के उत्पीड़न तथा हिंसा के आरोपों की पूरी तरह से जांच की जाए और इसके ज़िम्मेदार लोगों को , चाहे वे किसी भी पद पर हों , उपयुक्त दंड दिया जाए या उन पर मुकदमा चलाया जाए .
यह सुनिश्चित करें कि नक्सली हमले से प्रभावित क्षेत्रों में थाने के निर्माण के लिए केंद्र सरकार द्वारा दी जाने वाली राशि का प्रयोग घनी आबादी वाले इलाक़े या स्कूल के नज़दीक थाना बनाने में तो नहीं हो रहा है .
स्कूलों पर होने वाले हमलों की घटना की पूरी तरह से जांच करें और ऐसे हमले के ज़िम्मदार लोगों के विरुद्ध उचित तौर पर मुक़दमा चलाएं .
बाल और सशस्त्र संघर्ष के महासचिव के विशेष प्रतिनिधि से
बच्चों पर संघर्ष के प्रभाव का आकलन करने के लिए नक्सली विद्रोह और सरकार की प्रतिकारात्मक कार्रवाई से प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करें और इस संघर्ष में सम्मिलित सभी पक्षों के प्रतिनिधियों से अंतरराष्ट्रीय क़ानून के तहत उनके दायित्व के बारे में बात करें .
संयुक्त राष्ट्र बाल कोष ( यूनिसेफ़ ) से
नक्सलियों के साथ संघर्ष के संदर्भ में शिक्षा पर हमले और अंतरराष्ट्रीय क़ानून के प्रतिकूल बच्चों की सैनिकों के तौर पर भर्ती तथा उनका प्रयोग और उन्हें अपंग बनाने और अन्य दुर्व्यवहार की निगरानी के लिए नक्सली हिंसा प्रभावित क्षेत्रों में नागरिक समाज एवं संयुक्त राष्ट्र की अन्य एजेंसियों के साथ एक तंत्र स्थापित करें .
बाल और सशस्त्र संघर्ष के महासचिव के विशेष प्रतिनिधि को निरंतर उपयुक्त जानकारी उपलब्ध कराएँ ताकि वह महासचिव और संयुक्त राष्ट्र के बाल एवं सशस्त्र संघर्ष कार्यगुट तक उसे पहुँचा सकें .
विदेशी सरकारों तथा अंतर - सरकारी संस्थाओं से
वर्तमान आपात्कालीन शिक्षा कार्यक्रम से संबद्ध विशेषज्ञता एवं क्षमता को बढ़ा कर नक्सल विद्रोह से प्रभावित क्षेत्रों तक ले जाएँ ताकि वहाँ किसी हमले के तुरंत बाद वैकल्पिक सुविधाएँ तत्काल पहुँचाई जा सकें .
संघर्ष वाले क्षेत्रों में शैक्षिक सुविधाओं को होने वाले ख़तरे को कम से कम करने के लिए वैश्विक अनुभवों का आदान प्रदान करें .
III. मामले का अध्ययनः तंकुप्पा उच्च विद्यालय , बिहार
भारी हथियारों से लैस भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ( माओवादी ) के सैंकड़ों लड़ाकों ने 4 जुलाई , 2006 को प्रातःकाल बिहार के गया ज़िले में तनकप्पा शहर के थाने पर हमला कर दिया . दो पुलिस अधिकारी यू . एन सिंह और अशोक सिंह हमले में मारे गए और दो अन्य अधिकारी घायल हो गए [1] . यद्यपि पुलिस नक्सलियों को थाने के शस्त्रागार पर क़ब्ज़ा करने और हथियार लूटने से रोकने में समर्थ रही पर आक्रमणकारी थाने में विस्फोटक डॉयनामाइट लगाने में सफल रहे जिसके कारण थाने की इमारत ध्वस्त हो गई . थाना नष्ट हो जाने के बाद पुलिस ने थाने के पास स्थित नवीं और दसवीं कक्षा के दिन भर चलने वाले सह - शिक्षा विद्यालय तनकुप्पा हाई स्कूल की इमारत में अपना डेरा जमा लिया .
तीन वर्ष बाद जब ह्यूमैनराइट्स वॉच ने जून 2009 में वहां का दौरा किया तो उस समय तक पुलिस वहीं थी और स्कूल की 11 कक्षाओं में से आठ पर क़ब्ज़ा किए हुई थी . लगभग 25 से 40 पुलिसकर्मी आम तौर पर स्कूल में रहते हैं और एक शिक्षक ने बताया कि " अभी जो कब्ज़ा किए हुए हैं वे राज्य सहायक पुलिस ( एसएपी ) दल के लोग हैं ." [2] अब विद्यालय स्पष्ट तौर पर सैन्य प्रतिष्ठान जैसा नज़र आता है . स्कूल की दो इमारतों में से एक इमारत की छत पर ईंटों के बने हुए कम से कम दो संतरी - कक्ष हैं और ईंटों से घेराबंदी की हुई है जबकि दूसरी इमारत पर कम से कम एक संतरी - कक्ष बनाया गया है . स्कूल के मैदान में रेत की बोरियों से अतिरिक्त क़िलाबंदी की गई है . उदाहरणस्वरूप मुख्य द्वार की सुरक्षा के लिए . [3]
पुलिस की गतिविधियाँ स्कूल में पढ़ाई का प्रयास कर रहे छात्रों की शांति भंग करती हैं . 16 वर्षीया इंदिरा परकेश ने एक समस्या के बारे में बताया जो उसे परेशान करती है : " कई बार वे अभियुक्तों को स्कूल में लाते हैं और फिर पीटते हैं ... मुझे बहुत बुरा लगता जब वे उन्हें पीटते हैं ." [4] उसने आगे कहा : " मुझे बुरा लगता है जब मैं पढ़ रही होती हूं और वे ( पुलिस ) पास में ही खा रहे होते हैं , बातें करते हैं और कुछ ऐसा भी करते हैं जिसे मैं सहन नहीं कर सकती ." [5]
एक अन्य छात्र ने शिकायत की कि पुलिस वाले " लड़कियों के सामने और हम लोगों के सामने अपने कच्छे में नहाते हैं जोकि हमारी संस्कृति में उचित नहीं है ...
कई बार ये पुलिस वाले लड़कियों को छेड़ते भी हैं ." [6] स्कूल के एक शिक्षक ने बताया कि " जिस प्रकार वे स्नान करते हैं छात्राओं में एक प्रकार की शर्मिंदगी पैदा होती है ." [7]
पुलिस छात्रों से भी मिलती है और उनसे पूछताछ करती है . 17 वर्षीय गोपाल मेहता ने ह्यूमैनराइट्स वॉच को बताया , " कई बार पुलिस वाले हम से सवाल करते हैं ... कभी - कभी वे पूछते हैं कि तुम कहां जा रहे हो और तुम यहां क्यों हो ?" [8]
स्कूल के सात सौ बच्चों को अब केवल उन तीन कमरों में पढ़ना पड़ता है जिस पर क़ब्ज़ा नहीं किया गया है . स्कूल में दसवीं कक्षा के छात्र गोपाल मेहता ने कहा , " इसके कारण हमारी मुख्य परेशानी ये है कि हम कहां बैठें ?" [9] इंदिरा परकेश ने कहा : " हमें हमारी पढ़ाई में समस्या हो रही है ... जब सारे छात्र ( उपस्थित ) होते हैं तो हमें या तो खड़े रहना पड़ता है या ज़मीन पर बैठना पड़ता है ... ज़मीन पर बैठ कर लिखने में बड़ी कठिनाई होती है , या जो शिक्षक कह रहे हैं उन्हें लिखने में ." [10] दसवीं के ही छात्र सुनील टनडेल ने हमें बताया , " जब सारे छात्र स्कूल में होते हैं तो हमें बाहर कड़ी धूप में बैठना पड़ता है क्योंकि यहां जगह पर्याप्त नहीं होती है ." [11] एक शिक्षक ने भी शिकायत की कि " जब सारे छात्र उपस्थित होते हैं तो उन्हें खड़ा रहना पड़ता है और शिक्षक उन्हें लेक्चर देने में समर्थ नहीं होते हैं ." [12]
जगह की समस्या से उपस्थिति का स्तर भी प्रभावित होता नज़र आता है . स्कूल के आठ में से एक शिक्षक ने स्पष्ट किया कि , " पुलिस की उपस्थिति के कारण बच्चे नियमित रूप से नहीं आते हैं , और यही मुख्य कारण है कि उन्हें शिक्षा नहीं मिल पा रही है ." [13]
केवल कक्षाओं की बात नहीं है जिस पर पुलिस ने क़ब्ज़ा कर रखा है और छात्रों को उनका प्रयोग करने से रोका है . पुलिस ने स्कूल के शौचालयों को भी अपने विशेष इस्तेमाल में ले रखा है और बच्चों को शौच के लिए अन्य सार्वजनिक स्थानों पर जाने को विवश कर दिया है जो प्रायः कुछ छात्रों विशेष रूप से छात्राओं के लिए परेशानी और समस्या का कारण होते हैं . जैसा कि इंदिरा परकेश ने हमें बताया , " मैं प्रायः पास के एक खेत ( शौच के लिए ) में जाती हूं ... मुझे ऐसा करने में शर्म आती है ." [14]
पुलिस क़ब्ज़े का शायद सबसे दीर्घकालीन प्रभाव स्कूल के बहुत सारे बच्चों पर यह पड़ेगा कि इससे उनका शैक्षिक जीवन समाप्त हो जाएगा . बिहार सरकार ने तनकुप्पा विद्यालय को पहले ही " पलस टू " स्कूल बनाने की स्वीकृति दे रखी है जिसका अर्थ यह हुआ कि स्कूल को XI और XII तक बढ़ाया जा सकता है जो कि माध्यमिक शिक्षा का अंतिम वर्ष होता है और आगे की किसी भी त्रितीय स्तर की शिक्षा के लिए यह अनिवार्य है . बहरहाल , पुलिस की उपस्थिति में जगह की दिक़्क़त के कारण ये अतिरिक्त कक्षाएं अभी शुरू नहीं की गई हैं .
दसवीं कक्षा के छात्र सुनील टनडेल ने कहा कि वह अगले वर्ष इसी स्कूल में अपनी पढ़ाई जारी रखना चाहते हैं . सबसे नज़दीक दूसरा स्कूल जहां XI और XII की पढ़ाई होती है वह ज़िला मुख्यालय गया में है , जहां सड़क के रास्ते तनकुप्पा से जाने में एक घंटे से अधिक समय लग जाएगा . बहरहाल दूर के स्कूल जाने में जो ख़र्चे शामिल हैं वह बहुत से बच्चों के लिए रुकावट बन सकते हैं . जैसा कि सुनील ने कहा , " यदि मेरे पास पैसा होता तो मैं गया जा कर पढ़ता लेकिन चूंकि मेरे पास पैसे नहीं हैं इसलिए मैं पढ़ाई जारी नहीं रख सकूँगा ." [15] इंदिरा परकेश भी इस तर्कगणित से चिंतित दिखी , " यदि XI और XII यहां होगा तो बेहतर रहेगा ... गया जाने आने के लिए वाहन की समस्या के कारण ( वहां जाना ) बड़ा मुश्किल है ." [16]
IV. मामले का अध्ययनः बेलहारा उच्च विद्यालय , झारखंड
माओवादी विद्रोही 9 अप्रैल , 2009 को सूर्यास्त के बाद झारखंड के पलामू ज़िले के बेलहारा गाँव में घुस आए और उन्होंने IX और X कक्षा के दिन भर चलने वाले सह - शिक्षा विद्यालय पर हमला कर दिया .
एक स्थानीय व्यक्ति ने ह्यूमैनराइट्स वॉच को बताया , " मेरा घर स्कूली से एक किलो मीटर की दूरी पर है . मैंने बहुत तेज़ धमाका सुना , मैंने दो धमाके सुने ." [17] एक अन्य व्यक्ति ने जोकि स्कूल से पांच या छह किलो मीटर की दूरी पर रहता है , हमें बताया कि उसने भी अपने घर पर धमाके की आवाज़ सुनी . [18] पहला धमाका 7.30 बजे शाम के आस पास हुआ और दूसरा धमाका लगभग 10 से 20 मिनट बाद हुआ .
स्कूल के नवीं कक्षा के छात्र जय पोदहार ने कहा :
दोनों धमाकों के बीच लगभग 10 मिनट की अवधि थी . जब धमाका हुआ तो वह बहुत तेज़ आवाज़ थी . धमाके में जो ईंटें उड़ीं वह माध्यमिक विद्यालय ( जो कि लगभग 100 मीटर की दूरी पर है ) के पार निकल गईं . लग रहा था कि ज़मीन हिल रही है . ईंटे माध्यमिक विद्यालय की दीवारों से टकराईं और अगर स्कूल नहीं होता तो वह और भी दूर जातीं . [19]
रहुल मेहता और भेरू शर्मा स्कूल की इमारत के बिलकुल पीछे रहते हैं . 13 वर्षीय भेरू ने ह्यूमैनराइट्स वॉच को बताया , " मैंने बहुत तेज़ आवाज़ सुनी .... जब हम स्कूल के ज़रा क़रीब आए तो दूसरा धमाका हुआ . उसके बाद एक नारा लगाया गया और फिर वे चले गए , वे नक्सली ." [20] 16 वर्षीय राहुल ने कहा , " हम लोगों ने ' पुलिस कैंप मुर्दाबाद !' का नारा सुना , उस वक़्त मैं अपने घर की छत पर खड़ा था . ( नक्सली ) चिल्ला रहे थे .
वे बार बार चिल्ला रहे थे . दोनों धमाको के बाद ही उन्होंने ( नारा लगाया )." [21]
कम से कम दो काम चलाऊ विस्फोटक उपकरणों यानी " टीन के बर्तन में रखे बम " का हाई स्कूल में विस्फोट किया गया : एक स्कूल के निचले तल पर और दूसरा पहली मंज़िल पर . पहली मंज़िल पर बम को दो कक्षाओं को विभाजित करने वाली एक दीवार के पास रखा गया था जिसके कारण दोनों कमरों के बीच और स्कूल की इमारत की बाहरी दीवार में भी सुराख हो गया . दूसरे बम के विस्फोट से स्कूल की दोनों मंज़िलों के बीच लगभग 30 सेंटीमीटर वर्ग चौड़ा सुराख़ हो गया . राहुल मेहता ने कहा , " दरवाज़े टूट गए . खिड़कियों को नुक़सान पहुंचा . कमरों की दीवारों में छेद हो गए हैं ." [22] एक अन्य छात्र ने कहा , " ऊपर जहां स्कूल की बेंचें रखी हुई थीं वे सारी टूट गईं ." [23] दो छात्रों ने कहा , " इमारत में दरारें पड़ गईं ." इमारत की दीवारों और दोनों मंज़िल के बीच की छत में कई बड़ी - बड़ी दरारें पड़ गईं . [24]
इमारत को होने वाली क्षति से अब छात्र पढ़ाई के लिए उन कक्षाओं का प्रयोग नहीं कर पाते हैं . इसके विरुद्ध अब वे स्कूल के निचले और ऊपर वाले बरामदों में पढ़ाई करते हैं . [25] दसवीं कक्षा के एक छात्र ने कहा , " यह सुरक्षित नहीं है क्योंकि ( इमारत में ) हर जगह दरार है ." [26]
हमले से पहले स्कूल में लगभग 250 छात्र हुआ करते थे . राहुल मेहता ने बताया कि हमले के बाद , " जो छात्र सुदूर इलाक़ों से आते थे उन्होंने आना बंद कर दिया . उनकी संख्या 20 से 25 के बीच थी ." [27]
एक अन्य छात्र ने अनुमान लगाया कि 10 से 15 छात्रों ने हमले के बाद स्कूल आना बंद कर दिया . [28]
हालांकि बहुत से स्थानीय निवासी जो स्कूल के पास रहते हैं उन्होंने धमाकों के बाद " पुलिस कैंप मुर्दाबाद का नारा !" सुना , हमने जितने लोगों से बात की उन्होंने बताया कि हमले के समय पुलिस ने स्कूल पर क़ब्ज़ा नहीं कर रखा था . एक स्थानीय निवासी जो स्कूल के पास काम करता है उसने कहा , " उस समय यहां कोई पुलिस कैंप नहीं था . वर्ष 2008 में पुलिस ने एक दिन के लिए यहां कैंप लगाया था . वे इस जगह को देखने आए थे दिन में ज़्यादा देर हो जाने के कारण वे यहां ठहर गए थे ." [29] नवीं कक्षा के छात्र 14 वर्षीय देवल राव ने याद करते हुए कहा कि विगत में स्कूल में दो तीन बार पुलिस ने दो - तीन दिनों के लिए कैंप किया था लेकिन उसने यह भी कहा , "2009 में यहां पुलिस नहीं ठहरी थी ." [30]
बम धमाके की उसी रात पास के माध्यमिक विद्यालय की दीवार पर लाल रंग में कुछ लिखा हुआ दिखा जिसमें स्थानीय लोगों से आगामी चुनाव का बहिष्कार करने के लिए कहा गया था . एक वक्तव्य इस प्रकार था : " सावधान . वोट न दें , अगर आपने नहीं माना तो राइफ़ल प्रयोग के लिए तैयार है , माओवादी ज़िंदाबाद ." जब चुनाव हुआ तो गाँव में पूर्वनिर्धारित हाई स्कूल के स्थान पर माध्यमिक विद्यालय को निर्वाचन केंद्र बनाया गया .
हमले के लगभग दो महीने बाद जब ह्यूमैनराइट्स वॉच ने स्कूल का दौरा किया तो ऐसा लगा नहीं कि वहाँ सरकार ने मरम्मत का कोई कार्य करवाया हो .
V. मामले का अध्ययनः द्वारिका माध्यमिक विद्यालय , झारखंड
द्वारिका गाँव झारखंड के पलामू ज़िले के सुदूर भाग में स्थित है . यह गाँव ज़िला मुख्यालय डालटेनगंज से 50 किलोमीटर की दूरी पर है जहां जाने के लिए कच्ची सड़क से बहुत धीमी यात्रा होती है रास्ते में दो बार नदी पार करनी पड़ती है . कहा जाता है कि आस पास माओवादी और उनके घटक दल जैसे तृतीय प्रस्तुति कमेटी ( टीपीसी ), झारखंड प्रस्तुति कमेटी ( जेपीसी ) और झारखंड लिब्रेशन टाइगर्स ( जेएलटी ) जैसे विभिन्न नक्सली घटक दल मौजूद हैं और कई बार ये संसाधनों के लिए आपस में भिड़ जाते हैं . गाँव का स्कूल लड़के और लड़कियों के लिए दो विभिन्न इमारतों में हैं जहां पहली से सातवीं कक्षा तक की पढ़ाई होती है लेकिन 2008 के अंत से वहां कोई पढ़ाई नहीं हुई है .
नक्सली शनिवार , 29 नवंबर , 2008 की आधी रात को उस इलाक़े में घुस आए और उन्होंने स्कूल में कम से कम दो " टीन के बर्तन में रखे बम " विस्फोट किए . [31] धमाकों ने दो अलग अलग जगह पर कक्षाओं को विभाजित करने वाली ईंट की दीवारों के एक भाग को नष्ट कर दिया . लकड़ी के चार दरवाज़े धमाके से टूट - फूट गए . कई स्थानों पर स्कूल की दीवारों में दरार आ गई . एक स्थानीय व्यक्ति ने हमें बताया , " इमारत में दरार आ गई है और यह किसी भी समय गिर सकती है ." [32]
ह्यूमैनराइट्स वॉच को हालांकि कोई भी गवाह नहीं मिल सका जो बम विस्फोट के बारे में बताता लेकिन कहा जाता है कि नक्सलियों ने स्कूल पर एक पैम्फ़लेट चिपका दिया था जिसमें हमले को इस आधार पर उचित बताया गया था कि कि सुरक्षा बलों ने अपने नक्सल विरोधी अभियान के दौरान इसे इस्तेमाल किया था . ह्यूमैनराइट्स वॉच ने पलामू के पुलिस अधीक्षक और रांची के पुलिस महानिदेशक दोनों से उस पैम्फ़लेट की प्रति के लिए आग्रह करते हुए लिखा लेकिन उन्होंने उत्तर नहीं दिया .
स्थानीय निवासियों ने पुष्टि की कि कभी - कभी सुरक्षा बलों की विभिन्न इकाइयां स्कूल में आ कर ठहरी थीं . एक स्थानीय निवासी ने हमें बताया , " वे आते जाते रहते थे , वे स्थाई रूप से वहां नहीं रहते हैं ." [33] स्थानीय निवासियों ने बताया कि हमले से पहले वाले सप्ताह में सुरक्षा बल के लोग दो - तीन दिनों के लिए वहां ठहरे थे . बहरहाल , हमने जितने लोगों से बात कि वे इस बात से सहमत थे कि हमले से काफ़ी पहले सुरक्षा बलों ने स्कूल छोड़ दिया था .
एक पिता ने कहा , " धमाके के बाद सब कुछ रुक गया और स्कूल को बंद कर दिया गया . यह इसलिए रुक गया क्योंकि इमारत क्षतिग्रस्त हो गई इसलिए अब ( कोई ) वहां नहीं पढ़ा सकता है . दरवाज़े टूट गए हैं और दीवारों में दरारें आ गई है ." [34]
नक्सली हमले से पहले भी द्वारिका माध्यमिक विद्यालय में बच्चों को अच्छी शिक्षा मिल पाना मुशकिल था . जैसा कि हमें अभिभावकों ने बताया कि 2008 में स्कूल ने अपने दोनों सरकारी शिक्षकों को खो दिया . एक की मृत्यु हो गई और एक रिटायर हो गए . हालांकि सरकार ने स्कूल के लिए एक अन्य शिक्षक की नियुक्ति की थी लेकिन उन्होंने स्पष्टतया जल्दी ही अपना तबादला करवा लिया . [35] एक स्थानीय निवासी का मानना है कि नया शिक्षक इस इलाक़े में आने से भयभीत था क्योंकि यह " नक्सल प्रभावित " है इसलिए " वह अलग - अलग बहाना बना कर वापस चला गया ." [36]
जब कोई भी सरकारी शिक्षक स्कूल में पढ़ाने नहीं आया तो स्थानीय निवासियों ने गाँव के ही एक व्यक्ति को 10 रुपए (US$0.21) प्रति छात्र के हिसाब से पढ़ाने के लिए नियुक्त कर लिया . वह भी हमले के बाद समाप्त हो गया .
स्थानीय लोगों ने जहां सरकार से पैसा मिलना चाहिए था वहां स्वयं चंदा करके इमारत को खड़ा करने के लिए आपात मरम्मत के कुछ काम कराने की कोशिश की . [37]
पांच बच्चों के पिता जिनके तीन बच्चे विस्फोट से पहले इस स्कूल में पढ़ते थे उन्होंने हमें बताया :
आप स्थिति देख सकते हैं . नक्सलियों ने स्कूल को उड़ा दिया है ... क्योंकि इमारत नष्ट हो गई है इसलिए कोई पढ़ाई नहीं है . इसलिए मेरे बच्चे स्कूल नहीं जा रहे हैं . मैं अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए गाँव से बाहर भेजने की स्थिति में नहीं हूं . हम ग़रीब लोग हैं . हम जंगल में रहते हैं . हम अपनी आजीविका के लिए खेत जोतते हैं . इस स्कूल में 250 बच्चे पढ़ते थे और सारे के सारे बिगड़ रहे हैं क्योंकि स्कूल में कोई पढ़ाई नहीं है ... ( अब मेरे बच्चे ) कुछ नहीं करते हैं . वे गाँव भर में खेलते फिरते हैं .... मवेशी चराते हैं और उसी तरह का काम करते हैं ... जो अपने बच्चों को गाँव से बाहर भेजने में समर्थ हैं उन्होंने अपने बच्चों को पढ़ाई के लिए गाँव से बाहर भेज दिया है . लेकिन हमारे जैसे ग़रीब लोग गाँव से बाहर बच्चों को पढ़ने के लिए नहीं भेज सकते हैं . लगभग 200 लोग अपने बच्चों को पढ़ने के लिए गाँव से बाहर भेजने का ख़र्च नहीं उठा सकते हैं . जो समर्थ ही नहीं हैं वे कैसे भेज सकते हैं . [38]
एक अन्य स्थानीय निवासी , हालांकि उनका बच्चा स्कूल में नहीं है , उन्होंने अनुमान लगाते हुए कहा कि शायद 20 छात्र ऐसे हैं जिन्होंने हर प्रकार की शिक्षा छोड़ दी है . [39]
पांच बच्चों के एक अन्य पिता ने हमें बताया कि क्योंकि स्कूल में कोई पढ़ाई नहीं हो रही है इसलिए उनकी बच्चियां जो स्कूल जाने की आयु में हैं , निकट के एक सरकारी स्कूल में पढ़ने जाती हैं जोकि विशेष रूप से बालिकाओं के लिए है , और उनका बेटा जो 12 साल का है उसके लिए कोई सरकारी स्कूल नहीं है इसलिए वह एक स्थानीय मदरसे यानी इस्लामी धार्मिक स्कूल में पढ़ने गया है . उन्होंने ने कहा :
अब मेरा बेटा घूमता और खेलता रहता है . हम लोग मुसलमान हैं और यहां एक मदरसा है . इसलिए हमने अपने बेटे को वहां पढ़ने के लिए भेजा . वहां हर दिन सुबह 8.00 बजे से 10.00 बजे और दोपहर को 2.00 बजे से 4.00 बजे तक पढ़ाई होती है . मदरसे में वे उर्दू पढ़ते हैं और उनमें से कुछ ( मौलवी ) बनने के लिए चुने जाएंगे . एक सरकारी स्कूल अच्छा ( होता ) है क्योंकि ( वहां पढ़ने के बाद ) सरकारी या निजी क्षेत्र में किसी भी तरह की नौकरी मिल जाती है और इससे ज्ञान बढ़ता है . मैं अपने बच्चे को निजी स्कूल में नहीं भेज सकता क्योंकि मैं ग़रीब आदमी हूं . [40]
माध्यमिक विद्यालय के न चलने से बहुत से छात्र दोपहर के भोजन के कार्यक्रम से भी लाभान्वित नहीं हो सकते हैं जिनकी बुनियादी स्वास्थ्य एवं पोषण के लिए बहुत सारे बच्चों को आवश्यकता है .
जिस दिन , 7 जून 2009 की दोपहर को ह्यूमैनराइट्स वॉच ने द्वारिका गाँव का दौरा किया सीआरपीएफ़ के अर्ध - सैनिक बल के 40 से 70 जवान गाँव आए और उन्होंने स्कूल में और उसके आस - पास अपना पड़ाव डाला . वे एक बारूदी सुरंग निरोधक वाहन और दो ट्रकों में आए . झारखंड राज्य पुलिस के एक सदस्य जो टुकड़ी के कमान अधिकारी हैं उन्होंने ने हमें बताया कि वे नक्सल सफ़ाई अभियान पर आए हैं क्योंकि उन्हें सूचना मिली है कि नक्सली इस इलाक़े में पैसा वसूली कर रहे हैं और यह कि पुलिस स्कूल में 10 दिन अथवा संभवतः अधिक समय तक ठहर सकती है . [41]
[1]माओवादियोंनेतनकुप्पापुलिसचौकीउड़ादी, टाइम्सऑफ़इंडिया, 5 जूलाई, 2006.
[2]तनकुप्पा, गया, बिहारकेशिक्षकविरेशपारेख (असलीनामनहीं) सेह्यूमैनराइट्सवॉचकाइंटरव्यू, 12 जून, 2009.
[3]ह्यूमैनराइट्सवॉचकादौरा, 12 जून 2009. स्कूलकीछतपरकिपूरीक़लाबंदीज़मीनसेनज़रनहींआरहीथी.
[4]ह्यूमैनराइट्सवॉचकीतनकुप्पा, गयाबिहारकी 16 वर्षीयइंदिरापरकेश (असलीनामनहीं) सेइंटरव्यू, 12 जून, 2009
[5]ह्यूमैनराइट्सवॉचकाइंदिरासेइंटरव्यू, 12 जून, 2009
[6]ह्यूमैनराइट्सवॉचका 15 वर्षीयहितलशाह (असलीनामनहीं) सेइंटरव्यू, तनकुप्पा, गया, बिहार, 12 जून, 2009.
[7]ह्यूमैनराइट्सवॉचकावीरेशपारेखसेइंटरव्यू, 12 जून, 2009.
[8]ह्यूमैनराइट्सवॉचका 17 वर्षीयगोपालमेहता (उसकाअसलीनामनहीं) सेइंटरव्यू, तनकुप्पा, गया, बिहार, 12 जून, 2009.
[9]ह्यूमैनराइट्सवॉचकागोपालमेहतासेइंटरव्यू, 12 जून, 2009.
[10]ह्यूमैनराइट्सवॉचकाइंदिरापरकेशसेइंटरव्यू, 12 जून, 2009.
[11]ह्यूमैनराइट्सवॉचका 15 वर्षीयसुनीलटनडेल (उसकाअसलीनामनहीं) सेइंटरव्यू, तनकुप्पा, गया, बिहार, 12 जून, 2009.
[12]ह्यूमैनराइट्सवॉचकाशिक्षकवीरेशपारेख (उनकाअसलीनामनहीं) सेइंटरव्यू, तनकुप्पा, गया, बिहार, 12 जून, 2009.
[13]ह्यूमैनराइट्सवॉचकावीरेशपारेखसेइंटरव्यू, 12 जून, 2009.
[14]ह्यूमैनराइट्सवॉचकाइंदिरापरकेशसेइंटरव्यू, 12 जून, 2009.
[15]ह्यूमैनराइट्सवॉचकासुनीलसेइंटरव्यू, 12 जून, 2009.
[16]ह्यूमैनराइट्सवॉचकाइंदिरापरकेशसेइंटरव्यू, 12 जून, 2009.
[17]ह्यूमैनराइट्सवॉचकादीपेशदामले (उसकाअसलीनामनहीं) सेइंटरव्यू, बेलहारा, पलामू, झारखंड, 6 जून, 2009.
[18]ह्यूमैनराइट्सवॉचकाहरीआनंदसेइंटरव्यू, बेलहारा, पलामू, झारखंड, 6 जून, 2009.
[19]ह्यूमैनराइट्सवॉचका 15 वर्षीयजयपोदहर (उसकाअसलीनामनहीं) सेइंटरव्यू, बेलहारा, पलामू, झारखंड, 6 जून, 2009.
[20]ह्यूमैनराइट्सवॉचका 13 वर्षीयभेरूशर्मा (उसकाअसलीनामनहीं) सेइंटरव्यू, बेलहारा, पलामू, झारखंड, 6 जून, 2009.
[21]ह्यूमैनराइट्सवॉचका 16 वर्षीयराहुलमेहता (उसकाअसलीनामनहीं) सेइंटरव्यू, बेलहारा, पलामू, झारखंड, 6 जून, 2009.
[22]ह्यूमैनराइट्सवॉचका 16 वर्षीयराहुलमेहता (उसकाअसलीनामनहीं) सेइंटरव्यू, बेलहारा, पलामू, झारखंड, 6 जून, 2009.
[23]ह्यूमैनराइट्सवॉचका 13 वर्षीयभेरूशर्मा (उसकाअसलीनामनहीं) सेइंटरव्यू, बेलहारा, पलामू, झारखंड, 6 जून, 2009.
[24]ह्यूमैनराइट्सवॉचका 14 वर्षीयदेवलरावऔर 16 वर्षीयराहुलमेहता (इनदोनोंअसलीनामनहीं) सेइंटरव्यू, बेलहारा, पलामू, झारखंड, 6 जून, 2009.
[25]ह्यूमैनराइट्सवॉचकादिपेशदामलेऔर 13 वर्षीयभेरूशर्मा (उनकाअसलीनामनहीं) सेइंटरव्यू, बेलहारा, पलामू, झारखंड, 6 जून, 2009.
[26]ह्यूमैनराइट्सवॉचका 16 वर्षीयराहुलमेहता (उसकाअसलीनामनहीं) सेइंटरव्यू, बेलहारा, पलामू, झारखंड, 6 जून, 2009.
[27]ह्यूमैनराइट्सवॉचका 16 वर्षीयराहुलमेहता (उसकाअसलीनामनहीं) सेइंटरव्यू, बेलहारा, पलामू, झारखंड, 6 जून, 2009.
[28]ह्यूमैनराइट्सवॉचकाभेरूशर्मासेइंटरव्यू, बेलहारा, पलामू, झारखंड, 6 जून, 2009.
[29]ह्यूमैनराइट्सवॉचकादीपेशदामलेसेइंटरव्यू, बेलहारा, पलामू, झारखंड, 6 जून, 2009.
[30]ह्यूमैनराइट्सवॉचका 14 वर्षीयदेवलराव (उसकाअसलीनामनहीं) सेइंटरव्यू, बेलहारा, पलामू, झारखंड, 6 जून, 2009.
[31]ह्यूमैनराइट्सवॉचकास्थानीयलोगोंदिलावरमोदी, प्रतीकसेन, औरजयेशकुमार (उनकाअसलीनामनहीं) सेइंटरव्यू, द्वारिका, पलामू, झारखंड, 7 जून, 2009.
[32]ह्यूमैनराइट्सवॉचकास्थानीयव्यक्तिजयेशकुमारसेइंटरव्यू, द्वारिका, पलामू, झारखंड, 7 जून, 2009.
[33]ह्यूमैनराइट्सवॉचकाजयेशकुमारसेइंटरव्यू, 7 जून, 2009.
[34]ह्यूमैनराइट्सवॉचकादिलावरमोदी (उसकाअसलीनामनहीं) सेइंटरव्यू, द्वारिका, पलामू, झारखंड, 7 जून, 2009.
[35]ह्यूमैनराइट्सवॉचकादिलावरमोदी, प्रतीकसेनऔरजयेशकुमार (उनकाअसलीनामनहीं) सेइंटरव्यू, द्वारिका, पलामू, झारखंड, 7 जून, 2009.
[36]ह्यूमैनराइट्सवॉचकाजयेशकुमारसेइंटरव्यू, द्वारिका, पलामू, झारखंड, 7 जून, 2009.
[37]ह्यूमैनराइट्सवॉचकाजयेशकुमारसेइंटरव्यू, द्वारिका, पलामू, झारखंड, 7 जून, 2009.
[38]ह्यूमैनराइट्सवॉचकादिलावरमोदी (उसकाअसलीनामनहीं) सेइंटरव्यू, द्वारिका, पलामू, झारखंड, 7 जून, 2009.
[39]ह्यूमैनराइट्सवॉचकाजयेशकुमारसेइंटरव्यू, द्वारिका, पलामू, झारखंड, 7 जून, 2009.
[40]ह्यूमैनराइट्सवॉचकासलमानबिलग्रामी (उसकाअसलीनामनहीं) सेइंटरव्यू, द्वारिका, पलामू, झारखंड, 7 जून, 2009.
[41]ह्यूमैनराइट्सवॉचकाकमानअधिकारीसेइंटरव्यू, द्वारिका, पलामू, झारखंड, 7 जून, 2009.






